By: Ragini Chaubey
रंगों की नहीं, माखन की होली उत्तराखंड का यह त्योहार आपने शायद नहीं सुना होगा |
हम सबने रंगों की होली कई बार खेली होगी, और आगे भी खेलते रहेंगे। लेकिन क्या कभी आपने माखन की होली खेली है? जी हाँ, माखन की होली! यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि उत्तराखंड में सदियों से चली आ रही एक असली परंपरा है, जिसके बारे में देश के बाकी हिस्सों में बहुत कम लोग जानते हैं।
जब भी होली के त्योहारों की बात होती है, हमारे ज़हन में सबसे पहले मथुरा-वृंदावन की तस्वीर उभरती है कृष्ण, राधा, गुलाल और रंगों से सराबोर गलियाँ। लेकिन आज बात करते हैं उत्तराखंड की उस होली की, जो न फागुन में मनाई जाती है, न रंगों से खेली जाती है। यह होली भादों के महीने में, यानी अगस्त के मध्य में मनाई जाती है, और इसका नाम है अंडूरी उत्सव।
यह उत्सव उत्तरकाशी जिले के रैथल गाँव के पास, डायरा बुग्याल नाम के ऊँचाई पर बसे हरे-भरे मैदान में मनाया जाता है। कहानी शुरू होती है गर्मियों के मौसम से, जब गाँव के किसान अपने मवेशियों को चराने के लिए इन ऊँचे मैदानों में ले जाते हैं। पूरी गर्मी चरवाहों की निगरानी में मवेशी वहीं चरते हैं, हरी-भरी घास और पहाड़ी जड़ी-बूटियों पर पलते हैं। जब यह मौसम बीतता है और मवेशी सुरक्षित घर लौटते हैं, तो गाँव में खुशी की लहर दौड़ जाती है और यही खुशी अंडूरी उत्सव का रूप ले लेती है।
अब सवाल उठता है कि आखिर यह उत्सव माखन से ही क्यों जुड़ा है। इसके पीछे एक दिलचस्प और कम सुनी गई कहानी है। पुराने समय में जब मेहमान इस उत्सव में शामिल होने आते थे, तो उनका स्वागत गोबर लगाकर किया जाता था एक चंचल, मज़ाकिया परंपरा के तौर पर, जो गाँव की आत्मीयता और मवेशी-केंद्रित जीवनशैली को दर्शाती थी। समय के साथ यह रिवाज बदलता गया और गोबर की जगह माखन और छाछ ने ले ली। आज गाँव वाले और मेहमान एक-दूसरे के चेहरे पर माखन मलते हैं और छाछ उड़ेलते हैं बिल्कुल रंगों की होली जैसा उत्साह, बस रंग की जगह माखन है। यही वजह है कि इसे माखन की होली या मक्खन होली भी कहा जाता है।
इस उत्सव का एक और पहलू भगवान कृष्ण से जुड़ता है। जिस तरह बाल कृष्ण माखन चुराकर खाने के लिए मशहूर थे, उसी तरह यह त्योहार उनके उस रूप को भी सम्मान देता है जिसमें उन्होंने गायों और मवेशियों की रक्षा बुरी शक्तियों से की थी। मवेशी-पालन उत्तराखंड की पहाड़ी अर्थव्यवस्था और संस्कृति की रीढ़ रहा है, इसलिए कृष्ण की यह छवि गाँव वालों के दिल के बेहद करीब है।
लेकिन इस उत्सव की जड़ें सिर्फ कृष्ण भक्ति में नहीं हैं। जब ग्रामीण भाई मवेशियों के साथ घर की ओर लौटते हैं, तो रास्ते में वे बुग्याल माता यानी मैदान की देवी का आभार व्यक्त करते हैं। उन्हीं की कृपा से यह चारागाह हरा-भरा रहता है और मवेशियों को भरपूर चारा मिलता है। स्थानीय लोग भगवान शिव और अपने ग्राम देवता सोमेश्वर की भी पूजा करते हैं। यही कारण है कि अंडूरी उत्सव में कृष्ण भक्ति और स्थानीय लोक आस्था, दोनों एक साथ नज़र आते हैं एक ऐसा संगम जो इसे बाकी होली उत्सवों से अलग बनाता है।
