नीना गुप्ता की मौजूदगी फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष है। एक भावनात्मक विषय के इर्द-गिर्द बुनी गई इस कहानी को और दमदार बनाया जा सकता था, अगर इसकी पटकथा, मानवीय संवेदनाएं और आकर्षक किरदारों को बेहतर तरीके से गढ़ा जाता।
अकेली माँ और व्यस्त बेटे की कहानी
निर्देशक हार्दिक गज्जर की फिल्म अचारी बा एक गांव में रहने वाली अकेली माँ और मुंबई में मौज-मस्ती में व्यस्त उसके बेटे-बहू की कहानी है। हार्दिक इससे पहले टीवी सीरियल्स और गुजराती फिल्मों का निर्देशन कर चुके हैं। उन्होंने पिछले साल जियो सिनेमा के लिए अमर प्रेम की प्रेम कहानी नामक फिल्म भी बनाई थी।
फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण नीना गुप्ता का टाइटल रोल निभाना है। वह अपने करियर के बेहतरीन दौर में हैं और दर्शकों के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ी है। खासकर गुजराती दर्शकों के लिए यह फिल्म खास हो सकती है, क्योंकि इसकी कहानी एक गुजराती महिला की है, जो कच्छ के रापर में अकेले रहकर अचार का छोटा सा व्यापार करती है।
कहानी की झलक
जैष्णवी उर्फ मनोज (नीना गुप्ता) अपनी सहेलियों शारदा (वंदना पाठक) और रूपा (जागृति ठाकोर) के साथ गुजरात के रापर में अचार का गृह उद्योग चलाती हैं। 65 वर्षीय जैष्णवी का बेटा केतन (वत्सल सेठ) अपनी पत्नी मनोरमा (मानसी राच्छ) और बेटे कौशल (अपूर्व शर्मा) के साथ मुंबई में रहता है, लेकिन वर्षों से उसने अपनी माँ से ढंग से बात तक नहीं की। अचानक एक दिन वह माँ को फोन कर मुंबई बुलाता है। जैष्णवी बेहद खुश हो जाती हैं, लेकिन मुंबई पहुँचते ही उन्हें पता चलता है कि बेटा, बहू और पोता दार्जिलिंग घूमने जा रहे हैं। उन्होंने माँ को सिर्फ इसलिए बुलाया था ताकि वह उनके पालतू कुत्ते जेनी (बडी) की देखभाल कर सके।
कुत्ते से डरने वाली जैष्णवी के लिए यह एक मुश्किल स्थिति बन जाती है—एक ओर बेटे और पोते के लिए उनका प्यार और दूसरी ओर कुत्ते के साथ रहने की अनचाही मजबूरी। इसके बाद शुरू होता है उतार-चढ़ाव का सिलसिला। मुंबई में वह कैसे अचार बनाने की अपनी कला का उपयोग करके न केवल अपनी सोसायटी के सदस्यों बल्कि अन्य लोगों का दिल जीतती हैं, यह फिल्म का मुख्य भाग है।
दमदार प्लॉट लेकिन कमजोर पटकथा
अचारी बा की कहानी दिलचस्प है, लेकिन केवल कहानी ही। फिल्म की पटकथा और संवाद (श्रेयस अनिल लोवलकर) इसे रोचक बनाने में नाकाम रहे हैं। जैष्णवी के मुंबई पहुंचने के बाद कहानी में सोसायटी के सेक्रेटरी बृजेश (कबीर बेदी) और पड़ोसन धनश्री (अपूर्वा अरोड़ा) जैसे किरदार जोड़े गए हैं।
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसके कमजोर किरदार हैं। केतन की सोसायटी सुपर पॉश है, लेकिन फिल्म का माहौल और किरदार ऐसे हैं, जो मध्यमवर्गीय मुंबईकरों (जैसे तारक मेहता का उल्टा चश्मा) की छवि पेश करते हैं। यह अविश्वसनीय लगता है कि पूरे सोसायटी को पता है कि केतन ने अपनी माँ को सिर्फ कुत्ते की देखभाल के लिए बुलाया है।
इसके अलावा, यह भी सवाल उठता है कि केतन खुद अपने पालतू कुत्ते को साथ क्यों नहीं ले जा सकता? इतने बड़े घर और पैसे के बावजूद, उसे कोई अस्थायी शेल्टर (पशु देखभाल केंद्र) नहीं मिल पाता, यह भी अटपटा लगता है। टीवी सीरियल जैसी ट्रीटमेंट और भावनाओं की कमी के कारण अचारी बा औसत दर्जे की फिल्म बनकर रह जाती है। फिल्म में गानों की भरमार है, जिनमें से अधिकतर गैर-जरूरी लगते हैं।
तकनीकी पक्ष और अभिनय
तकनीकी रूप से फिल्म साफ-सुथरी है, लेकिन भव्यता और डिजाइनर कपड़े कथानक के अनुरूप कम और बनावटी ज्यादा लगते हैं। अच्छी बात यह है कि नीना गुप्ता की उपस्थिति फिल्म को एक हद तक संभाल लेती है। उन्होंने अपने किरदार को पूरी संजीदगी से निभाया है, और शायद इसी वजह से फिल्म को अंत तक देखा जा सकता है, खासकर उनके प्रशंसकों के लिए।
वत्सल सेठ और मानसी राच्छ के किरदार अधूरे लगते हैं। कबीर बेदी का रोल ठीक-ठाक है। अन्य कलाकारों में कनुभाई के किरदार में मौलिक कोटक ध्यान आकर्षित करते हैं, जबकि वंदना पाठक ने सहायक भूमिका ठीक से निभाई है।
तमिल फिल्म ‘अप्पाता’ से समानता
2023 में तमिल में अप्पाता नामक एक फिल्म आई थी, जिसे प्रियदर्शन ने निर्देशित किया था। उसकी कहानी भी एक वृद्ध महिला और एक कुत्ते के बीच परिस्थितिजन्य बंधन पर आधारित थी। हालांकि, अचारी बा उस फिल्म की रीमेक नहीं है, लेकिन दोनों की मुख्य थीम एक जैसी लगती है।
अचारी बा एक बेहतरीन मनोरंजक फिल्म बन सकती थी, अगर इसकी पटकथा में भावनाओं और रिश्तों को ठीक से गूंथा जाता। फिर भी, नीना गुप्ता के प्रशंसक इसे एक बार देख सकते हैं।
अचारी बा
रेटिंग: ⭐⭐ (दो स्टार)
बैनर: हार्दिक गज्जर फिल्म्स और बैकबेंचर्स पिक्चर्स
निर्माता: ज्योति, पूनम श्रॉफ, पार्थ गज्जर
निर्देशक: हार्दिक गज्जर
संगीत: प्रसाद एस.
सिनेमेटोग्राफी: ऋषिकेश गांधी
संपादन: कनु प्रजापति


