सुपरस्टार, सुपर डायरेक्टर और सुपर प्रोड्यूसर होने के बावजूद, सिकंदर औसत दर्जे से ऊपर नहीं उठ पाती। यह फिल्म हाई-बजट तो है, लेकिन कई स्तरों पर दिवालिया और थकाऊ साबित होती है।
सालों की सुपरस्टारडम और अनुभव के बावजूद, ऐसा समय आता है जब कोई सुपरस्टार यह समझने में असमर्थ हो जाता है कि एक अच्छी फिल्म कैसे बनती है। सलमान खान अपने करियर के उस मुकाम पर हैं, जहां वे जो भी छूते हैं, वह सोना बन सकता है। फिर भी, ए. आर. मुर्गदास जैसे काबिल निर्देशक के होते हुए भी सिकंदर ऐसी क्यों बनी? साजिद नाडियाडवाला भी किसी से कम नहीं, फिर उनकी प्रोडक्शन में ऐसी फिल्म कैसे बन गई?
2017 में टाइगर जिंदा है के बाद से, सलमान कोई बड़ी हिट नहीं दे पाए हैं। सिकंदर उनकी एक और औसत फिल्म साबित होती है। फिल्म की असली समस्या इसकी कहानी और पटकथा में है, जिसे खुद मुर्गदास ने लिखा है।

संजय राजकोट (सलमान खान), राजकोट के शाही परिवार का उत्तराधिकारी है। शहरवासी उसे देवता समान पूजते हैं। उसे “राजा साहब” और “सिकंदर” भी कहा जाता है। उसकी पत्नी साईश्री (रश्मिका मंदाना) के साथ उसका जीवन सुखमय है।
फिल्म की शुरुआत एक फ्लाइट में होती है, जहां संजय, अर्जुन (प्रतीक बब्बर) को मोनिका (नेहा अय्यर) के साथ दुर्व्यवहार करने पर पीट देता है। मोनिका एक पूर्व एडल्ट फिल्म अभिनेत्री है। यह घटना महाराष्ट्र के मंत्री प्रधान (सत्यराज) को गुस्सा दिला देती है, जो अर्जुन के पिता हैं। प्रधान, संजय से बदला लेने की कसम खाता है।
बाद में, प्रधान द्वारा एक खदान में कराए गए धमाके में साईश्री घायल हो जाती है और उसकी मौत हो जाती है। उसकी अंतिम इच्छा के अनुसार, उसके दिल, आंखें और फेफड़े दान कर दिए जाते हैं, जिससे मुंबई के तीन लोगों की जान बचती है—धारावी में रहने वाला लड़का कमरुद्दीन (अयान खान), युवती निशा (अंजिनी धवन) और गृहिणी वैदेही (काजल अग्रवाल)।
संजय मुंबई जाता है ताकि इन लोगों से मिलकर खुद को सुकून दे सके, लेकिन वहां उसका टकराव प्रधान से हो जाता है। इस संघर्ष के दौरान, अर्जुन की मौत हो जाती है। अब प्रधान बदला लेने के लिए इन तीन अंग प्राप्तकर्ताओं को निशाना बनाता है। इस टकराव की परिणति ही सिकंदर की कहानी का सार है।

कुछ फिल्में तमाम सवाल खड़े करने के बावजूद दर्शकों को बांधे रखती हैं, भले ही उनकी कहानी अविश्वसनीय हो। बड़े पर्दे पर असंभव दिखने वाले दृश्यों को भी माफ किया जा सकता है। लेकिन सिकंदर में लॉजिक को किनारे रखने पर भी आनंद नहीं आता।
मुंबई और हैदराबाद में फिल्माई गई सिकंदर कई कमियों से भरी है, जिसकी शुरुआत पटकथा से होती है। जिस इंसान के पास देश के 25% सोने का स्वामित्व है, वह ऐसे व्यवहार करता है, जैसे वह आम आदमी हो। मुर्गदास ने गजनी में आमिर खान को भी एक अमीर बिजनेसमैन का किरदार दिया था, लेकिन पटकथा इतनी प्रभावशाली थी कि उसकी अविश्वसनीय बातें भी विश्वसनीय लगी थीं। सिकंदर में ऐसा नहीं होता।
सिकंदर राजकोट से मुंबई के बीच जनरल ट्रेन डिब्बे में क्यों यात्रा करता है? उसके एक डायलॉग से वैदेही के ससुर का दिल कैसे बदल जाता है? प्रधान को संजय राजकोट के रुतबे की जानकारी क्यों नहीं, जबकि पूरा इंटरनेट जानता है कि वह कौन है? संजय मुंबई में आम आदमी की तरह हफ्तों तक कैसे घूमता रहता है, बिना किसी की नजर में आए? वह काली-पीली टैक्सी में क्यूं घुमता है?
फिल्म इतने सवालों से भरी है कि दर्शक जुड़ने के बजाय दूर होते जाते हैं। अंततः, सिकंदर एक ऐसी फिल्म बन जाती है जिससे दर्शक जल्द से जल्द निकल जाना चाहता है।