उत्सव की तैयारी हफ्तों पहले शुरू हो जाती है। घरों और मवेशियों के बाड़ों को फूलों से सजाया जाता है, दरवाज़ों पर पूरियाँ टाँगी जाती हैं, और दूर-दराज़ के रिश्तेदारों को भी उत्सव में शामिल होने के लिए बुलाया जाता है। जिस दिन उत्सव मनाया जाता है, उस दिन करीब पाँच सौ ग्रामीण मिलकर डायरा बुग्याल की ओर एक जुलूस में चढ़ाई करते हैं। इस दौरान पहाड़ी वाद्ययंत्र ढोल-दमाऊ की थाप पूरे माहौल में गूँजती रहती है, और लोग नाचते-गाते आगे बढ़ते हैं। ऊँचे मैदान तक पहुँचने का यह सफर खुद में एक उत्सव जैसा अनुभव होता है।
पूरे गाँव में उस दिन खुशनुमा माहौल होता है। हँसी-ठिठोली, गीत-संगीत और नृत्य के बीच लोग एक-दूसरे को माखन और छाछ से सराबोर करते हैं। बर्तनों में भरी छाछ की छपाछप और हवा में उड़ते माखन के बीच पूरा डायरा बुग्याल रंग-बिरंगी खुशियों से भर जाता है।
हाल के वर्षों में इस उत्सव की लोकप्रियता बढ़ने के साथ इसमें कुछ नए रंग भी जुड़े हैं। जन्माष्टमी की तर्ज़ पर अब यहाँ दही-हांडी की रस्म भी आयोजित होने लगी है, जिसमें युवा टोलियाँ ऊँचाई पर बंधे मटकों को फोड़ने की कोशिश करती हैं। इसके साथ ही एक मेला भी लगता है, जहाँ बरादा नाटी, झोरा, छोलिया, थाली नृत्य, लंगवीर नृत्य और सबसे लोकप्रिय पांडव नृत्य जैसे पारंपरिक लोकनृत्यों का प्रदर्शन किया जाता है। ये नृत्य अब दूर-दराज़ से आने वाले पर्यटकों को भी आकर्षित करने लगे हैं, और उत्तराखंड पर्यटन विभाग भी इस आयोजन को बढ़ावा देने में जुटा है।
यही वजह है कि अंडूरी उत्सव अब सिर्फ रैथल गाँव की एक निजी परंपरा नहीं रह गया, बल्कि धीरे-धीरे एक बड़े सांस्कृतिक आयोजन का रूप ले रहा है जहाँ स्थानीय आस्था और बढ़ता पर्यटन साथ-साथ चलते हैं। जो लोग इस अनोखे उत्सव को करीब से देखना चाहते हैं, उनके लिए सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा देहरादून का जॉली ग्रांट है, जो करीब 285 किलोमीटर दूर है, जबकि निकटतम रेलवे स्टेशन भी देहरादून में ही है। उत्तरकाशी शहर से डायरा बुग्याल की दूरी महज़ अड़तीस किलोमीटर है।
यही उत्तराखंड के अंडूरी उत्सव यानी माखन की होली का रहस्य है एक ऐसा त्योहार जो खेती-किसानी की कृतज्ञता से शुरू हुआ, धीरे-धीरे लोक आस्था और कृष्ण भक्ति से जुड़ता गया, और अब एक जीवंत सांस्कृतिक उत्सव के रूप में देश-दुनिया का ध्यान खींच रहा है। अगली बार जब होली का ज़िक्र हो, तो सिर्फ रंगों तक सीमित मत रहिए उत्तराखंड की इस माखन भरी होली को भी याद कीजिए।
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