भारत में नारी को देवी का दर्जा दिया जाता है, लेकिन जब बात घर की चारदीवारी की आती है, तो उसकी मेहनत को ‘कर्तव्य’ कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। सुबह से रात तक खाना बनाना, घर की साफ-सफाई करना, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल करना, और परिवार की छोटी-बड़ी जरूरतों को पूरा करना—यह सब वह काम है जो हर घर की नींव को मजबूत करता है। लेकिन इस मेहनत का कोई मोल नहीं, कोई वेतन नहीं, और सबसे दुखद बात, कोई मान्यता नहीं। इसे ‘अनपेड केयर वर्क’ (बिना वेतन की देखभाल का काम) कहा जाता है—वह श्रम जो अदृश्य है, लेकिन समाज का आधार उसी पर टिका है।
अनपेड केयर वर्क: एक अदृश्य बोझ
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की 2022 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय महिलाएं हर दिन औसतन 297 मिनट (लगभग 5 घंटे) अनपेड केयर वर्क में बिताती हैं, जबकि पुरुष केवल 52 मिनट। यह अंतर सिर्फ समय का नहीं, बल्कि लैंगिक असमानता का प्रतीक है। ऑक्सफैम इंडिया की 2022 की असमानता रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय महिलाओं द्वारा किए गए अनपेड केयर वर्क की आर्थिक कीमत लगभग 19 लाख करोड़ रुपये सालाना है—जो भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 7.4% है। फिर भी, इस योगदान को न तो आर्थिक आंकड़ों में गिना जाता है, न ही सामाजिक तौर पर सम्मान दिया जाता है।
शहरों और गांवों में यह बोझ अलग-अलग रूपों में दिखता है। शहरों में कामकाजी महिलाएं नौकरी के साथ-साथ घर की जिम्मेदारियां संभालती हैं। उदाहरण के लिए, मुंबई की एक 32 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर, शालिनी (बदला हुआ नाम), सुबह 6 बजे उठकर अपने बच्चों का टिफिन तैयार करती हैं, ऑफिस जाती हैं, और रात 10 बजे तक घर के काम निपटाती हैं। उनके पास अपने लिए समय नहीं है। दूसरी ओर, ग्रामीण क्षेत्रों में, जैसे राजस्थान के एक गांव की 40 वर्षीय राधा, सुबह पानी लाने के लिए 2 किलोमीटर चलती हैं, खेतों में काम करती हैं, और फिर घर की देखभाल करती हैं। दोनों ही जगह, मेहनत एक जैसी है—केवल परिस्थितियां अलग हैं।
यह सिर्फ परिश्रम नहीं, एक सामाजिक असमानता है
नेशनल टाइम यूज़ सर्वे 2019 के मुताबिक, भारतीय महिलाएं प्रतिदिन 7 घंटे से ज्यादा समय अनपेड केयर वर्क में बिताती हैं, जबकि पुरुष औसतन 30 मिनट से भी कम। यह अंतर समाज में गहराई से जड़ें जमाए लैंगिक असमानता को दर्शाता है। बचपन से ही बेटियों को घरेलू काम सिखाए जाते हैं, जबकि बेटों को पढ़ाई या खेलने की छूट दी जाती है। यह मानसिकता इतनी गहरी है कि बड़े होने पर महिलाएं इन जिम्मेदारियों को ‘अपना फर्ज’ मान लेती हैं, भले ही यह उनके स्वास्थ्य, करियर, और आत्म-सम्मान पर भारी पड़ता हो।
विश्व बैंक के 2023 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में महिलाओं की श्रम शक्ति भागीदारी दर (female labour force participation rate) केवल 23.5% है—दुनिया में सबसे कम में से एक। इसका एक बड़ा कारण अनपेड केयर वर्क का बोझ है, जो महिलाओं को नौकरी करने या अपनी शिक्षा पूरी करने से रोकता है। जब एक महिला दिनभर घर संभालने में लगी रहती है, तो उसके पास न तो करियर बनाने का समय बचता है, न ही अपने सपनों को पूरा करने का मौका।
अनपेड वर्क का प्रभाव: शारीरिक और मानसिक थकावट
यह बोझ सिर्फ शारीरिक थकान तक सीमित नहीं है—इसका मानसिक प्रभाव और भी गहरा है। जब आपकी मेहनत को कोई मान्यता न मिले, तो आत्मविश्वास धीरे-धीरे कम होने लगता है। दिल्ली की एक गृहिणी, 35 वर्षीय अनीता, कहती हैं, “मैं दिनभर काम करती हूँ, लेकिन मेरे पति कहते हैं कि मैं कुछ करती ही नहीं हूँ क्योंकि मैं ‘कमाती’ नहीं।” यह भावना लाखों भारतीय महिलाओं की है।
शारीरिक तौर पर, लगातार काम करने से कमर दर्द, जोड़ों में दर्द, और थकान जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं। मानसिक तौर पर, तनाव, चिंता, और कभी-कभी अवसाद भी देखने को मिलता है। एक अध्ययन के अनुसार, भारत में 40% से ज्यादा गृहिणियां तनाव और थकान से जूझती हैं, लेकिन उनके पास न तो मदद मांगने का समय है, न ही इसे व्यक्त करने का माहौल।
इसके अलावा, यह बोझ महिलाओं की शिक्षा और करियर पर भी असर डालता है। कई बार शादी के बाद लड़कियों से उम्मीद की जाती है कि वे नौकरी छोड़कर घर संभालें। एक ऐसी लड़की, जो इंजीनियर बनना चाहती थी, अब केवल अपने परिवार की देखभाल में व्यस्त है—क्योंकि समाज ने उसे यही सिखाया।
क्या कोई समाधान है? बदलाव की शुरुआत कहां से हो?
