By: Ragini Chaubey
क्या आपने कभी तारा रानी श्रीवास्तव का नाम सुना है? या कहीं पढ़ा है? भारत की आज़ादी की कहानी में महात्मा गांधी, नेहरू, भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस जैसे नाम हम सभी को याद हैं। इतिहास की किताबों में हमने कई स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में पढ़ा है, लेकिन कुछ नाम ऐसे भी हैं जिनका ज़िक्र शायद ही कभी हुमने पढ़ा है या सुन है। तारा रानी श्रीवास्तव उन्हीं में से एक हैं। उनकी कहानी साहस, त्याग और कर्तव्य की ऐसी मिसाल है, जिसे जानने के बाद शायद ही कोई उसे भूल पाए।
तारा रानी बिहार के सारण ज़िले की रहने वाली थीं, जो राजधानी पटना के पास स्थित है। वे एक साधारण परिवार में जन्मी थीं और कम उम्र में ही उनका विवाह फुलेंदु बाबू से हो गया था। फुलेंदु बाबू स्वयं स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े हुए थे और गांधीजी के विचारों से प्रभावित थे। विवाह के बाद तारा रानी ने घर-गृहस्थी तक सीमित रहने के बजाय पति के साथ देश की आज़ादी की लड़ाई में कदम से कदम मिलाकर चलने का रास्ता चुना। उस दौर में, जब छोटे कस्बों और गांवों की महिलाओं के लिए सार्वजनिक आंदोलनों में हिस्सा लेना आसान नहीं था, यह फ़ैसला अपने आप में साहसिक था। देश के प्रति उनका प्रेम अटूट था।
अगस्त 1942 में महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन का ऐलान किया। 8 अगस्त को कांग्रेस ने प्रस्ताव पारित किया और देश भर में आंदोलन की लहर दौड़ गई। बिहार में भी जगह-जगह जुलूस निकले और सरकारी इमारतों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने की कोशिशें हुईं। तारा रानी और फुलेंदु बाबू ने भी अपने इलाके में लोगों को संगठित किया। उनका लक्ष्य था सीवान थाने पर तिरंगा फहराना, जो उस समय अंग्रेज़ी हुकूमत की सत्ता का प्रतीक माना जाता था।
12 अगस्त 1942 को फुलेंदु बाबू और तारा रानी के नेतृत्व में पुरुषों और महिलाओं की एक बड़ी भीड़ सीवान थाने की ओर बढ़ी। दोनों जुलूस में सबसे आगे चल रहे थे और अंग्रेज़ों के विरोध में नारे लगा रहे थे। पुलिस को यह बिल्कुल मंज़ूर नहीं था। पहले उन्होंने लाठीचार्ज करके भीड़ को रोकने की कोशिश की, लेकिन प्रदर्शनकारी रुके नहीं और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहे। इसके बाद पुलिस ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं।
इसी गोलीबारी में फुलेंदु बाबू को गोली लगी और वे ज़मीन पर गिर पड़े। चारों ओर अफ़रा-तफ़री मच गई। उस क्षण तारा रानी ने जो किया, वह इतिहास में दर्ज हो गया। उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ा और उससे पति के ज़ख़्म पर पट्टी बांध दी। लेकिन वे वहीं रुकी नहीं। वे राष्ट्रीय ध्वज लेकर थाने की ओर आगे बढ़ती रहीं, ताकि जिस उद्देश्य के लिए वे निकली थीं, उसे पूरा कर सकें। उन्होंने थाने पर झंडा फहराने का प्रयास किया।
जब वे थाने से लौटीं, तब उन्हें पता चला कि फुलेंदु बाबू ने दम तोड़ दिया है। यह दुख किसी भी इंसान को तोड़ देने के लिए काफ़ी था, पर तारा रानी टूटी नहीं। 15 अगस्त 1942 को छपरा में फुलेंदु बाबू के बलिदान के सम्मान में एक प्रार्थना सभा आयोजित की गई। तारा रानी 15 अगस्त 1947 को देश के आज़ाद होने तक स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी रहीं।
आज़ादी का अमृत महोत्सव के अंतर्गत भारत सरकार के “अनसंग हीरोज़” यानी गुमनाम नायकों से जुड़े अभियान में उनकी कहानी दर्ज है। यह इस बात की याद दिलाती है कि राष्ट्रीय आंदोलन केवल बड़े शहरों और बड़े नेताओं तक सीमित नहीं था। उसे छोटे कस्बों और गांवों में ऐसे लोगों ने आगे बढ़ाया, जिनके नाम मुख्यधारा के इतिहास में कम ही जगह पा सके। इनमें महिलाओं की भूमिका और भी कम चर्चित रही है, जबकि 1942 के आंदोलन में बिहार से लेकर असम और बंगाल तक महिलाओं ने जुलूसों का नेतृत्व किया और गोलियों का सामना किया।
अब ज़रा सोचिए, अगर तारा रानी की जगह हम होते तो क्या करते? ज़्यादातर लोग शायद वही करते जो इंसानी स्वभाव है: अपने घायल जीवनसाथी को संभालते, उनके पास बैठकर रोते और हो सकता है कि अपने लक्ष्य को छोड़ भी देते। इसमें कोई शर्म की बात नहीं है। लेकिन तारा रानी ने उस क्षण के असहनीय दर्द के बीच भी अपने लक्ष्य को सर्वोपरि रखा। उनके लिए तिरंगा केवल कपड़े का एक टुकड़ा नहीं था। वह उस आज़ादी का प्रतीक था, जिसके लिए उनके पति अपनी जान दे रहे थे।
आज जब हम आज़ाद हवा में सांस लेते हैं, तो ज़रूरी है कि हम सिर्फ़ उन्हीं नामों को याद न रखें जो पाठ्यपुस्तकों में दर्ज हैं। तारा रानी श्रीवास्तव जैसे नायकों की कहानियां हमें याद दिलाती हैं कि आज़ादी किसी एक दिन या एक व्यक्ति की देन नहीं थी। वह अनगिनत साधारण लोगों के असाधारण साहस का परिणाम थी। उनका नाम जानना और दूसरों तक पहुंचाना, उनके प्रति हमारी सबसे छोटी लेकिन सबसे ज़रूरी श्रद्धांजलि है।
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