एक वक्त था जब बंगाल का नाम सुनते ही मन में रवींद्रनाथ टैगोर की कविताएं, सत्यजित रे की फिल्में और उत्पल दत्त का रंगमंच सामने आ जाता था। बंगाल सिर्फ एक भौगोलिक प्रदेश नहीं था वह एक संस्कृति थी, एक सोच थी, एक तहज़ीब थी। उस दौर में शाम की बैठकों में रवींद्र संगीत गूंजता था, किताबें पढ़ी जाती थीं और अद्दा यानी खुली बहस एक आम आदत थी। लेकिन आज वह बंगाल धीरे-धीरे कहीं खोता नज़र आ रहा है।
बंगाल की वह सुनहरी विरासत
बंगाली भाषा ने दुनिया को कुछ असाधारण रचनाकार दिए। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वंदे मातरम्’ लिखी, जिसने पूरे स्वतंत्रता आंदोलन को जगाया। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने आम आदमी के दर्द को अपनी कलम से अमर किया। काज़ी नज़रुल इस्लाम ने अपनी विद्रोही कविताओं से जुल्म और फ़िरकापरस्ती के खिलाफ़ आवाज़ उठाई। रवींद्रनाथ टैगोर कवि, दार्शनिक, संगीतकार, नाटककार साहित्य में नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले एशियाई थे (1913) और उन्होंने बंगाली साहित्य को विश्व मंच पर स्थापित किया।
संगीत के क्षेत्र में भी बंगाल का कोई जवाब नहीं था। हेमंत कुमार (हेमंत मुखोपाध्याय) की आवाज़, मन्ना डे की संगीत साधना, संध्या मुखोपाध्याय, गीता दत्त इन सबने पीढ़ियों की भावनात्मक यादों को सींचा। सिनेमा में सत्यजित रे ने अपनी मानवीय फिल्मों से बंगाली सिनेमा को विश्व मंच पर पहुंचाया, तो रित्विक घटक ने विभाजन के दर्द को अनूठे तरीके से परदे पर उतारा। रंगमंच में उत्पल दत्त ने नाटक को राजनीतिक हथियार बनाया। बादल सिरकार ने ‘थर्ड थिएटर’ प्रयोग से भारतीय नाट्य कला को नई दिशा दी। यह विरासत सिर्फ मनोरंजन नहीं थी यह एक सभ्यता थी।
अब क्या हाल है?
आज कोलकाता की सड़कों पर, दुकानों में, रेलवे स्टेशनों पर और शॉपिंग मॉलों में हिंदी तेज़ी से बढ़ रही है। कैब चालक, दुकानदार, कस्टमर केयर केंद्र हर जगह हिंदी भाषा में काम चल रहा है। और दिलचस्प यह है कि स्थानीय बंगाली वाले खुद बिना किसी विरोध के हिंदी में स्विच कर लेते हैं। कोई पूछता तक नहीं कि बंगाल में रहने वालों को बंगाली क्यों नहीं सीखनी चाहिए।
नई पीढ़ी बंगाली साहित्य स्कूल के पाठ्यक्रम से आगे नहीं पढ़ती। टैगोर को लोग एक सांस्कृतिक प्रतीक की तरह मानते हैं, लेकिन उन्हें गहराई से पढ़ते नहीं। घरों से रवींद्र संगीत गायब हो चुका है। उसकी जगह बॉलीवुड के गाने, इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब वीडियो ने ले ली है। नेटफ्लिक्स देखना और हिंदी सीरीज़ में डूबना आज का आम चलन बन गया है। बंगाली भाषा वाले खुद अपनी बोली बोलने में शर्म महसूस करने लगे हैं।
भाषा का संकट
आज कोलकाता की गलियों में एक अजीब भाषाई मिश्रण सुनाई देता है बंगाली, हिंदी और अंग्रेज़ी की एक अजीब खिचड़ी। पढ़े-लिखे बंगाली युवा अक्सर अपनी मातृभाषा में सहजता से नहीं बोल पाते। भाषाएं स्वाभाविक रूप से विकसित होती हैं और एक-दूसरे से शब्द उधार लेती हैं। खुद बंगाली ने सदियों तक संस्कृत, फ़ारसी, अरबी, पुर्तगाली और अंग्रेज़ी से शब्द अपनाए हैं। लेकिन आज जो हो रहा है वह सांस्कृतिक विकास नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विस्थापन लगता है।
