अगस्त का महीना आते ही केरल की हवा में एक अलग-सी खुशबू घुलने लगती है। घरों के आंगन साफ होने लगते हैं, बाजारों में फूलों की मांग बढ़ जाती है, और लोग नए कपड़ों की तैयारी में जुट जाते हैं। यह ओणम के आने की आहट है केरल का सबसे बड़ा और सबसे रंगीन उत्सव, जो मलयालम सौर कैलेंडर के चिंगम महीने में मनाया जाता है।
ओणम की कहानी राजा महाबली से जुड़ी है। कथा के अनुसार, महाबली एक असुर राजा थे, जिनके राज्य में समृद्धि और समानता थी। उनकी बढ़ती शक्ति से देवता चिंतित हो गए, और भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर महाबली से तीन पग भूमि मांगी। तीसरे पग में विष्णु ने महाबली को पाताल लोक भेज दिया, लेकिन उनकी उदारता से प्रसन्न होकर उन्हें हर साल अपने राज्य और अपनी प्रजा से मिलने आने का वरदान भी दिया। ओणम इसी वापसी का उत्सव है यही वजह है कि इसे सिर्फ धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि केरल की पहचान का उत्सव माना जाता है, जिसे हिंदू, ईसाई और मुस्लिम सभी समुदाय मिलकर मनाते हैं।
ओणम दस दिनों का उत्सव है, जो अथम दिन से शुरू होकर तिरुवोणम पर अपने चरम पर पहुंचता है। हर दिन का अपना नाम और अपना महत्व है। सबसे खूबसूरत परंपरा है पूकलम घर के आंगन में फूलों से बनाई जाने वाली गोलाकार रंगोली। अथम के दिन एक छोटे-से घेरे से शुरू होकर, हर दिन उसमें फूलों की एक नई परत जुड़ती जाती है, जब तक तिरुवोणम तक आते-आते यह एक विशाल, रंग-बिरंगे मंडल का रूप नहीं ले लेती। इसके बीचोंबीच रखी जाती है ओणथप्पन की मूर्ति मिट्टी से बनी एक छोटी आकृति, जो राजा महाबली के स्वागत का प्रतीक मानी जाती है।
रंगों की यह कहानी सिर्फ फूलों तक सीमित नहीं रहती। ओणम के दौरान केरल की महिलाएं पारंपरिक कसावु साड़ी पहनती हैं सफेद या क्रीम रंग के कपड़े पर सुनहरे बॉर्डर वाली यह साड़ी केरल की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुकी है। मंदिरों और सार्वजनिक समारोहों में जब सैकड़ों लोग एक साथ यह पारंपरिक परिधान पहनकर निकलते हैं, तो पूरा दृश्य ही उत्सवमय हो जाता है।
लेकिन ओणम का सबसे नाटकीय और रंगीन पहलू शायद पुलिकली है त्रिशूर की सड़कों पर होने वाला “बाघ नृत्य”। यह परंपरा 200 साल से भी ज्यादा पुरानी मानी जाती है, जिसकी शुरुआत कोचीन के तत्कालीन महाराजा राम वर्मा शक्तन थम्पुरान ने की थी। ओणम के चौथे दिन कलाकार अपने पूरे शरीर पर पीले, काले और लाल रंग से बाघ जैसी धारियां बनवाते हैं, और चेंडा, थकिल और उडुक्कू जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर बाघ और शिकारी की भूमिका निभाते हुए नाचते हैं। स्वराज राउंड पर हजारों की भीड़ के बीच यह नजारा किसी जीवंत चित्रकला जैसा लगता है।
पानी पर भी ओणम अपने रंग बिखेरता है। इस मौसम में केरल की नदियों और बैकवाटरों में स्नेक बोट रेस यानी वल्लमकली का आयोजन होता है, जिसमें 100 से ज्यादा नाविक एक साथ लंबी, सर्पाकार नावों को खींचते हैं। ढोल की थाप और किनारे खड़ी भीड़ की जयकार के बीच यह दृश्य केरल के सामूहिक उत्साह की सबसे जीवंत झलक पेश करता है।
और फिर आता है ओणम सद्या तिरुवोणम के दिन केले के पत्ते पर परोसा जाने वाला भव्य शाकाहारी भोज, जिसमें छब्बीस से भी ज्यादा व्यंजन एक तय क्रम में परोसे जाते हैं। चावल, सांभर, अवियल, पचड़ी, अचार और अंत में मीठे पायसम तक हर व्यंजन का अपना स्थान और अपना समय होता है। परिवार और पड़ोसी एक साथ बैठकर इस भोज को साझा करते हैं, और यही पल ओणम की असली भावना को सबसे करीब से दिखाता है साझा करने, मिलकर खुश होने और समानता का भाव।
ओणम को अक्सर सिर्फ एक फसल उत्सव के रूप में देखा जाता है, लेकिन असल में यह उससे कहीं ज्यादा है। यह उस दौर की याद दिलाता है, जब महाबली के राज्य में हर इंसान बराबर था, कोई भूखा नहीं सोता था और झूठ का कोई स्थान नहीं था। शायद यही वजह है कि केरल हर साल इतने उत्साह से इस “हारे हुए राजा” का स्वागत करता है क्योंकि महाबली सिर्फ एक पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि एक आदर्श व्यवस्था के सपने का प्रतीक बन गए हैं।
जब पूकलम के फूल आंगन में खिलते हैं, कसावु साड़ियां मंदिरों की सीढ़ियों पर चमकती हैं, त्रिशूर की गलियां बाघों के रंग से रंग जाती हैं, और बैकवाटर पर नावें दौड़ पड़ती हैं तब समझ आता है कि ओणम सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि केरल का खुद को हर साल फिर से रंगने का तरीका है।
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