बेंगलुरु की एक आम मंगलवार की सुबह की कल्पना कीजिए। एक युवा सॉफ्टवेयर इंजीनियर के पास सुबह दस बजे क्लाइंट कॉल है, शुक्रवार को डेडलाइन है, और फोन पर रिमाइंडर चमक रहा है: “नानी का श्राद्ध आज।” उसका पैतृक घर बिहार में है, दो दिन की यात्रा दूर। इसलिए वह किराए के फ्लैट में दीया जलाती है, नानी की पसंद का व्यंजन बनाती है, और लैपटॉप खोलने से पहले पांच मिनट शांत बैठती है। क्या इतना काफी है? इस पितृ पक्ष में कई युवाओं के मन में यही सवाल उठ रहा है।
पितृ पक्ष हिंदू पंचांग का वह पखवाड़ा है जो श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के जरिए पूर्वजों को याद करने के लिए तय है। इस वर्ष यह 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा। कई घरों में यह पूरे परिवार का आयोजन होता रहा है, जिसमें बड़े तिथि तय करते हैं और बच्चे देखकर सीखते हैं। यह तस्वीर मानती रही है कि सब एक ही जगह रहते हैं। आज बहुत से लोग नहीं रहते।
काम के लिए घर छोड़ना भारत में नया नहीं है। 2011 की जनगणना में लगभग 45 करोड़ आंतरिक प्रवासी दर्ज हुए थे, यानी आबादी का करीब 37 प्रतिशत, हालांकि इनमें बड़ी संख्या उनकी थी जो शादी के बाद दूसरी जगह गए। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के एक अध्ययन के अनुमान के मुताबिक 2023 में यह संख्या घटकर करीब 40 करोड़ रह गई है, फिर भी करोड़ों लोग अपने गृहनगर से दूर रहते हैं। नौकरी, पढ़ाई और किराए ने बहुत से परिवारों को शहरों में बिखेर दिया है, और श्राद्ध की तिथियां दफ्तर की छुट्टी देखकर नहीं बदलतीं।
परंपरा, जैसा कि अक्सर होता है, खुद को ढाल रही है। इस सप्ताह वाराणसी से आई खबरों में बताया गया कि काशी के पंडित स्मार्टफोन, ट्राइपॉड और वीडियो कॉल की मदद से उन श्रद्धालुओं के लिए तर्पण और पिंडदान करा रहे हैं जो काशी नहीं पहुंच सकते। खबर में खास तौर पर अमेरिका, जापान, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और स्पेन में रहने वाले प्रवासी भारतीयों का जिक्र है, जिनके लिए वीजा, काम और यात्रा का खर्च बाधा हैं। ई-पिंडदान के पैकेज 5,100 से 51,000 रुपये तक के बताए गए हैं। गुरुग्राम की एक ऐप-आधारित सेवा से जुड़े अधिकारी के मुताबिक ऑनलाइन त्रिपिंडी अनुष्ठान के लिए अब तक 100 से ज्यादा बुकिंग मिली हैं, जिनमें करीब 20 प्रतिशत ग्राहक प्रवासी भारतीय हैं। यजमान वीडियो कॉल से जुड़कर संकल्प लेता है, जबकि पंडित काशी, गया या हरिद्वार में विधि कराते हैं।
खबर मुख्य रूप से विदेश में बसे लोगों की है, लेकिन दुविधा वही है जो देश के भीतर दूसरे शहर में नौकरी कर रहे लोगों की भी है: छुट्टी न मिले और घर दूर हो, तो श्राद्ध कैसे निभाएं? काशी विद्वत परिषद के महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी का कहना है कि तकनीक ने अनुष्ठान में भागीदारी का तरीका बदला है, पर इससे यात्रा न कर पाने वाले लोग पूर्वजों को याद करना नहीं छोड़ देते। उनके अनुसार किसी भी माध्यम से स्मरण करना, कुछ न करने से बेहतर है। रीति-रिवाज हर परिवार और क्षेत्र में अलग होते हैं, इसलिए जिन घरों में हमेशा घर पर या तीर्थ जाकर ही श्राद्ध होता रहा है, वहां इस बदलाव पर अलग-अलग राय स्वाभाविक है। क्या सही है, यह अपने बड़ों और भरोसेमंद पंडित से पूछना बेहतर है।
ऐसे में लोग अपने तरीके निकाल सकते हैं: दादा-दादी की पसंद का भोजन बनाकर बांटना, जरूरतमंदों को भोजन या अन्न दान करना, जो कई जगहों पर इस अवधि की परंपरा है, या माता-पिता से फोन पर पूछना कि दादा जी का निधन किस तिथि को हुआ था। यह सवाल छोटा नहीं है। श्राद्ध मृत्यु की तिथि के अनुसार किया जाता है, अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख के अनुसार नहीं। जिन पूर्वजों की तिथि ज्ञात नहीं, उनके लिए सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध की परंपरा बताई जाती है। तिथि को लेकर भ्रम हो तो स्थानीय पंचांग की मदद ली जा सकती है। जानकारी बड़ों से पूछकर लिख लेना अगली पीढ़ियों के काम आएगा।
एक व्यावहारिक सावधानी भी जरूरी है। जब कोई परंपरा ऑनलाइन आती है, तो उसके आसपास सेवाओं का बाजार भी बनता है। पैकेज अलग-अलग कीमतों पर मिल रहे हैं, इसलिए भुगतान से पहले पूछ लें कि उसमें क्या-क्या शामिल है। पारंपरिक सलाह यही है कि दान अपनी क्षमता के अनुसार हो।
इन सारी व्यवस्थाओं के नीचे असली बात स्मरण है। पंडित, पिंड और जल माध्यम हैं; मूल यह है कि कोई आज भी अपने पूर्वजों का नाम पुकारता है। व्यस्त और अक्सर घर की याद में डूबी पीढ़ी के लिए खतरा यह नहीं कि वह गलत तरीका चुन लेगी। खतरा यह है कि डेडलाइन और आवाजाही की भागदौड़ में वह उन कहानियों को ही भूल जाएगी।
इसलिए सवाल “ऑनलाइन या मौके पर?” नहीं, बल्कि “क्या मैं याद कर रहा हूं?” है। अपने दादा-दादी से उन लोगों के बारे में पूछिए जो उनसे पहले थे। नाम, तिथियां और छोटी बातें लिख लीजिए: कौन-सा गीत वे गुनगुनाते थे, कौन-सा खाना उन्हें पसंद था, कौन-सी सीख वे दोहराते थे। चाहे आप गया के घाट पर बैठें, छोटे फ्लैट से वीडियो कॉल पर जुड़ें, या किसी भूखे को खाना खिलाएं, आप एक ऐसा वचन निभा रहे हैं जो हमारी पीढ़ी से कहीं पुराना है।
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