सोचिए ज़रा, सुबह-सुबह आप हर दिन की तरह अपने घर से निकलते हैं ऑफिस जाने के लिए। लेकिन आज आपने सोचा हर दिन तो मैं किसी न किसी साधन का इस्तेमाल करता ही हूं, क्यों न आज पैदल ही चला जाए। सेहत के लिए भी अच्छा रहेगा, और थोड़ी बचत भी हो जाएगी।
आपने मुंबई के फुटपाथ और सड़कों पर चलकर ऑफिस जाने का इरादा बना लिया। लेकिन जैसे ही घर से दो मिनट आगे बढ़े, वैसे ही कहीं गड्ढे दिखने लगे, कई जगह फुटपाथ टूटे हुए मिले, कहीं नंगी तार लटकती मिलीं जो कब किसे नुकसान पहुंचा दें, कोई भरोसा नहीं। किसी मोड़ पर एक ठेला इस तरह खड़ा है कि पूरा फुटपाथ ही घेर लिया है, तो कहीं दो गाड़ियां इस अंदाज़ में पार्क हैं मानो फुटपाथ पैदल चलने वालों के लिए नहीं, उन्हीं के लिए बना हो। जो थोड़ी जगह बचती भी है, वहां मलबा या निर्माण का सामान पड़ा मिल जाता है, मानो शहर ने पैदल चलने वालों को भुला ही दिया हो। अंधेरी हो या दादर, बांद्रा हो या घाटकोपर स्टेशन के बाहर निकलते ही यही नज़ारा दिखता है, फर्क बस इतना है कि कहीं अतिक्रमण कम है, कहीं ज़्यादा।
बस! अब क्या? जो चलकर ऑफिस जाने का मन बनाया था, उस पर पानी फिर गया। बस इसीलिए लोग साधनों का इस्तेमाल करते हैं यह सोच-समझकर लिया गया फैसला है, आलस नहीं।
हमारे डॉक्टरों का कहना है कि अगर हमें एक किलोमीटर की दूरी पर जाना है, तो हम किसी साधन का इस्तेमाल न करें, बल्कि पैदल जाएं। सलाह अच्छी है, दिल से दी गई है। लेकिन जिस तरह की सड़कें और फुटपाथ हमारे यहां हैं, उन पर तो कोई एक मीटर चलने से पहले भी सोचेगा। हर कदम पर यह डर रहता है कि कहीं पैर मुड़ न जाए, कहीं किसी खुले गड्ढे में गिर न जाएं, कहीं कोई तार छू न जाए।
हां, अगर किसी इंसान के पास पैसों की कमी है, या उस दिन उसके पास पैसे नहीं हैं, तो वह ज़रूर ही चलकर जाएगा, वरना नहीं। और ऐसी सड़कों पर चलकर अपनी जान गंवाने से अच्छा, जनता तीस-चालीस रुपये खर्च करके अपनी जान बचाना ज़्यादा ज़रूरी समझती है। यहीं असली बात छिपी है जब हर दिन का सफर एक जोखिम बन जाए, तो दिमाग खुद-ब-खुद सुरक्षित रास्ता चुन लेता है, चाहे उसके लिए जेब से कुछ पैसे ही क्यों न जाएं।
अगर यह चाहत चलने की, खुद को फिट रखने की हम में पहले से मौजूद है, तो फिर सवाल यह उठता है कि यह पहले मुमकिन था, और आज मुश्किल क्यों हो गया। लोकल ट्रेन पकड़ने के लिए जिस रफ्तार से लोग प्लेटफॉर्म पर दौड़ते हैं, वह किसी भी फिटनेस चैलेंज से कम नहीं। सब्ज़ी वाला, रेहड़ी वाला, डिलीवरी बॉय ये सब दिनभर पैदल चलते हैं, कई किलोमीटर तक, बिना किसी वेलनेस रिपोर्ट के कहे। तो सवाल यह नहीं है कि हम चलना चाहते हैं या नहीं, सवाल यह है कि हमें चलने के लिए एक सुरक्षित जगह मिलती है या नहीं।
हमारे बड़े-बुज़ुर्ग, हमारे दादा-दादी, नाना-नानी की पीढ़ी बाज़ार तक, मंदिर तक, स्टेशन तक पैदल ही जाया करती थी, और नब्बे साल तक स्वस्थ जीवन जीती थी। उस दौर में फुटपाथ, फुटपाथ हुआ करते थे चौड़े, खाली, चलने लायक। आज वही फुटपाथ पार्किंग, दुकान और मलबे की जगह बन चुके हैं। बदलाव हमारी सेहत में नहीं आया, बदलाव शहर के ढांचे में आया है।
फिटनेस रिपोर्ट्स और वेलनेस एक्सपर्ट्स हर कुछ महीनों में यही सलाह दोहराते हैं कम बैठो, ज़्यादा चलो, गाड़ी छोड़ो। सलाह गलत नहीं है, लेकिन यह तभी काम करेगी जब चलने के लिए एक भरोसेमंद रास्ता भी मिले। जब तक फुटपाथ पर गड्ढे, नंगी तारें और अतिक्रमण रहेंगे, तब तक यह सलाह सिर्फ रिपोर्ट के पन्नों पर ही अच्छी लगती रहेगी।
और मज़े की बात यह है कि जिस साधन का सहारा लेकर हम इन खतरों से बचते हैं, वह भी हमें बैठे रहने पर ही मजबूर करता है। ऑटो हो, बस हो या टैक्सी ट्रैफिक में फंसे-फंसे उतनी ही देर बैठे रहते हैं जितनी देर में शायद पैदल पहुंच जाते, अगर रास्ता सही होता। यानी न चलने का फायदा मिलता है, न बैठे रहने से बचत होती है। नुकसान सिर्फ जेब का होता है, और वह भी इसलिए क्योंकि सड़क पर चलना एक विकल्प ही नहीं बचा।
तो अगली बार जब कोई रिपोर्ट यह कहे कि हम आलसी हैं, बैठे-बैठे मोटे हो रहे हैं, तो पूछिए उनसे किस फुटपाथ पर चलकर? जिस दिन फुटपाथ असली फुटपाथ बन जाएंगे, बिना गड्ढों के, बिना अतिक्रमण के, उस दिन किसी को याद दिलाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी कि पैदल चलना अच्छा है। तब तक, तीस-चालीस रुपये खर्च करके जान बचाना ही सबसे समझदारी वाला फैसला रहेगा और इसमें शर्माने की कोई बात नहीं है।
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