धर्मेंद्र प्रधान ने आखिरकार अपना इस्तीफा दे ही दिया। जी हां, अब तक आपको यह खबर मिल ही गई होगी कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।
यह सुनकर सभी लोग अचंभित हैं, क्योंकि किसी को भी यह नहीं लगा था कि प्रधान अपने पद से हटने के लिए मान जाएंगे। पिछले करीब दो महीने से दिल्ली के जंतर मंतर पर हजारों छात्र लगातार प्रदर्शन कर रहे थे, NEET-UG और UGC-NET जैसी परीक्षाओं में हुए पेपर लीक को लेकर। इस पूरे आंदोलन की अगुवाई कर रही थी “कॉकरोच जनता पार्टी” (CJP), जो शुरुआत में मई महीने में सिर्फ एक व्यंग्यात्मक सोशल मीडिया पेज के तौर पर शुरू हुई थी, लेकिन कुछ ही हफ्तों में यह देशभर के युवाओं की एक बड़ी सामाजिक-राजनीतिक ताकत बन गई।
आज जैसे ही यह खबर आई, कॉकरोच जनता पार्टी और जंतर मंतर पर जमा प्रदर्शनकारियों में मानो खुशी की लहर दौड़ गई। दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए आंसू गैस तक छोड़ी थी, ठीक उसी समय प्रधान ने अपने इस्तीफे का ऐलान कर दिया। इसके बाद से देशभर में लोगों का कहना है कि आखिरकार सरकार युवाओं के सामने झुक ही गई है। अल जज़ीरा ने इसे मोदी सरकार की तरफ से मिली “पहली बड़ी रियायत” करार दिया है, वहीं सीएनएन ने भी इसे लगातार बढ़ते दबाव के आगे सरकार के झुकने के तौर पर रिपोर्ट किया।
लेकिन एक बात गौर करने वाली है। जब सभी को यह लग रहा था कि प्रधान इस्तीफा नहीं देंगे, तो उनके इस्तीफे की खबर सुनकर सब यही सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि आखिर यह अचानक फैसला हुआ कैसे। खास तौर पर तब, जब सिर्फ एक दिन पहले ही सरकार और CJP के बीच बातचीत हुई थी, और सरकार ने प्रधान के इस्तीफे की मांग पर जवाब देने के लिए शनिवार दोपहर तक का समय मांगा था, और खुद प्रधान न्यूज चैनलों को दिए इंटरव्यू में प्रदर्शनकारियों पर तीखे बयान भी दे चुके थे।
अब बीजेपी की इसके पीछे क्या रणनीति है और आगे की राजनीति क्या शक्ल लेगी, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल सबसे बड़ी चर्चा धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की ही है।
अपने पक्ष में धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि वह इस्तीफा इसलिए दे रहे हैं क्योंकि वह नहीं चाहते कि “एंटी-नेशनल फोर्सेज” इस पूरी स्थिति का फायदा उठाएं। उन्होंने यह भी कहा कि वह नहीं चाहते कि छात्र पढ़ाई और करियर बनाने के बजाय कानूनी उलझनों में फंसते रहें। यह बयान खुद एक सवाल खड़ा करता है क्या मंत्री का इस्तीफा सच में छात्रों की चिंता से आया, या फिर बढ़ते प्रदर्शन के दबाव को काबू में रखने की एक कोशिश थी।
इससे एक और सवाल भी उठता है, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी तक सार्वजनिक रूप से इस इस्तीफे को स्वीकार नहीं किया है। यानी यह तय होना अभी बाकी है कि प्रधान का यह इस्तीफा आखिरकार मंजूर होगा या नहीं।
अब देखना यह होगा कि सरकार आगे क्या और कौन से बड़े कदम उठाती है, क्योंकि प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने इस्तीफे के बाद भी अपनी दो और मांगें सरकार के सामने रख दी हैं। पहली मांग है कि जिन छात्रों ने परीक्षा से जुड़े दबाव के चलते आत्महत्या कर ली, उनके परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये का मुआवजा दिया जाए। दूसरी मांग है कि प्रदर्शन में शामिल रहे किसी भी छात्र के खिलाफ कोई कानूनी या दंडात्मक कार्रवाई न की जाए।
कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने प्रधान के इस्तीफे के बाद अपने बयान में कहा, “यह लोकतंत्र है। उन्होंने इस्तीफा दे दिया है। हमारी दो और मांगें हैं। हम यूं ही नहीं जाने वाले।” पार्टी की आधिकारिक इंस्टाग्राम स्टोरी पर भी लिखा गया, “अभी तो हमने शुरू किया है,” जो साफ इशारा करता है कि आंदोलन अभी थमने वाला नहीं है।
गौरतलब है कि इस पूरे आंदोलन के दौरान प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने भी 26 दिनों तक भूख हड़ताल की थी, जिसके चलते उनका वजन काफी कम हो गया था। छात्रों के प्रदर्शन को दबाने के लिए दिल्ली पुलिस ने जंतर मंतर के आसपास की करीब 18 मेट्रो स्टेशनों को बंद कर दिया था और इंटरनेट सेवाओं पर भी पाबंदी लगाई गई थी।
तो अब सबकी नजर बस इसी पर टिकी है कि क्या सरकार आगे भी कॉकरोच जनता पार्टी की बाकी मांगें मानती है, या फिर कोई और रास्ता निकालती है। इतना तो साफ है कि यह सिर्फ एक मंत्री के इस्तीफे की कहानी नहीं है — यह भारत के युवाओं की एक बड़ी सामूहिक आवाज़ की कहानी है, जो अब आसानी से शांत होने वाली नहीं लगती।
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