धनतेरस की शाम जब घर-घर लक्ष्मी और कुबेर की पूजा की तैयारी होती है, तब कई घरों के मुख्य दरवाज़े के बाहर एक छोटा-सा दीपक अलग से रखा जाता है। यह दीपक धन के लिए नहीं, बल्कि मृत्यु के देवता यमराज के नाम पर जलाया जाता है। इसे यमदीप या यम दीपदान कहते हैं। सवाल उठता है कि समृद्धि के त्योहार में मृत्यु के देवता के लिए दीपक क्यों जलाया जाता है?
धनतेरस कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को आता है। गुजरात और महाराष्ट्र जैसे अमांत पंचांग वाले क्षेत्रों में यही तिथि आश्विन महीने में पड़ती है। यह दीपावली के पाँच दिन के उत्सव का पहला दिन है।
हिंदू मान्यता में यमराज मृत्यु और धर्म यानी न्याय के देवता हैं। उन्हें सूर्यदेव का पुत्र माना जाता है, इसीलिए एक पारंपरिक श्लोक में उन्हें “सूर्यज” कहा गया है। दक्षिण दिशा को उनकी दिशा माना जाता है। मान्यता है कि धनतेरस की शाम उनके नाम से दीपदान करने पर परिवार के सदस्यों को अकाल मृत्यु के भय से रक्षा मिलती है। अकाल मृत्यु का अर्थ है समय से पहले होने वाली मृत्यु।
इस परंपरा से जुड़ी सबसे प्रचलित कथा राजा हिम के सोलह वर्ष के पुत्र की है। कुछ स्रोतों में राजा का नाम हेम भी लिखा मिलता है। कथा के अनुसार राजकुमार की कुंडली में लिखा था कि विवाह के चौथे दिन साँप के काटने से उसकी मृत्यु हो जाएगी। उस रात उसकी नवविवाहिता पत्नी ने पति को सोने नहीं दिया। उसने अपने सारे गहने और सोने-चाँदी के सिक्के शयनकक्ष के द्वार पर ढेर कर दिए और चारों ओर दीपक जला दिए। फिर वह रात भर गीत गाती और कथाएँ सुनाती रही।
कहा जाता है कि यमराज साँप का रूप लेकर वहाँ पहुँचे, लेकिन दीपों और आभूषणों की चमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं और वे कक्ष में प्रवेश नहीं कर सके। वे सिक्कों के ढेर पर चढ़कर बैठ गए और पूरी रात गीत-कथाएँ सुनते रहे। सुबह होते ही वे चुपचाप लौट गए और राजकुमार के प्राण बच गए। तभी से इस दिन यमदीपदान की परंपरा शुरू हुई।
एक दूसरी कथा कुछ अलग ढंग से यही बात कहती है। इसके अनुसार एक बार यमराज ने अपने दूतों से पूछा कि प्राणियों के प्राण हरते समय क्या कभी उन्हें किसी पर दया आती है। दूतों ने पहले कहा कि वे केवल आज्ञा का पालन करते हैं, पर यमराज के दोबारा पूछने पर उन्होंने एक घटना सुनाई।
राजा हेमा के पुत्र के बारे में ज्योतिषियों ने कहा था कि विवाह के चार दिन बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी। राजा हंस ने उसे यमुना तट की एक गुफा में रखकर बचाने का प्रयास किया, पर राजा हंस की पुत्री ने उससे गंधर्व विवाह कर लिया और चौथे दिन राजकुमार की मृत्यु हो गई। नववधू का करुण विलाप सुनकर यमदूतों का हृदय काँप उठा। तब यमराज ने कहा कि जो व्यक्ति कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी की रात उनका पूजन करके दक्षिण दिशा की ओर मुख वाला दीपक जलाएगा, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा। साथ ही उसे जीवन भर धर्म के मार्ग पर चलने का वचन भी देना होगा। यह कथा विशेष रूप से यह बताती है कि यह परंपरा यमराज के वचन से जुड़ी मानी जाती है।
यमदीप जलाने की विधि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में थोड़ी भिन्न हो सकती है, पर आम तौर पर आटे या मिट्टी का चौमुखा दीपक लिया जाता है, यानी चार मुख वाला दीपक। उसमें रुई की चार बत्तियाँ लगाई जाती हैं और आम तौर पर सरसों का तेल डाला जाता है, हालाँकि परंपरा के अनुसार तिल का तेल भी प्रयोग हो सकता है। कई जगह दीपक के नीचे थोड़े साबुत चावल यानी अक्षत रखे जाते हैं। शाम के समय इस दीपक को घर के मुख्य द्वार के बाहर, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके रखा जाता है। दीप जलाकर यमराज का स्मरण किया जाता है और परिवार की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुरक्षा की प्रार्थना की जाती है।
दीपदान के समय यह पारंपरिक श्लोक बोला जाता है: “मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह। त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम॥” इसका भाव है कि त्रयोदशी के इस दीपदान से सूर्यपुत्र यमराज, अपने सहचर मृत्यु, पाश-दंड, काल और श्यामा के साथ, मुझ पर प्रसन्न हों। पद्म पुराण में भी इससे मिलता-जुलता श्लोक मिलता है, जिसमें “श्यामया” की जगह “भार्यया” यानी पत्नी के साथ, ऐसा पाठ है। कुछ परिवारों में यह दीपक घर का कोई बड़ा सदस्य जलाता है। कुछ क्षेत्रों में दीपक को पहले घर के भीतर से द्वार तक लाया जाता है और फिर बाहर रखा जाता है, और कहीं-कहीं यह भी माना जाता है कि उस समय बाकी सदस्य घर के भीतर रहते हैं।
इस परंपरा की जड़ में एक सीधी बात है कि जीवन सबसे बड़ी पूँजी है। जिस दिन लोग धन और सोना खरीदने की सोचते हैं, उसी दिन एक छोटा-सा दीपक याद दिलाता है कि धन तभी काम का है जब परिवार सुरक्षित और स्वस्थ हो। पहली कथा की नवविवाहिता के लिए भी गहनों से कहीं बड़ा मोल अपने पति के जीवन का था। यमदीप का दीपक आकार में बहुत छोटा होता है, पर वह पूरे त्योहार का सबसे गहरा संदेश देता है।
Subscribe Deshwale on YouTube


