एक समय था जब भारत के उत्तर-पूर्व को देश के नक्शे में एक ‘दूर-दराज़’ का इलाका माना जाता था। “सात बहनों और एक भाई” के नाम से पहचाने जाने वाले इस क्षेत्र को अक्सर उपेक्षित किया गया, लेकिन अब वह दौर बदल चुका है। आज उत्तर-पूर्व भारत न केवल अपनी सांस्कृतिक विविधता के लिए जाना जा रहा है, बल्कि पर्यटन, इन्फ्रास्ट्रक्चर और सामाजिक प्रगति के कारण भी देश और दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है।
नागालैंड का हॉर्नबिल फेस्टिवल हो या मणिपुर का संगाई महोत्सव, ये आयोजन अब सिर्फ रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं हैं, बल्कि यह क्षेत्र की नयी पहचान बन चुके हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिन राज्यों का दौरा किया, उनमें असम और मणिपुर प्रमुख थे, जिससे साफ संकेत मिलता है कि सरकार उत्तर-पूर्व को अब देश के विकास की मुख्यधारा में लाना चाहती है।
यह क्षेत्र अपनी विविध संस्कृति के लिए अद्वितीय है। हर राज्य की अपनी भाषा, परंपरा और त्योहार हैं। नागा जनजातियों के युद्ध नृत्य, मणिपुर की रस लीला, अरुणाचल के बौद्ध मठ और सिक्किम की बर्फीली पहाड़ियों की पृष्ठभूमि में बजती पारंपरिक धुनें इस क्षेत्र को एक जीवंत सांस्कृतिक गाथा में बदल देती हैं। मेघालय के लिविंग रूट ब्रिज, असम के काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और सिक्किम की कंचनजंघा की चोटियाँ न केवल इस क्षेत्र को प्राकृतिक रूप से समृद्ध बनाती हैं, बल्कि वैश्विक पर्यटकों के लिए इसे एक स्वप्नलोक की तरह पेश करती हैं।
साल 2025 में उत्तर-पूर्व भारत से पर्यटन के जरिए ₹50,000 करोड़ की कमाई हुई और इसने 10 लाख से ज्यादा लोगों को आजीविका दी। सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक यह आंकड़ा दोगुना हो। इसके लिए पर्यटन मंत्रालय ने कई नए इको-सर्किट्स और रोमांचक ट्रेल्स की योजना बनाई है। उदाहरण के तौर पर, अरुणाचल प्रदेश की सियांग नदी में रिवर राफ्टिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है।
इन विकास कार्यों के पीछे सरकार की “एक्ट ईस्ट” नीति की अहम भूमिका रही है। 2014 से अब तक ₹1 लाख करोड़ से ज्यादा का निवेश उत्तर-पूर्व के इन्फ्रास्ट्रक्चर में हो चुका है। ईटानगर और गंगटोक में नये एयरपोर्ट बन चुके हैं, डिब्रूगढ़-तिनसुकिया हाईवे जैसी सड़क परियोजनाएं इलाके को जोड़ रही हैं, और 2025 में शुरू हुईं 20 नई ट्रेनें अब इस क्षेत्र को भारत के अन्य हिस्सों से सहज रूप से जोड़ रही हैं।
इस बदलाव का असर केवल सड़कों और हवाई अड्डों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा प्रभाव स्थानीय जीवनशैली पर पड़ा है। अब मावलिन्नोंग जैसे गांव, जिसे एशिया का सबसे साफ गांव कहा जाता है, ईको-टूरिज्म के शानदार उदाहरण बन रहे हैं। यहां स्थानीय लोग अपने घरों को होमस्टे में बदलकर सीधे पर्यटन से आय कमा रहे हैं।
पर्यटन अब इस क्षेत्र की रीढ़ बन चुका है। असम की महिलाओं द्वारा तैयार की जाने वाली रेशमी साड़ियाँ हर साल ₹5,000 करोड़ से अधिक का कारोबार करती हैं। सिक्किम जैसे राज्यों के युवा अब ट्रेकिंग स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं, जिससे न सिर्फ स्थानीय रोजगार बढ़ा है, बल्कि युवाओं को अपने राज्य में ही संभावनाएं दिखाई देने लगी हैं।
उत्तर-पूर्व भारत कभी अशांति और उग्रवाद की छवि से जोड़ा जाता था, लेकिन आज वह छवि बदल चुकी है। 200 से ज्यादा जनजातियाँ मिलकर यहां त्योहारों का आयोजन करती हैं। यह आपसी भाईचारे और विविधता में एकता की जीती-जागती मिसाल है। यहां का बांस शिल्प, जैविक चाय और हस्तशिल्प विदेशों तक निर्यात हो रहा है और यूरोप में इसकी मांग में 25% की वृद्धि हुई है।
हालांकि सब कुछ चमकता हुआ नहीं है। चुनौतियां अब भी हैं — मणिपुर में हालिया जातीय तनाव, लोकटक झील जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र पर अत्यधिक पर्यटन का दबाव, और कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी कनेक्टिविटी की कमी। अरुणाचल प्रदेश में चीन के साथ सीमा संबंधी विवाद भी सतर्कता की मांग करता है। मगर सरकार अब इन विषयों पर गंभीर दिख रही है — प्लास्टिक मुक्त पर्यटन, स्मार्ट टूरिज्म पुलिस और टिकाऊ विकास को प्राथमिकता दी जा रही है।
आज उत्तर-पूर्व सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि भारत की आत्मा को दर्शाने वाला क्षेत्र बन चुका है। बिहू जैसे उत्सव लंदन जैसे शहरों में बसे प्रवासी भारतीयों द्वारा मनाए जा रहे हैं, जिससे उत्तर-पूर्व की सांस्कृतिक छवि अब अंतरराष्ट्रीय पहचान बना रही है।
2035 तक सरकार का लक्ष्य है कि उत्तर-पूर्व भारत में पर्यटन का राजस्व ₹1 लाख करोड़ तक पहुंचे। डिजिटल अभियान जैसे #IncredibleNortheast युवाओं को आकर्षित कर रहे हैं। देश और दुनिया अब इस क्षेत्र को एक नए दृष्टिकोण से देख रही है — जहां हर घाटी, हर लोकगीत और हर कारीगरी एक कहानी कहती है।
जैसे प्रधानमंत्री मोदी ने इम्फाल में कहा था:
“उत्तर-पूर्व भारत का विश्व द्वार है।”
और यह वाक्य अब केवल नारा नहीं, बल्कि सच्चाई में बदलता दिखाई दे रहा है। उत्तर-पूर्व अब सिर्फ भारत का कोना नहीं, बल्कि उसका दिल बन रहा है — धड़कता हुआ, रंगीन और भविष्य की ओर बढ़ता हुआ।


