१९ फरवरी २०२६ को वाशिंगटन में ट्रम्प ने फिर वही कहा। भारत पाकिस्तान का टकराव उन्होंने रोका। हथियार था २०० प्रतिशत टैरिफ की धमकी। दावा था कि पैसे के डर से युद्ध थमा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि ११ लड़ाकू विमान मार गिराए गए। भारत ने हर दावे को खारिज किया है। यह टकराव सिर्फ बयानों का नहीं। कूटनीति, इतिहास और उस रणनीतिक खेल का भी है जो हर बयान के पीछे चलता रहता है।

पहलगाम से ऑपरेशन सिंदूर तक

२२ अप्रैल २०२५ को पहलगाम में आतंकियों ने २६ पर्यटकों को मार डाला। यह हमला सुनियोजित था और सीधे भारत की संप्रभुता को चुनौती देता था। भारत ने जवाब दिया। ७ मई को ऑपरेशन सिंदूर के जरिये। पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में जैश ए मोहम्मद और लश्कर ए तैयबा के नौ से अधिक ठिकाने नष्ट किए गए। यह कार्रवाई सटीक थी और संयमित भी। किसी नागरिक या सैन्य ढाँचे को निशाना नहीं बनाया गया। भारत ने शुरू से यह बात साफ रखी।

संघर्षविराम का सच

ट्रम्प कहते हैं कि उनके फोन और टैरिफ की धमकी ने दोनों देशों को रोका। भारत का जवाब सीधा है। संघर्षविराम दोनों देशों के सेना महानिदेशकों यानी DGMO के बीच सीधी बातचीत से हुआ। कोई तीसरा पक्ष नहीं था। प्रधानमंत्री मोदी ने खुद कहा कि किसी विश्व नेता ने ऑपरेशन रोकने को नहीं कहा। ९ मई की रात अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने उनसे संपर्क करने की कोशिश की थी जब वे सेना के साथ बैठक में थे। बाद में जब मोदी ने कॉल लौटाया और पाकिस्तान की आक्रामकता की सूचना दी गई तो उनका जवाब था कि परिणाम गंभीर होंगे।

बदलती संख्याएँ, घटती विश्वसनीयता

१० मई २०२५ को ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर ऐलान किया था कि अमेरिकी मध्यस्थता से संघर्षविराम हुआ। तब से यह दावा हर मंच पर दोहराया जाता है। पहले सात विमान थे, फिर आठ हुए और अब ११ हो गए। यह गिनती हर बार बढ़ती है। कूटनीति में विश्वसनीयता ही असली पूँजी होती है। जब तथ्य बदलते रहें तो उन पर खड़ी पूरी कथा खुद ही दरकने लगती है।

शरीफ का मंच और पुरानी चाल

शहबाज शरीफ उसी कार्यक्रम में थे जहाँ ट्रम्प ने यह बयान दिया। उन्होंने ट्रम्प को शांति का दूत बताया और कहा कि उन्होंने ढाई करोड़ लोगों की जान बचाई। यह महज तारीफ नहीं थी। यह एक पुरानी रणनीति का नया रूप था। एक बार मध्यस्थता का आख्यान स्थापित हो जाए तो कश्मीर का मुद्दा द्विपक्षीय से अंतरराष्ट्रीय बन जाता है। पाकिस्तान यही चाहता है और दशकों से यही कोशिश करता आया है। शरीफ और ट्रम्प एक ही मंच पर खड़े थे लेकिन भारत ने उस कहानी में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया।

टैरिफ से युद्ध नहीं रुकते

ट्रम्प का तर्क है कि व्यापारिक दंड सशस्त्र संघर्ष रोक सकता है। यह आर्थिक कूटनीति का एक नजरिया है लेकिन इसकी सीमा स्पष्ट है। भारत पाकिस्तान का यह टकराव आतंकवाद, सीमा सुरक्षा और संप्रभुता का सवाल था। राष्ट्रीय सुरक्षा के फैसले निर्यात आयात की तालिकाओं से नहीं होते। उसी दौर में भारत अमेरिका व्यापार समझौते की बातचीत भी चल रही थी। ट्रम्प हर कूटनीतिक घटनाक्रम को अपनी व्यापारिक जीत के रूप में पेश करते हैं। यह उनकी शैली है लेकिन शैली को तथ्य नहीं कहा जा सकता।

भारत की रणनीतिक स्वायत्तता

भारत की विदेश नीति में एक बात अटल रही है। पाकिस्तान से जुड़े किसी भी मसले पर किसी तीसरे पक्ष की भूमिका मंजूर नहीं है। यह कोई रस्मी रुख नहीं है। इसकी व्यावहारिक जरूरत है। एक बार बाहरी मध्यस्थता की नजीर बन जाए तो वह बार-बार लौटती है। इसीलिए भारत ने हर दावे का तत्काल खंडन किया। अमेरिका के साथ गहरे संबंध हों। यह भारत चाहता है। लेकिन अपनी शर्तों पर। यही रणनीतिक स्वायत्तता का असली अर्थ है।

इतिहास तथ्यों से लिखा जाता है, आवाज से नहीं

ऑपरेशन सिंदूर भारत की सैन्य क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति दोनों का प्रमाण था। DGMO स्तर की बातचीत के दस्तावेज हैं। प्रधानमंत्री के वक्तव्य दर्ज हैं। दूसरी तरफ ट्रम्प की संख्याएँ हर बार बदलती हैं। इतिहास उन्हें नहीं लिखता जो सबसे ऊँची आवाज में बोलते हैं। इतिहास उन्हें दर्ज करता है जो तथ्यों के साथ खड़े रहते हैं। पहलगाम में जो हुआ उसका जवाब भारत ने दिया। अपने बल पर, अपने फैसले से, अपनी शर्तों पर। यही इस पूरे प्रकरण की सबसे बड़ी और सबसे स्थायी सच्चाई है।

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