मुंबई, जो देश की आर्थिक राजधानी मानी जाती है, आज अपने ही नागरिकों के लिए एक कठिन शहर बन गई है खासतौर पर उन लोगों के लिए जो पैदल चलने को प्राथमिकता देते हैं। समय की पाबंद इस तेज़ रफ्तार महानगर में अब पैदल चलना एक रोज़ की जंग बन चुका है। बीएमसी द्वारा शहर में जगह-जगह की गई खुदाई, फुटपाथों पर अतिक्रमण, बारिश में जलजमाव, और ट्रैफिक की अनियंत्रित समस्या यह सब मिलकर मुंबई को “दुनिया का सबसे कम वॉक करने लायक शहर” की लिस्ट में ले आए हैं। दूसरी ओर, सबसे ज़्यादा पैदल चलने लायक शहर यूरोप में हैं। म्यूनिच इस सूची में सबसे ऊपर है, उसके बाद मिलान, वारसॉ, हेलसिंकी और पेरिस हैं।
बीएमसी की खुदाई ने शहर को बना दिया खुदाई स्थल
मुंबई की कई मुख्य सड़कों, उपनगरों और जंक्शनों पर बीएमसी के निर्माण और पाइपलाइन कार्य चल रहे हैं। एक नजर में ऐसा लगता है कि पूरा शहर किसी मेट्रो साइट में तब्दील हो गया हो। इन कार्यों का समय निर्धारण इतना अजीब है कि अक्सर एक काम शुरू होता है और फिर महीनों अधूरा रह जाता है। नतीजा? गड्ढों से भरे रास्ते, खुले मैनहोल और अनियमित बैरिकेडिंग जो पैदल यात्रियों के लिए गंभीर खतरा बन जाते हैं।
प्रभादेवी, अंधेरी, दादर, कुर्ला और मुलुंड जैसे व्यस्त इलाकों में खुदाई कार्यों ने लोगों का निकलना मुश्किल कर दिया है। बीएमसी भले ही ₹100 करोड़ की योजना बनाकर फुटपाथ सुधारने की बात कर रही हो, लेकिन ज़मीन पर कुछ और ही नज़ारा देखने को मिलता है।
फुटपाथ हैं, मगर दिखते नहीं!
मुंबई के फुटपाथों पर कब्जा जमा चुके ठेले, दुकानदार, बाइक पार्किंग और कूड़े के ढेर अब आम हो गए हैं। जो फुटपाथ पैदल यात्रियों के लिए बने हैं, वे अब छोटे व्यवसायों और अस्थायी दुकानों के कब्जे में हैं। अंधेरी, घाटकोपर और माटुंगा जैसी जगहों पर तो लोगों को सड़क पर ही चलना पड़ता है, जिससे जान जोखिम में रहती है।
2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई के लगभग 60% फुटपाथ अतिक्रमण का शिकार हैं। इससे न सिर्फ ट्रैफिक बढ़ता है बल्कि एक्सीडेंट का भी ख़तरा बढ़ता है।
बारिश आते ही हाल और भी बेहाल
बारिश में मुंबई का हाल तो जगजाहिर है। जैसे ही मानसून आता है, सड़कों पर चलना नहीं, तैरना पड़ता है। जलजमाव, मिट्टी की फिसलन, और गड्ढों में भरा पानी पैदल यात्रियों के लिए खतरे की घंटी है। कई इलाकों में तो यह हालत हो जाती है कि स्कूली बच्चे और बुजुर्ग घर से निकल ही नहीं पाते। बीमार लोगों और दिव्यांगों के लिए तो शहर जैसे कैदखाना बन जाता है।
एक उदाहरण लें: जुलाई 2023 में सिर्फ एक सप्ताह की बारिश ने मुंबई में 350 से ज्यादा जगहों पर जलजमाव की स्थिति पैदा कर दी थी। इनमें से अधिकतर पॉइंट्स ऐसे थे जहां पर पहले से ही खुदाई चल रही थी।
ट्रैफिक और सिग्नल्स न पैदल यात्रियों की सुनवाई, न जगह
मुंबई का ट्रैफिक खुद में एक कहानी है। लेकिन इसमें पैदल यात्रियों की कहानी सबसे ज्यादा अनसुनी है। अधिकतर सिग्नल्स पर पैदल चलने वालों के लिए ‘जेब्रा क्रॉसिंग’ या पैदल संकेत नहीं होते। जहां होते हैं, वहां वाहन चालक नियमों की धज्जियां उड़ाते हैं।
सिवरी, भायखला और बांद्रा जैसे ट्रैफिक हॉटस्पॉट्स पर सड़कों को पार करना किसी मिशन से कम नहीं है। कोई गाड़ी नहीं रुकती, और पुलिस भी अक्सर मूकदर्शक बनी रहती है।
हाई कोर्ट की फटकार और फिर भी हाल बेहाल
2023 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने बीएमसी को सख्त निर्देश दिए थे कि पैदल चलने वालों के हक को प्राथमिकता दी जाए। कोर्ट ने साफ कहा था कि शहर में पैदल यात्रियों की सुरक्षा के बिना स्मार्ट सिटी की बात अधूरी है। इसके बाद भी ज़मीनी हालात में बहुत ज़्यादा बदलाव नहीं आया।
बीएमसी ने ‘फुटपाथ सुधार योजना’ के तहत कुछ हिस्सों में मरम्मत कार्य शुरू किए हैं लेकिन वे भी धीमी रफ्तार और आधे-अधूरे हैं।
क्या मुंबई में पैदल चलना अब सपना बन गया है?
एक ताजा वैश्विक सर्वे के अनुसार, मुंबई को दुनिया के सबसे कम वॉक-फ्रेंडली शहरों में गिना गया है। वजह? अनियोजित शहरीकरण, प्रशासनिक लापरवाही, और पैदल यात्रियों की लगातार उपेक्षा। जब एक शहर अपनी सड़कों को सिर्फ गाड़ियों के लिए डिजाइन करने लगता है, तो वहां इंसान का चलना बंद हो जाता है।
इस समय ज़रूरत है कि प्रशासन पैदल चलने वालों को प्राथमिकता दे। फुटपाथों की मरम्मत, अतिक्रमण हटाना, सिग्नल सिस्टम में सुधार और वर्षा जल प्रबंधन ये सभी बिंदु अगर गंभीरता से लिए जाएं, तो मुंबई को फिर से ‘चलने योग्य शहर’ बनाया जा सकता है।
मुंबई – जहां चलना भी संघर्ष बन गया है
आज का मुंबई ऐसा शहर बन गया है जहां पैदल चलना एक सुरक्षित विकल्प नहीं रह गया। बीएमसी की योजनाएं, हाई कोर्ट की चेतावनियां और जनता की शिकायतें सबके बावजूद बदलाव की रफ्तार धीमी है। जब तक नगर निगम, ट्रैफिक विभाग और शहरी नियोजन इकाइयां मिलकर स्थायी समाधान नहीं लाएंगी, तब तक मुंबई की गलियां पैदल यात्रियों के लिए संघर्ष का मैदान बनी रहेंगी।