इस समस्या का समाधान केवल सरकारी नीतियों से नहीं, बल्कि घर-घर से शुरू होना चाहिए। सबसे पहला कदम है—लैंगिक समानता की मानसिकता को बढ़ावा देना। पुरुषों को यह समझना होगा कि घरेलू काम केवल महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं है। अगर पुरुष छोटे-छोटे काम—जैसे खाना बनाना, बच्चों को स्कूल छोड़ना, या बर्तन साफ करना—में हाथ बंटाएं, तो महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव आ सकता है।
बच्चों को बचपन से ही लैंगिक समानता सिखानी होगी। स्कूलों में ‘होम मैनेजमेंट’ या ‘लाइफ स्किल्स’ जैसे विषय अनिवार्य किए जा सकते हैं, ताकि लड़के और लड़कियां दोनों घरेलू काम को समान रूप से समझें और अपनाएं। माता-पिता को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि बेटे और बेटी में कोई भेदभाव न हो—जैसा कि अक्सर देखा जाता है कि बेटियों को रसोई में भेजा जाता है, जबकि बेटों को पढ़ने की छूट दी जाती है।
महिलाओं को भी यह समझना होगा कि ‘ना’ कहना गलत नहीं है। अगर वे थक गई हैं, तो आराम मांगना उनका अधिकार है। खुद के लिए समय निकालना स्वार्थ नहीं, बल्कि उनकी सेहत और खुशी के लिए जरूरी है।
सकारात्मक उदाहरण: बदलाव की उम्मीद
कुछ जगहों पर बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। केरल में ‘कुदुम्बश्री’ कार्यक्रम एक शानदार उदाहरण है। इस पहल के तहत, महिलाओं ने समुदाय-आधारित नेटवर्क बनाए हैं, जहां वे एक-दूसरे की मदद से घरेलू जिम्मेदारियों को साझा करती हैं। इससे कई महिलाएं पार्ट-टाइम नौकरी करने या अपनी शिक्षा पूरी करने में सक्षम हुई हैं।
इसी तरह, तमिलनाडु के एक गांव में एक स्वयं-सहायता समूह (SHG) ने मिलकर एक ‘कम्युनिटी किचन’ शुरू किया, जहां गांव की महिलाएं बारी-बारी से खाना बनाती हैं और बाकी समय अपने लिए इस्तेमाल कर सकती हैं। ये छोटे-छोटे कदम बड़े बदलाव की नींव रख रहे हैं।
सरकार की भूमिका और नीतियां
सरकार को भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। कुछ राज्य, जैसे केरल और तमिलनाडु, ने घरेलू महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा देने की दिशा में कदम उठाए हैं। उदाहरण के लिए, केरल में ‘होममेकर पेंशन स्कीम’ शुरू की गई है, जिसमें गृहिणियों को मासिक पेंशन दी जाती है। तमिलनाडु में ‘अम्मा टू-व्हीलर स्कीम’ के तहत कामकाजी महिलाओं को सब्सिडी पर स्कूटर दिए गए हैं, ताकि वे अपने समय की बचत कर सकें।
लेकिन यह पहल अभी सीमित है। सरकार को चाहिए कि वह अनपेड केयर वर्क को औपचारिक मान्यता दे—चाहे वह वेतन के रूप में न हो, लेकिन बीमा, पेंशन, और स्वास्थ्य सुविधाओं के रूप में समर्थन जरूर मिले। साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ती तकनीक—जैसे वॉशिंग मशीन, गैस स्टोव—को बढ़ावा देना चाहिए ताकि घरेलू काम का बोझ कम हो।
निष्कर्ष: अब वक्त है बदलाव का
भारतीय महिलाएं समाज की रीढ़ हैं। उनका परिश्रम और त्याग ही हर घर को जोड़े रखता है। लेकिन अगर यह परिश्रम अदृश्य रहेगा, तो समाज कभी संतुलित नहीं हो सकता। हमें यह स्वीकार करना होगा कि काम काम होता है—चाहे वह ऑफिस का हो या घर का।
आइए, हम सब मिलकर इस बदलाव की शुरुआत करें। अपने घर से, अपनी सोच से, और अपने व्यवहार से। पुरुषों को आगे आकर जिम्मेदारियां साझा करनी होंगी, बच्चों को समानता सिखानी होगी, और सरकार को नीतिगत समर्थन देना होगा। तभी हम एक ऐसे भारत का निर्माण कर पाएंगे जहां हर महिला की मेहनत को सम्मान मिले—चाहे वह देखभाल का काम हो या कोई और।



1 Comment
Bahut hi aache topic par baat kari gyi hai, ye aaj ki zarurat hai