राखी के दिन एक चीज हर घर में कॉमन होती है, थाली में मिठाई का डिब्बा। लेकिन अगर आप ध्यान से देखें तो यह डिब्बा हर राज्य में अलग निकलता है। दिल्ली के किसी घर की राखी की थाली अगर कोलकाता या कोच्चि के घर से मिला दी जाए, तो शक्ल-सूरत बिल्कुल अलग दिखेगी। असल में मिठाई सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि हर क्षेत्र की अपनी पहचान है, और राखी इस पहचान को थाली में सजाकर सामने ले आती है।
उत्तर भारत से शुरू करें तो सबसे पहला नाम दिमाग में आता है काजू कतली और बेसन के लड्डू का। राजस्थान में इस मौसम का अपना खास हीरो है, घेवर। सावन के महीने में बाजार घेवर की खुशबू से भर जाते हैं, और तीज से लेकर राखी तक यही मिठाई सबसे ज्यादा बिकती है। पंजाब की तरफ जाएं तो पिन्नी और मूंग दाल का हलवा राखी की थाली की शान बढ़ाते हैं, जिनमें देसी घी की मात्रा किसी हिसाब-किताब के बिना डाली जाती है।
पूरब की तरफ रुख करें तो बंगाल और ओडिशा एक बिल्कुल अलग दुनिया में ले जाते हैं। यहां मिठाई का आधार है छेना, यानी दूध फाड़कर बनाया गया पनीर जैसा तत्व। संदेश, रसगुल्ला और छेना पोड़ा जैसी मिठाइयां यहां सिर्फ त्योहार की नहीं, रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं। दिलचस्प बात यह है कि बंगाल में राखी को सिर्फ भाई-बहन तक सीमित नहीं रखा जाता, यहां रवींद्रनाथ टैगोर की शुरू की हुई परंपरा के चलते इसे सामाजिक भाईचारे का पर्व भी माना जाता है, और मिठाई का आदान-प्रदान इसी भावना को आगे बढ़ाता है। बिहार और पूर्वांचल के इलाकों में भी छेना और खोए से बनी मिठाइयों का ही बोलबाला रहता है, और अनरसा जैसी पारंपरिक मिठाइयां भी त्योहारी मौसम में घर-घर बनती नजर आती हैं।
पश्चिम भारत में गुजरात और महाराष्ट्र अपनी अलग कहानी कहते हैं। गुजरात में मोहनथाल और सूतरफेनी जैसी मिठाइयां बेसन और घी के भरोसे बनती हैं, जिनका स्वाद हल्का दानेदार और बेहद समृद्ध होता है। महाराष्ट्र में राखी का दिन नारली पूर्णिमा के साथ जुड़ जाता है, जब समुद्र को नारियल चढ़ाया जाता है, और उसी नारियल से बनी मिठाइयां और नारली भात घरों में तैयार होते हैं। पुरण पोली भी सावन के इसी मौसम में हर महाराष्ट्रीयन रसोई में बनती नजर आती है।
दक्षिण भारत की बात करें तो यहां मिठास का चरित्र ही बदल जाता है, गाढ़ी चाशनी वाली मिठाइयों की जगह पायसम जैसी हल्की, दूध और गुड़ पर आधारित मिठाइयां ज्यादा पसंद की जाती हैं। कर्नाटक का मैसूर पाक भी त्योहारी मौसम में हर घर की पसंदीदा मिठाई बन जाता है, जिसकी मुंह में घुल जाने वाली बनावट उसे बाकी मिठाइयों से अलग खड़ा करती है। तमिलनाडु और केरल में नारियल और गुड़ का मेल लगभग हर पकवान में झलकता है, चाहे वह मिठाई हो या कोई और व्यंजन। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पूरनम बूरेलू जैसी मिठाई भी त्योहारी मौकों पर खासतौर से बनाई जाती है, जिसमें अंदर की मीठी भरावन और बाहर की कुरकुरी परत का कॉम्बिनेशन इसे बाकी राज्यों की मिठाइयों से अलग पहचान देता है।
इन सबके पीछे एक पैटर्न साफ नजर आता है। जिस राज्य में जो फसल या सामग्री सबसे आसानी से उपलब्ध रहती है, वहां की मिठाई उसी के इर्द-गिर्द बुनी जाती है। तटीय राज्यों में नारियल का बोलबाला है, गंगा के मैदानी इलाकों में दूध और मावा हावी रहते हैं, और राजस्थान जैसे सूखे इलाकों में घी और बेसन की भरमार मिठाई को लंबे समय तक टिकाऊ भी बनाती है। पहाड़ी राज्यों में भी यही सिद्धांत लागू होता है, हिमाचल और उत्तराखंड के कई घरों में सूखे मेवों और स्थानीय अनाज से बनी मिठाइयां इसी वजह से ज्यादा प्रचलित हैं क्योंकि यह सामग्री वहां आसानी से मिल जाती है। यानी हर मिठाई सिर्फ स्वाद की नहीं, बल्कि उस जमीन की भी कहानी कहती है जहां वह बनी।
अगर आप इस राखी पर कुछ नया ट्राई करना चाहते हैं, तो अपने घर की पारंपरिक मिठाई की जगह किसी दूसरे राज्य की रेसिपी आजमाना एक अच्छा विचार हो सकता है। बंगाली परिवार अगर इस बार घेवर बनाकर देखे, या पंजाबी घर में पायसम की खुशबू फैले, तो त्योहार को एक नया एहसास मिल सकता है। आखिर राखी सिर्फ धागे का बंधन नहीं, बल्कि पूरे देश की विविधता को एक साथ बांधने का मौका भी है।
तो इस बार जब थाली सजे, तो सिर्फ अपने घर की मिठाई से आगे बढ़कर एक बार देश के किसी दूसरे कोने की मिठास भी चखिए। हो सकता है कि वही एक कटोरी पायसम या एक टुकड़ा घेवर आपकी अगली राखी की सबसे प्यारी याद बन जाए।
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