आपके पर्स में रखा ₹10 का नोट कुछ ही हफ्तों में मुड़ने लगता है, गीला होकर खराब हो जाता है, कई बार फट भी जाता है। यही कहानी लगभग हर छोटे नोट की है। अब रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया इस समस्या का एक पुराना हल फिर से आज़माने की तैयारी में है, जिसे पॉलीमर नोट कहा जाता है।
खबर है कि RBI की नोट छापने वाली सहायक कंपनी भारतीय रिज़र्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड ने पॉलीमर शीट बनाने के लिए एक ग्लोबल टेंडर जारी किया है। मकसद है, प्लास्टिक जैसी मजबूत सामग्री से बने नोटों की ट्रायल प्रोडक्शन शुरू करना। शुरुआत ₹10 और ₹20 के नोटों से हो सकती है, क्योंकि यही दोनों नोट सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं और सबसे जल्दी खराब भी होते हैं।
लेकिन यह पहली बार नहीं है जब भारत में पॉलीमर नोट की बात हुई हो। साल 2012 में तत्कालीन सरकार ने एक बड़ा ट्रायल किया था। कोच्चि, मैसूर, जयपुर, भुवनेश्वर और शिमला, इन पांच शहरों में करीब 100 करोड़ पॉलीमर के ₹10 नोट बांटे गए थे। मकसद था यह देखना कि आम लोग इन्हें कैसे अपनाते हैं और यह नोट रोजमर्रा के इस्तेमाल में कितने टिकाऊ साबित होते हैं।
लेकिन यह प्रयोग आगे नहीं बढ़ पाया। तकनीकी दिक्कतें आईं, छपाई की प्रक्रिया में बदलाव जरूरी थे, और नई मशीनरी तथा कच्चे माल की सप्लाई चेन खड़ी करना आसान नहीं था। नतीजा यह हुआ कि यह योजना ठंडे बस्ते में चली गई, और उसके बाद कई सालों तक RBI की सालाना रिपोर्टों में पॉलीमर नोट का ज़िक्र तक नहीं मिला।
तो सवाल उठता है, अब अचानक यह मुद्दा फिर से क्यों उठ रहा है? इसका सीधा जवाब है, पैसा और मेहनत, दोनों की बचत। RBI का नोट छापने का खर्च लगातार बढ़ रहा है। वित्त वर्ष 2024 में यह खर्च करीब 5,101 करोड़ रुपये था, जो 2025 में बढ़कर 6,372 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया।
इसकी एक बड़ी वजह है गंदे और खराब हो चुके नोटों को बदलना। वित्त वर्ष 2025 में करीब 2,380 करोड़ नोट सिर्फ इसलिए नष्ट करने पड़े क्योंकि वे इस्तेमाल लायक नहीं रह गए थे। एक साल पहले यह आंकड़ा 2,124 करोड़ था। यानी हर साल यह समस्या और बड़ी होती जा रही है।
खासतौर पर ₹20 के नोट का चलन लगातार बढ़ रहा है। मार्च 2024 में बाजार में चल रहे ₹20 नोटों की कुल कीमत करीब 26,795 करोड़ रुपये थी, जो मार्च 2026 तक बढ़कर करीब 28,105 करोड़ रुपये हो गई। यह आंकड़ा नोटों की गिनती नहीं, बल्कि उनकी कुल वैल्यू दर्शाता है। जितना ज्यादा इस्तेमाल, उतनी ही जल्दी नोट खराब होते हैं, और उतना ही ज्यादा खर्च RBI को दोबारा छपाई पर करना पड़ता है।
यहीं पर पॉलीमर नोट का फायदा समझ आता है। ये नोट कागज़ की जगह एक पतली, लचीली प्लास्टिक शीट पर छापे जाते हैं। ये सामान्य कागज़ के नोटों के मुकाबले करीब ढाई गुना ज्यादा टिकाऊ माने जाते हैं। पानी और नमी का इन पर असर नहीं होता, ये आसानी से फटते नहीं, और नकली नोट बनाना भी इनमें कहीं ज्यादा मुश्किल होता है।
दुनिया के कई देश पहले से ही यह तरीका अपना चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों में पॉलीमर नोट सालों से चलन में हैं, और इन देशों का अनुभव ज्यादातर सकारात्मक रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि पॉलीमर नोट सिर्फ मुड़ने और गीला होने से ही नहीं बचते, बल्कि नकली नोट छापने वालों के लिए भी बड़ी मुसीबत खड़ी करते हैं। कागज़ की तुलना में इन पर सुरक्षा फीचर, जैसे पारदर्शी खिड़की और महीन डिज़ाइन, कहीं बेहतर तरीके से लगाए जा सकते हैं। इससे नकली नोट पकड़ना आसान हो जाता है, और आम आदमी भी नोट की असलियत पहचानने में कम भ्रमित होता है।
हालांकि, यह बदलाव इतना आसान भी नहीं है। कागज़ से प्लास्टिक की तरफ जाने के लिए RBI को नई छपाई तकनीक में भारी निवेश करना होगा। खास तरह की स्याही चाहिए होगी, और कच्चे माल की एक बिल्कुल नई सप्लाई चेन भी तैयार करनी पड़ेगी। यही वजह है कि अभी सीधे बड़े पैमाने पर बदलाव करने के बजाय, RBI एक सीमित पायलट प्रोजेक्ट से शुरुआत करने की सोच रहा है, ताकि नतीजे देखकर ही आगे का फैसला लिया जा सके।
गौर करने वाली बात यह भी है कि RBI की सबसे ताज़ा सालाना रिपोर्ट, जो मई 2026 में जारी हुई थी, उसमें भी पॉलीमर नोट का कोई सीधा ज़िक्र नहीं है। यानी अभी यह पूरी योजना शुरुआती चरण में ही है, और इसे लेकर कोई आधिकारिक समयसीमा फिलहाल सामने नहीं आई है।
अगर यह ट्रायल सफल रहा, तो आने वाले सालों में भारत भी उन देशों की सूची में शामिल हो सकता है जहां प्लास्टिक करेंसी आम बात है। लेकिन 2012 का अनुभव यह भी याद दिलाता है कि सिर्फ आइडिया अच्छा होना काफी नहीं है, उसे ज़मीन पर उतारना उतना ही चुनौतीपूर्ण भी हो सकता है।
फिलहाल के लिए इतना तय है, आपके पर्स में मौजूद ₹10 और ₹20 के नोट आने वाले सालों में शायद वैसे न दिखें जैसे आज दिखते हैं।
Subscribe Deshwale on YouTube


