क्या आपने भी ऐसा महसूस किया है? दोपहर में चिलचिलाती धूप, अचानक बारिश का आना और देर रात ठंड का एहसास। ऐसा लगता है जैसे हम किसी पराए देश में रह रहे हों। कहां गए हमारे वो मौसम जो अपने तय समय पर दस्तक देते थे। एक पल रुककर सोचें। बचपन में मौसम कितने रंग लाता था।

सर्दियों की ठंडी हवाएं, बसंत में खिले फूल, गर्मियों की चिलचिलाती धूप और पतझड़ का हल्का सूखापन। हर मौसम अपनी कहानी कहता था। लेकिन अब कुछ बदल गया है। आजकल तो लगता है हमें सिर्फ़ तीन ही मौसम का एहसास होता है। गर्मियां इतनी लंबी हो गईं कि बसंत और पतझड़ गायब हो गए। मानसून बस एक झलक दिखाकर चला जाता है। इस साल बदलते मौसम के कारण हुए हादसों ने इसे और भी स्पष्ट कर दिया। ये कोई कहानी नहीं, जलवायु परिवर्तन की हकीकत है। आइए आपको बताते हैं इस बदलाव और इसके दर्दनाक नतीजों की कहानी।
मौसमों का पुराना जादू
पहले मौसम एक तयशुदा लय में चलते थे। पृथ्वी सूरज के चारों ओर चक्कर लगाती है, और उसका झुकाव मौसमों को जन्म देता है। जब उत्तरी गोलार्ध सूरज की ओर झुकता है, तो गर्मी आती है। जब दूर जाता है, तो सर्दी। वसंत और शरद इस बीच की कहानी कहते थे। भारत में तो छह मौसम माने जाते थे: बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर। कवियों ने इनके गीत लिखे, किसानों ने इनके हिसाब से खेती की। लेकिन अब यह लय बिगड़ गई। वसंत और शरद जैसे एक-दूसरे में मिल गए। अब सिर्फ गर्मी, सर्दी और मानसून की झलक बची है।
जलवायु परिवर्तन की सच्चाई
इस बदलाव की जड़ में जलवायु परिवर्तन है। पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, और इसके लिए हम इंसान जिम्मेदार हैं। कारखानों का धुआं, गाड़ियों की भीड़, जंगलों का कटना—ये सब ग्रीनहाउस गैसें बनाते हैं। ये गैसें गर्मी को पृथ्वी से बाहर निकलने से रोकती हैं, जैसे एक कंबल सूरज की गर्मी को लपेट लेता है। नतीजा? गर्मियां लंबी और तीखी हो गईं। सर्दियां छोटी और कम ठंडी। मानसून का पैटर्न बदल गया। कभी बारिश समय से पहले, तो कभी देर से। कभी बाढ़, तो कभी सूखा। इस साल मौसम बदलने से हुए हादसे इसकी मिसाल हैं।
इस साल मौसम ने दिखाया रौद्र रूप
2025 में मौसम के बदलाव ने भारत को झकझोर दिया। भारी बारिश, बाढ़, भूस्खलन और बादल फटने की घटनाएं बढ़ गईं। उत्तर भारत में पंजाब सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। वहां 43 लोगों की जान गई, और 1,948 गांव जलमग्न हो गए। हिमाचल और उत्तराखंड में भी तबाही मची। अगस्त में उत्तराखंड के चमोली, रुद्रप्रयाग और बागेश्वर में बादल फटने और भूस्खलन से कई लोग मरे, और 50 से ज्यादा लापता हुए। जम्मू में 11 दिन तक स्कूल बंद रहे। पुणे में एक पुराना पुल बारिश की वजह से ढह गया, जिसमें कई लोगों के मरने की आशंका रही। राजस्थान में भी मकान ढहने से भाई-बहन की जान चली गई। ये हादसे बताते हैं कि मौसम अब सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि खतरा बन गया है।
भारत पर क्यों ज्यादा असर?