तकनीकी रूप से भी फिल्म कुछ खास नहीं देती। सिनेमैटोग्राफी, एडिटिंग और एक्शन सीन्स भी प्रभावित नहीं करते। स्लो-मोशन शॉट्स, विजुअल ट्रिक्स और सलमान के लिए दर्शकों की भावनाएं ही एक्शन सीक्वेंस को बस सहने लायक बनाती हैं।
संगीत कमजोर है। प्रीतम के गाने जबरदस्ती ठूंसे हुए लगते हैं। शायद दस साल पहले ऐसे अनावश्यक गाने माफ हो जाते थे, लेकिन आज के दर्शक अब वैसे गाने नहीं स्वीकारते। डायलॉग (रजत अरोड़ा, हुसैन दलाल, अब्बास दलाल) में दम नहीं है। फिल्म खत्म होते ही एक भी डायलॉग याद नहीं रहता।
135 मिनट की अवधि और गंभीरता का ढोंग करने के बावजूद सिकंदर सिर्फ एक ही बात कहती है: “अगर आप सलमान खान के फैन हैं, तो स्वागत है। क्योंकि आप इस फिल्म को वैसे भी स्वीकार कर लेंगे।”
अभिनय भी कमजोर पक्ष साबित होता है। सलमान की स्क्रीन प्रेजेंस अच्छी है, लेकिन किरदार में गहराई नहीं है। रश्मिका मंदाना बस अपनी स्टारडम के कारण फिल्म में हैं, वर्ना यह किरदार किसी टॉप एक्ट्रेस की मांग नहीं करता। शर्मन जोशी, काजल अग्रवाल, प्रतीक बब्बर, और संजय कपूर ने ये किरदार क्यों चुने, यह समझ से परे है। केवल बाल कलाकार अयान खान और टैक्सी ड्राइवर के रूप में जतिन सरना थोड़ा प्रभाव छोड़ते हैं।
भारी बजट, भारत के सबसे बड़े सुपरस्टार में से एक की मौजूदगी के बावजूद, सिकंदर एक कमजोर फिल्म है। यह एक बार फिर यह सवाल उठाती है कि सलमान को अब ऐसी फिल्में करनी चाहिए जो उनके दर्शकों की उम्मीद और उनकी खुद की विरासत का सम्मान करें।
शाहरुख खान ने दो बैक-टू-बैक फिल्मों से खुद को रीइंवेंट किया। आमिर खान ने एक बड़ी असफलता के बाद ब्रेक लिया। अक्षय कुमार भी ट्रांजिशन से गुजर रहे हैं। एक दशक तक सफल फिल्मों के बाद, सलमान को भी अब सिकंदर जैसी फिल्मों से आगे बढ़कर नए सिनेमाई प्रयोग करने चाहिए। क्योंकि दर्शक चाहते हैं कि खान तिकड़ी और अक्षय कुमार जैसे सितारे बेहतरीन सिनेमा देते रहें।
अगर आप सिकंदर को थिएटर में मिस करते हैं, तो सलमान की सुपरस्टार इमेज आपके दिमाग में बरकरार रहेगी। अगर इसे देख लेते हैं, तो कम से कम यह संतोष रहेगा कि सलमान की एक और फिल्म थिएटर में देखी।
फैसला आपका है। सोच-समझकर निर्णय लें।
रेटिंग: 2 स्टार
सिकंदर
बैनर: नाडियाडवाला ग्रैंडसन, सलमान खान फिल्म
निर्माता: साजिद नाडियाडवाला
निर्देशक: ए. आर. मुरुगदास
कलाकार: सलमान खान, रश्मिका मंदाना, शर्मन जोशी, प्रतीक बब्बर, काजल अग्रवाल, संजय कपूर, सत्यराज, अयान खान, जतिन सरना, धन्या बालकृष्ण

