ट्रेन की खिड़की से झांकते हुए खेत, स्टेशन की गर्मागर्म चाय और अनजान सहयात्रियों से जुड़ी कहानियाँ – भारतीय रेल यात्रा का अपना एक जादू है। लेकिन इस जादू को तोड़ देता है वो पल, जब भूखे पेट आपके सामने रखी जाती है “रेलवे की थाली” – जहाँ ठंडी रोटी, पानी जैसी दाल और बासी सब्ज़ी आपसे पूछती है: “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई इस ट्रेन में सफर करने की?” भारत में ट्रेन की यात्रा केवल एक जगह से दूसरी जगह जाने का ज़रिया नहीं है, यह एक अनुभव है – खिड़की से भागते खेत, स्टेशनों पर चाय की आवाज़, सहयात्रियों से बातें और सफर के बीच मिलने वाला खाना। लेकिन अफ़सोस, इस अनुभव का एक हिस्सा – खाना – आज यात्रियों के लिए परेशानी का कारण बन गया है।
अक्सर हम सुनते हैं कि ट्रेन का खाना महंगा होता है, पर स्वाद या गुणवत्ता कहीं नहीं होती। एक प्लेट सब्ज़ी, रोटी और दाल के लिए 150-200 रुपये वसूले जाते हैं, लेकिन खाने में न तो ताज़गी होती है, न स्वाद। कई बार तो खाना ठंडा, बासी या बदबूदार भी निकलता है। सवाल उठता है – जब हम पूरी कीमत दे रहे हैं, तो हमें अच्छा खाना क्यों नहीं मिल रहा?अब समय आ गया है कि हम सिर्फ़ भुगतें नहीं, बोलें भी।अगर आपने भी खराब खाने का अनुभव किया है, तो आवाज़ उठाइए।
खाने की हालत कैसी होती है?
जिन लोगों ने ट्रेन में खाना खाया है, वे जानते हैं कि उसकी हालत कैसी होती है। रोटियाँ अक्सर सख्त होती हैं, दाल में पानी ज़्यादा और मसाले कम, और सब्ज़ी ऐसी जैसे बिना स्वाद की उबली चीज़। मिठाई दी जाए तो या तो प्लास्टिक जैसी होती है या खट्टी। बाहर से पैकिंग भले ही ठीक हो, लेकिन जब खाने का ढक्कन हटाते हैं, तो उसकी हालत देखकर मन भर जाता है। कई बार खाना इतना ठंडा होता है कि लगता है सुबह का बनाया गया हो, जिसे बिना गर्म किए परोस दिया गया हो।
महंगा क्यों है?
ट्रेन का खाना इसलिए महंगा है क्योंकि यह निजी कंपनियों को ठेका देकर बनवाया जाता है। इन ठेकेदारों का मकसद लाभ कमाना होता है – वे सस्ते सामान का इस्तेमाल करते हैं, सफाई पर ध्यान नहीं देते, और खाने की मात्रा तक घटा देते हैं। ऊपर से यात्रियों के पास ज़्यादा विकल्प नहीं होते, इसलिए जो मिल रहा है, वही लेना पड़ता है। यही मजबूरी ठेकेदारों के लिए कमाई का साधन बन जाती है।
यात्री की परेशानी
जरा सोचिए, एक लंबा सफर है – दिल्ली से मुंबई या लखनऊ से चेन्नई। घर से लाया खाना खत्म हो चुका है, स्टेशन का खाना लेने का समय नहीं मिला। ऐसे में ट्रेन का खाना ही सहारा बनता है। लेकिन जब उस खाने से भी उल्टी जैसा मन हो जाए, तब वो सफर यादगार नहीं, तकलीफदेह बन जाता है।
कई लोग तो ट्रेन में खाने के बाद बीमार तक हो जाते हैं – पेट दर्द, फूड प्वाइज़निंग, उल्टी-दस्त जैसी समस्याएं आम हो गई हैं। कुछ बुज़ुर्ग यात्री तो खाना देखकर ही मना कर देते हैं और सिर्फ बिस्किट-नमकीन खाकर सफर काटते हैं।
सेवा में लापरवाही
सबसे बड़ी परेशानी यह है कि किसी को फर्क नहीं पड़ता। न तो ठेकेदार को शिकायत की परवाह होती है, और न ही अक्सर टीटी या स्टाफ को। शिकायत करने पर जवाब मिलता है – “हमें क्या करें, ठेका किसी और का है।” यात्रियों को शिकायत के लिए कोई आसान प्लेटफॉर्म नहीं मिलता, और अगर मिलता भी है, तो उसमें सुनवाई होने में वक्त लगता है।
ट्रेन के खाने को बेहतर बनाने के लिए कुछ ज़रूरी कदम उठाए जा सकते हैं:
1. गुणवत्ता की नियमित जांच: खाने का रैंडम सैंपल लेकर उसकी जांच होनी चाहिए।
2. स्थानीय स्टेशनों पर ताज़ा खाना: हर ज़ोन का अपना किचन होना चाहिए जो स्टेशन पर ही ताज़ा खाना बनाए।
3. ऑनलाइन फीडबैक अनिवार्य: हर यात्री को खाना मिलने के बाद मोबाइल पर फीडबैक देना अनिवार्य हो।
4. कोई बिल नहीं = खाना फ्री नियम सख्ती से लागू हो।
5. घर जैसा खाना विकल्प: कुछ ट्रेनों में ‘घरेलू थाली’ जैसा विकल्प शुरू किया जा सकता है – सादा, हल्का और सेहतमंद।
कुछ ट्रेनों में सुधार हुआ है – जैसे तेजस, वंदे भारत या राजधानी एक्सप्रेस में कभी-कभी अच्छा खाना मिल जाता है। लेकिन पूरे सिस्टम में सुधार की ज़रूरत है। भारत जैसे देश में जहाँ खाना संस्कृति का हिस्सा है, वहाँ ट्रेन में भोजन का अनुभव भी स्वाद और गरिमा से भरा होना चाहिए।यात्रा का मज़ा तभी है जब पेट भी भरा हो और मन भी खुश। ट्रेन का खाना अगर साफ, स्वादिष्ट और संतुलित हो, तो सफर की थकान भी कम लगती है और मुस्कुराहट अपने आप चेहरे पर आ जाती है।
दुनिया हमें रास्ता दिखा रही है
| देश | ट्रेन फूड की विशेषता | रेटिंग |
|---|---|---|
| जापान | ताज़ा बेंटो बॉक्स, सफाई, स्वाद | ⭐⭐⭐⭐⭐ |
| फ्रांस | वाइन, सूप, चीज़ – असली फ्रेंच टच | ⭐⭐⭐⭐☆ |
| जर्मनी | गरम खाना, ताज़गी से भरपूर | ⭐⭐⭐⭐☆ |
| थाईलैंड | लोकल स्वाद, हाइजीनिक खाना | ⭐⭐⭐⭐☆ |
| भारत | ठंडा, बेस्वाद, ओवरचार्ज्ड | ⭐☆☆☆☆ |


