जब भी आप मेडिकल स्टोर से कफ सिरप खरीदते हैं, तो यही मानते हैं कि दवा सुरक्षित होगी। खासकर बच्चों को देते समय भरोसा होता है कि सरकार और सिस्टम ने पहले ही जांच कर ली है। लेकिन हाल ही में सामने आए विवाद ने आम लोगों के भरोसे को हिला दिया है।
यह मामला सिर्फ कफ सिरप का नहीं, बल्कि हर उस दवा का है जिसे हम रोज़ाना इस्तेमाल करते हैं। अगर एक साधारण सिरप पर भी सवाल उठे तो जनता हर दवा को शक की नजर से देखेगी।
कफ सिरप्स नॉट कंटैमिनेटेड, यह बयान हाल ही में केंद्र सरकार ने जारी किया। लेकिन तमिलनाडु की एक लैब ने दावा किया कि कुछ कफ सिरप्स में मिलावट पाई गई है। दोनों तरफ से अलग-अलग दावे सामने आए और अब आम लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि कफ सिरप सुरक्षित है या मिलावटी।
जब आप मेडिकल स्टोर से दवा खरीदते हैं, तो भरोसा करते हैं कि वह सुरक्षित होगी। खासकर जब यह सिरप बच्चों को दिया जाता है, तो परिवार बिना सोचे समझे मान लेते हैं कि सरकार और सिस्टम ने पहले ही जांच कर ली होगी। लेकिन जब एक संस्था मिलावट की बात कहे और दूसरी संस्था कहे कि सब ठीक है, तो भरोसा डगमगाना स्वाभाविक है।
तमिलनाडु की जांच रिपोर्ट ने कहा कि सिरप में खतरनाक तत्व पाए गए। वहीं केंद्र ने तुरंत यह साफ कर दिया कि जांच में कोई भी हानिकारक पदार्थ नहीं मिला। यानी जनता के सामने दो विपरीत बयान रख दिए गए। अब आम लोग इस उधेड़बुन में हैं कि आखिर किस पर विश्वास किया जाए।
यह मसला सिर्फ लैब रिपोर्ट तक सीमित नहीं है। यह भरोसे का सवाल है। जनता को वैज्ञानिक शब्दावली में नहीं बल्कि साफ जवाब चाहिए—क्या दवा पीना सुरक्षित है या नहीं। पारदर्शिता की कमी भरोसे को और कमजोर करती है।
दुनिया में पहले भी कफ सिरप मिलावट के मामले सामने आए हैं। कई देशों में जहरीले केमिकल वाले सिरप से बच्चों की मौत तक हो चुकी है। इन घटनाओं ने साबित किया कि दवा सुरक्षा में लापरवाही कितनी घातक साबित हो सकती है। इसलिए भारत जैसे देश के लिए, जो दुनिया का बड़ा दवा निर्यातक है, इस तरह के विरोधाभासी बयान गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
भारत की दवा निगरानी प्रणाली दो स्तरों पर काम करती है। राज्य की लैब्स जांच करती हैं, जबकि अंतिम फैसला केंद्र लेता है। यही कारण है कि कई बार रिपोर्ट्स में टकराव दिखता है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि असलियत क्या है और कौन सही है।
कफ सिरप एक ऐसा प्रोडक्ट है जो लगभग हर घर में मौजूद होता है। इसे अक्सर बिना प्रिस्क्रिप्शन के खरीदा और इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में जब मिलावट की खबर आती है, तो डर और अविश्वास दोनों बढ़ जाते हैं। कई बार लोग इलाज से भी पीछे हटने लगते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए और बड़ा खतरा है।
भरोसा फिर से बनाने के लिए जरूरी है कि जांच प्रक्रिया पारदर्शी हो। अलग-अलग आवाजों की जगह एक स्पष्ट बयान हो। जांच रिपोर्ट जनता के सामने सरल भाषा में रखी जाए। अगर कहीं मिलावट मिले, तो तुरंत और सख्त कार्रवाई की जाए। इसके अलावा, लोगों को जागरूक किया जाए कि दवाओं का सही इस्तेमाल कब और कैसे करना है।
यह विवाद सिर्फ इस बात पर खत्म नहीं होता कि कफ सिरप्स नॉट कंटैमिनेटेड हैं या नहीं। यह सवाल हर उस दवा से जुड़ा है जिसे हम रोज़ इस्तेमाल करते हैं। अगर एक साधारण सिरप पर भी विरोधाभासी बयान आ सकते हैं, तो भरोसा हर दवा से उठ सकता है।
भरोसा केवल दावों से नहीं बनता। यह पारदर्शिता और सच्चाई से बनता है। अगर राज्य की लैब मिलावट की बात कहती है, तो पूरा विवरण सार्वजनिक होना चाहिए। अगर केंद्र इसे नकारता है, तो कारण साफ-साफ बताए जाने चाहिए। अस्पष्ट बयान या चुप्पी केवल संदेह को और गहरा करती है।


