19 साल की दिव्या देशमुख ने शतरंज की दुनिया में तहलका मचा दिया। उन्होंने 2025 FIDE वूमेंस वर्ल्ड कप जीतनेवाली भारत की पहली महिला खिलाड़ी बनने का गौरव हासिल किया। बचपन में शौक के तौर पर शुरू हुआ खेल उनके लिए जुनून बन गया। पांच साल की उम्र से शतरंज की बिसात पर कदम रखने वाली दिव्या ने अपनी मेहनत, अनुशासन और लगन से यह मुकाम हासिल किया। आज उनकी जीत न सिर्फ खेल प्रेमियों के लिए गर्व का क्षण है, बल्कि यह हर उस युवा के लिए प्रेरणा है जो बड़े सपने देखने की हिम्मत रखता है।
बचपन से शतरंज की शुरुआत
दिव्या का जन्म 9 दिसंबर 2005 को नागपुर में हुआ। उनके पिता डॉ. जितेंद्र देशमुख और मां डॉ. नम्रता देशमुख डॉक्टर हैं। दिव्या ने भवन्स भगवानदास पुरोहित विद्या मंदिर से 12वीं तक पढ़ाई की और पढ़ाई में भी हमेशा टॉपर रहीं। पढ़ाई के बाद उन्होंने कॉलेज की बजाय शतरंज पर फोकस किया और डिस्टेंस लर्निंग से स्पोर्ट्स साइकोलॉजी व डेटा एनालिटिक्स के ऑनलाइन कोर्स शुरू किए।
शतरंज में उनकी रुचि तब जगी जब वे अपनी बहन के साथ बैडमिंटन क्लास जाती थीं। बैडमिंटन का नेट उनके लिए ऊंचा था, लेकिन उसी बिल्डिंग में चल रही शतरंज क्लास ने उनकी जिंदगी बदल दी।
पिता बने प्रेरणा का स्रोत
दिव्या के पिता शौकिया तौर पर शतरंज खेलते थे। उन्होंने पांच साल की उम्र में दिव्या को खेल सिखाना शुरू किया। बाद में उन्होंने राहुल जोशी और ग्रैंडमास्टर श्रीनाथ नारायणन से ट्रेनिंग ली। उनकी मेहनत ने उन्हें 2012 में अंडर-7 नेशनल खिताब दिलाया।
जीत की श्रृंखला
2014 में डरबन में वर्ल्ड यूथ अंडर-10 और 2017 में ब्राजील में वर्ल्ड यूथ अंडर-12 चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता। 2021 में वे भारत की 21वीं वूमन इंटरनेशनल मास्टर बनीं। 2022 में उन्होंने भारतीय महिला शतरंज चैंपियनशिप जीती। 2023 में उन्होंने एशियन वूमन चैंपियनशिप और टाटा स्टील इंडिया रैपिड में जीत दर्ज की, जहां उन्होंने हम्पी और हरिका जैसी दिग्गजों को हराया।
2024 में उन्होंने वर्ल्ड जूनियर गर्ल्स अंडर-20 खिताब जीता और 45वें चेस ओलंपियाड में टीम के साथ गोल्ड मेडल लिया। उसी साल बोर्ड 3 पर व्यक्तिगत गोल्ड भी उनके नाम रहा।
2025 में ऐतिहासिक उपलब्धि
2025 FIDE वूमेंस वर्ल्ड कप में उन्होंने 15वीं सीड के रूप में शुरुआत की। हारिका द्रोणावल्ली, वंतिका अग्रवाल, कोनेरु हम्पी और इरिना क्रुश जैसी दिग्गजों को हराया। सेमीफाइनल में चीन की पूर्व वर्ल्ड चैंपियन टैन झोंग्यी को मात दी। फाइनल में कोनेरु हम्पी के खिलाफ क्लासिकल गेम ड्रॉ रहे, लेकिन रैपिड टाईब्रेक में 1.5-0.5 से जीतकर उन्होंने इतिहास रचा। इस जीत ने उन्हें 2026 वूमन कैंडिडेट्स टूर्नामेंट के लिए क्वालिफाई कराया और ग्रैंडमास्टर का खिताब दिलाया।
नेटवर्थ और व्यक्तिगत जीवन
दिव्या की नेटवर्थ करीब 7-8 करोड़ रुपये बताई जाती है। उनकी कमाई का मुख्य स्रोत शतरंज है। खेल के साथ-साथ वे ऑनलाइन कोर्स कर अपनी पढ़ाई भी जारी रख रही हैं।
भविष्य की योजनाएं
दिव्या का अगला लक्ष्य विश्व शतरंज चैंपियन बनना है। वह लगातार अपनी रणनीतियों को और बेहतर कर रही हैं। उनके कोच का मानना है कि आने वाले वर्षों में वह विश्व स्तर पर और बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकती हैं।
शतरंज में करियर कैसे बनाएं
दिव्या की कहानी उन युवाओं के लिए प्रेरणा है जो शतरंज में करियर बनाना चाहते हैं।
- छोटी उम्र से शुरुआत करें: 5-7 साल की उम्र में खेल सीखना सबसे सही है। Chess.com और Lichess.org पर रोज अभ्यास करें।
- कोचिंग लें: दिव्या ने राहुल जोशी और श्रीनाथ नारायणन से ट्रेनिंग ली। चाणक्य शतरंज अकादमी, WACA (विश्वनाथन आनंद के मार्गदर्शन में), और दिल्ली शतरंज संघ जैसी जगहों पर कोचिंग उपलब्ध है।
- नियमित अभ्यास करें: रोज 10-15 पजल्स हल करें और छोटे टूर्नामेंट में हिस्सा लें।
- फीस और ट्रेनिंग: कोचिंग फीस 2,000 से 20,000 रुपये प्रति माह तक होती है।
दिव्या की कहानी सिर्फ खेल की सफलता की नहीं है। यह मेहनत, अनुशासन और सपनों को पूरा करने की प्रेरणा देती है। डॉक्टर माता-पिता की बेटी होकर भी उन्होंने अपने जुनून को करियर बनाया। यह कहानी उन युवाओं के लिए उदाहरण है जो अपनी रुचियों को लेकर संकोच करते हैं।