भारत में मौसमों का बदलाव ज्यादा साफ दिखता है। हमारी अर्थव्यवस्था और संस्कृति मानसून पर टिकी है। देश की 70 फीसदी बारिश मानसून से आती है। लेकिन अब मानसून का मिजाज बदल गया। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में चक्रवात बढ़ गए। समुद्र गर्म हो रहे हैं, जिससे हवाएं तेज और बारिश अनियंत्रित हो रही है। मैंने 2023 में गुजरात में एक चक्रवात देखा। गांव वाले कहते थे, पहले ऐसा नहीं होता था। इस साल आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में दो दिन में इतनी बारिश हुई, जितनी पूरे साल की 27 फीसदी थी। विजयवाड़ा जलमग्न हो गया। ये सब जलवायु परिवर्तन का असर है।
क्यों हम तीन मौसम महसूस करते हैं?
गर्मियां अब अप्रैल से अक्टूबर तक खिंच रही हैं। सर्दियां मुश्किल से दो महीने रहती हैं। वसंत और शरद जैसे गायब हो गए। गर्मी ने वसंत को निगल लिया, और शरद सर्दी में समा गया। मानसून अब भी आता है, लेकिन उसका समय और ताकत अनिश्चित है। कभी एल नीनो, कभी ला निना—ये प्राकृतिक चक्र मौसम को और उलझा रहे हैं। किसानों की मुश्किलें बढ़ रही हैं। शहरों में गर्मी की लहरें जानलेवा हो रही हैं। 2024 में भारत ने रिकॉर्ड तोड़ गर्मी देखी। फरवरी में अप्रैल जैसी गर्मी। यह कोई एक साल की बात नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन का लंबा ट्रेंड है।
भविष्य में क्या होगा?
अगर यही हाल रहा, तो 2100 तक गर्मियां छह महीने तक रहेंगी। सर्दियां बस नाम की रह जाएंगी। वसंत और शरद इतिहास की बात हो जाएंगे। मानसून और अनियंत्रित होगा। ज्यादा तूफान, बाढ़ और सूखा। समुद्र का स्तर बढ़ेगा, और तटीय इलाके खतरे में होंगे। यह डरावना लगता है, लेकिन सच है। इस साल मौसम बदलने से हुए हादसे इसकी चेतावनी हैं। उत्तराखंड में केदारनाथ यात्रा भूस्खलन की वजह से रुकी। हिमाचल में सड़कें बंद हुईं। ये घटनाएं बताती हैं कि हमें अब जागना होगा।
उम्मीद की किरण
लेकिन उम्मीद बाकी है। अगर हम ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखें, तो बहुत कुछ बच सकता है। सौर और पवन ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ाना होगा। जंगल बचाने होंगे। हर छोटा कदम मायने रखता है। मैंने अपने घर में सौर पैनल लगवाए। बिजली का बिल कम हुआ, और पर्यावरण को भी मदद मिली। तुम भी कोशिश करो। सरकारों को भी जिम्मेदारी लेनी होगी। नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना होगा। जंगलों को बचाना होगा।
हम हैं जिम्मेदार
सच कहूं, तो इस बदलाव के लिए हम ही जिम्मेदार हैं। औद्योगिक क्रांति से लेकर अब तक, हमने कोयला, तेल और गैस जलाए। इससे कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ा, जिसने पृथ्वी को गर्म कर दिया। भारत में जनसंख्या ज्यादा है, लेकिन उत्सर्जन के मामले में हम सबसे पीछे। फिर भी, जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर हम पर। यह अन्याय है, लेकिन हमें लड़ना होगा। पेरिस समझौता जैसे कदम उम्मीद जगाते हैं, बशर्ते दुनिया साथ दे।
हम क्या कर सकते हैं?
निराश होने की जरूरत नहीं। छोटी-छोटी चीजें बड़ा बदलाव ला सकती हैं। घर में LED बल्ब लगाओ। पानी बचाओ। साइकिल या सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करो। पेड़ लगाओ। मैंने अपने घर में प्लास्टिक कम किया और रीसाइक्लिंग शुरू की। फर्क दिखा। वोट की ताकत मत भूलो। पर्यावरण के लिए सही नीतियों का समर्थन करो। इस साल मौसम बदलने से हुए हादसों ने हमें सिखाया कि अब देर करने का वक्त नहीं।