राजनीति भी इसमें भूमिका निभा रही है। बंगाल के नेता अक्सर चुनावी रैलियों में हिंदी में बोलते हैं। यह चुनावी नज़रिए से समझ में आता है, लेकिन इसका एक संदेश भी जाता है जैसे बंगाल में बंगाली की आवश्यकता नहीं रही। पश्चिम बंगाल में अगला विधानसभा चुनाव 2026 के अंत या 2027 में अपेक्षित है यह देखना होगा कि आने वाली सरकार बंगाली भाषा और संस्कृति को उचित स्थान देती है या नहीं।
तमिलनाडु से सीखना होगा
इस मामले में तमिलनाडु से सीखा जा सकता है। तमिल लोग आधुनिकता अपनाते हैं, लेकिन तमिल छोड़ते नहीं। वे अंग्रेज़ी में काम करते हैं, हिंदी फ़िल्में देखते हैं, लेकिन अपनी भाषा और संस्कृति से गर्व के साथ जुड़े रहते हैं। वहाँ तमिल में लिखी फ़िल्में, नाटक, साहित्य सब कुछ फल-फूल रहा है। बंगाल को वही जज़्बा चाहिए।
बंगाली अक्सर यह सोचते हैं कि अपनी भाषा पर ज़ोर देना पुराने ज़माने की बात है। अंग्रेज़ी पढ़ना तरक्की की निशानी मानी जाती है और हिंदी मनोरंजन की दुनिया पर राज करती है। ऐसे में बंगाली अपनी ही मातृभाषा से माफ़ी माँगते नज़र आते हैं। यह सांस्कृतिक असुरक्षा की भावना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से कटने की प्रक्रिया है।
विरासत को बचाना होगा
यह भी सच है कि बंगाल में सांस्कृतिक पुनरुत्थान के प्रयास पूरी तरह थमे नहीं हैं। टॉलीवुड की बंगाली फिल्में आज भी दर्शकों को आकर्षित करती हैं। कोलकाता पुस्तक मेला विश्व के सबसे बड़े पुस्तक मेलों में से एक है और वहाँ बंगाली साहित्य की माँग बनी हुई है। लेकिन यह प्रयास पर्याप्त नहीं हैं जब तक घरों और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बंगाली की जगह सुरक्षित न हो।
टैगोर, नज़रुल इस्लाम, सत्यजित रे, रित्विक घटक और उत्पल दत्त की विरासत वाले बंगाल को अपनी ही धरती पर सांस्कृतिक रूप से असुरक्षित नहीं होना चाहिए। यह समस्या सिर्फ भाषा की नहीं है यह दिल से जुड़ाव की है, अपनी पहचान की है। अगर बंगाली लोग अंतरराष्ट्रीय सिनेमा देखते हैं, विश्व संगीत सुनते हैं और अंग्रेज़ी में बोलते हैं, तो इसमें कोई बुराई नहीं। तकलीफ तब है जब वे अपनी स्वयं की विरासत से मुँह फेर लेते हैं।
सभ्यताएं रातों-रात नहीं मरतीं। वे धीरे-धीरे उदासीनता से, लापरवाही से, और चुप्पी से विलीन होती हैं। और जब तक लोग समझते हैं, तब तक बहुत देर हो जाती है। आज भी बंगाल के किसी घर से रवींद्र संगीत की आवाज़ आती है, किसी कोने में टैगोर की कोई किताब रखी होगी। वह लौ अभी बुझी नहीं है। लेकिन सवाल यह है क्या नई पीढ़ी इस लौ को थामने की कोशिश करेगी, या फिर एक महान सभ्यता अपने ही लोगों की उदासीनता की भेंट चढ़ जाएगी?
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