कैसा हो जब एक ही देश की दो राजधानियां हों? सुनने में यह बात अजीब लग सकती है, लेकिन दुनिया के कई देशों में यह व्यवस्था पहले से मौजूद है। हालांकि आज हम जिस देश की बात करने जा रहे हैं, वहां दूसरी राजधानी बनाने का फैसला लोगों के मन में कई सवाल खड़े कर रहा है।
हाल ही में जापान की संसद ने एक कानून पास किया है, जिसके तहत टोक्यो के अलावा देश में एक “बैकअप राजधानी” तय करने का रास्ता खुल गया है। जुलाई महीने में यह विधेयक निचले सदन में आसानी से पास हो गया, लेकिन ऊपरी सदन में यह बेहद कम अंतर से पारित हुआ, जहां विपक्ष का दबदबा है। यही वजह है कि यह फैसला प्रधानमंत्री साने ताकाइची के लिए आगे चलकर राजनीतिक रूप से मुश्किलें खड़ी कर सकता है।
आखिर जापान ऐसा क्यों कर रहा है?
यह खबर कई लोगों को हैरान कर रही है कि आखिर जापान ऐसा फैसला क्यों ले रहा है। इसके पीछे की वजह समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है। जापान भूकंप के लिहाज़ से बेहद संवेदनशील देश है, और वहां प्राकृतिक आपदाएं अक्सर दस्तक देती रहती हैं। अगर कभी कोई बड़ी आपदा टोक्यो में आती है, तो देश के लिए यह स्थिति काफी मुश्किलें खड़ी कर सकती है।
किसी भी देश के लिए उसकी राजधानी बेहद अहम होती है। अगर राजधानी को किसी वजह से नुकसान पहुंच जाए, तो पूरे देश की व्यवस्था चरमरा सकती है प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर संसद, मंत्रालय और वित्तीय संस्थान तक, सब कुछ प्रभावित हो सकता है। यही कारण है कि जापान एक ऐसा क्षेत्र तैयार करना चाहता है जो जरूरत पड़ने पर अस्थायी तौर पर सरकार का कामकाज संभाल सके।
इसके अलावा एक और बड़ी वजह है टोक्यो में हर चीज़ का जरूरत से ज्यादा जमा होना। टोक्यो अकेले जापान की एक-पांचवीं आर्थिक गतिविधि पैदा करता है, देश की आधी से ज्यादा सूचीबद्ध कंपनियां वहीं स्थित हैं, और करीब 30 प्रतिशत आबादी वहीं रहती है। नया कानून इसे “अत्यधिक संकेंद्रण” बताता है और इसे संतुलित करना भी इस योजना का एक अहम मकसद है।
ओसाका सबसे आगे, लेकिन फैसला अभी बाकी
इसी सिलसिले में सबसे ज्यादा चर्चा में जो नाम है, वह है ओसाका। यह शहर इस दौड़ में सबसे आगे माना जा रहा है, लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि अभी तक यह तय नहीं हुआ है कि ओसाका ही जापान की दूसरी राजधानी बनेगी। कानून सिर्फ एक ढांचा तैयार करता है, जिसके तहत आगे चलकर एक या एक से ज्यादा क्षेत्रों को यह दर्जा दिया जा सकता है।
लेकिन ओसाका के आगे होने की एक वजह है जो कई सवाल खड़े कर रही है। ओसाका वह शहर है जहां से जापान इनोवेशन पार्टी का गढ़ है, और यही पार्टी प्रधानमंत्री ताकाइची की सरकार में सहयोगी दल के तौर पर शामिल है। यही वजह है कि विरोधियों का कहना है कि यह पूरा मामला सिर्फ आपदा प्रबंधन नहीं, बल्कि राजनीति से भी जुड़ा हो सकता है।
दूसरा सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जिस शहर को बैकअप राजधानी बनाया जा रहा है, वह वाकई इस जिम्मेदारी के लायक है। आम तर्क यह है कि ऐसे किसी शहर को यह दर्जा मिलना चाहिए जो आर्थिक रूप से सबसे मजबूत हो, न कि कोई ऐसा शहर जो पहले से ही संघर्ष कर रहा हो। यहीं पर ओसाका को लेकर सवाल और गहरे हो जाते हैं यह शहर पिछले 44 सालों से लगातार कंपनियों को खो रहा है। बड़ी संख्या में कारोबार यहां से टोक्यो की ओर जा चुके हैं, और विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर रेल और इंटरनेट कनेक्टिविटी ने टोक्यो और ओसाका के बीच की दूरी को कम कर दिया है, जिससे कंपनियों के लिए ओसाका में रहने का कोई खास फायदा नहीं बचा।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि यह दौड़ सिर्फ ओसाका तक सीमित नहीं है। फुकुओका, नागोया और सापोरो जैसे शहर भी इस होड़ में शामिल हैं, और इनके गवर्नरों ने भी दिलचस्पी दिखाई है। यानी अंतिम फैसला आने में अभी वक्त लग सकता है।
जापान का यह कदम आगे चलकर क्या रूप लेता है, इस पर पूरे देश की नजर टिकी है। नए कानून के तहत सरकार बैकअप क्षेत्रों में सरकारी दफ्तरों, परिवहन नेटवर्क और शहरी ढांचे में निवेश बढ़ाने की बात कह रही है, साथ ही वहां कारोबार शिफ्ट करने वाली कंपनियों को टैक्स में छूट देने की भी योजना है।
लेकिन असली सवाल अब भी वहीं का वहीं है क्या यह फैसला सच में देश को आपदाओं से बचाने की एक जरूरी तैयारी है, या फिर यह किसी गठबंधन सहयोगी को राजनीतिक फायदा पहुंचाने का एक तरीका भर है? जब तक जापान अपना अंतिम फैसला नहीं सुनाता, यह सवाल जनता के मन में बना रहेगा।
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