भारत विविधता और हस्तकला की भूमि है। यहाँ हर राज्य की अपनी कोई न कोई खास परंपरा है, जो उसे बाकी दुनिया से अलग बनाती है। महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले की एक ऐसी ही अनमोल पहचान है – कोल्हापुरी चप्पल। यह कोई साधारण चप्पल नहीं है, बल्कि यह सदियों से चली आ रही एक जीवंत परंपरा है, जिसमें मेहनत, शिल्पकला और संस्कृति का गहरा मेल है। यह चप्पल न केवल भारत में, बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध है। आज इसे पहनना सिर्फ परंपरा से जुड़ना नहीं, बल्कि फैशन और स्वदेशी सोच से जुड़ना भी है।
कोल्हापुरी चप्पलों का इतिहास लगभग 800 से 900 साल पुराना बताया जाता है। यह परंपरा 13वीं शताब्दी में मराठा साम्राज्य और तत्कालीन राजघरानों के ज़माने से शुरू हुई थी। उस समय इन्हें “कपशी चप्पल” कहा जाता था और ये सिर्फ विशेष वर्गों के लिए बनती थीं। इनका निर्माण मुख्य रूप से कोल्हापुर के साथ-साथ कर्नाटक की सीमावर्ती क्षेत्रों – जैसे अठनी, निपाणी, गडहिंग्लज, कागल, कुन्नूर – में भी होता था। इन चप्पलों को हाथ से तैयार किया जाता था, जिसमें न तो कोई मशीन होती थी, न कील, न गोंद – सिर्फ शुद्ध चमड़ा, धागे और कारीगर की मेहनत।
कोल्हापुरी चप्पल बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह हस्तनिर्मित होती है। पहले भैंस या बैल की खाल को परंपरागत तरीकों से साफ किया जाता है, फिर उसे रंगा और सुखाया जाता है। इसके बाद नाप के अनुसार डिज़ाइन बनाई जाती है, और फिर हाथ से कटिंग की जाती है। इन चप्पलों की विशेषता है कि उनकी सिलाई भी हाथ से होती है, और ऊपर से उन्हें धागों, मोतियों और बेलबूटों से सजाया जाता है। एक अच्छी गुणवत्ता की कोल्हापुरी चप्पल को बनाने में लगभग दो से तीन दिन का समय लग सकता है, और जटिल डिज़ाइनों के लिए दो सप्ताह तक का समय भी लग सकता है। यह पूरी प्रक्रिया न केवल धैर्य और निपुणता मांगती है, बल्कि इसमें कारीगर की आत्मा जुड़ी होती है।
कोल्हापुरी चप्पल की खासियत यही है कि यह टिकाऊ होती है, गर्मियों के मौसम में बेहद आरामदायक होती है, और सालों तक बिना फटे या घिसे काम करती है। यही कारण है कि गांवों से लेकर शहरों और अब ग्लोबल फैशन रैंप तक इसकी मांग बढ़ रही है। एक वक्त ऐसा था जब सस्ते मशीन से बने चप्पल और सैंडल आने लगे थे, जिससे कोल्हापुरी चप्पल की पहचान कमजोर पड़ने लगी थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पर्यावरण-संवेदनशील फैशन, स्वदेशी अभियान और ‘वोकल फॉर लोकल’ जैसे प्रयासों ने कोल्हापुरी चप्पल को दोबारा से लोगों के बीच लोकप्रिय बना दिया।
आज कोल्हापुरी चप्पल सिर्फ महाराष्ट्र या भारत तक सीमित नहीं है। यह अमेरिका, यूरोप, गल्फ देशों और जापान जैसे स्थानों तक पहुंच चुकी है। कई बॉलीवुड कलाकारों और फैशन डिज़ाइनर्स ने इसे प्रमोट किया है। रणवीर सिंह, विद्या बालन जैसे अभिनेता इसे अपने ट्रेडिशनल लुक्स में पहनते हैं। इतना ही नहीं, यह चप्पल Amazon, Flipkart और Etsy जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध है। कुछ डिज़ाइन तो इतने खूबसूरत होते हैं कि वे किसी भी इंटरनेशनल ब्रांड को टक्कर दे सकते हैं।
कोल्हापुरी चप्पल एक उत्कृष्ट उदाहरण है टिकाऊ फैशन का, जो पर्यावरण के प्रति जागरूकता को बढ़ावा देता है। प्राकृतिक चमड़े और पारंपरिक तकनीकों का उपयोग इसे पर्यावरण-अनुकूल बनाता है, क्योंकि इसमें न तो कृत्रिम चिपकने वाले पदार्थ (glue) का उपयोग होता है और न ही मशीनों का। यह तेजी से बदलते फास्ट फैशन के दौर में एक समय-सम्मानित विकल्प है। साथ ही, यह चप्पल न केवल उपयोगिता प्रदान करती है, बल्कि भारतीय संस्कृति और हस्तकला की गहरी छाप भी छोड़ती है। यह हमें यह भी याद दिलाती है कि पारंपरिक कला को अपनाना केवल फैशन की बात नहीं, बल्कि हमारी जड़ों से जुड़ने का एक तरीका है।
इतनी खूबसूरती और मेहनत के बावजूद यह कारीगरी आज कई विवादों में भी उलझी हुई है। सबसे पहला विवाद 2019 में तब सामने आया जब भारत सरकार ने ‘कोल्हापुरी चप्पल’ को GI टैग यानी Geographical Indication टैग प्रदान किया। यह टैग किसी प्रोडक्ट को उसकी विशेष भौगोलिक पहचान के आधार पर दिया जाता है। कोल्हापुरी चप्पल के मामले में यह टैग महाराष्ट्र के कोल्हापुर, सतारा, सांगली और सोलापुर जिलों के साथ-साथ कर्नाटक के बेलगावी, निपाणी, गडहिंग्लज जैसे जिलों को भी मिला। बस यहीं से विवाद शुरू हुआ। महाराष्ट्र के कारीगरों का कहना था कि कोल्हापुरी चप्पल का नाम खुद कोल्हापुर से आया है, तो फिर इसमें कर्नाटक को कैसे शामिल किया जा सकता है? इसे कोल्हापुर की परंपरा और पहचान का अपमान माना गया और कई संगठनों ने इसका विरोध भी किया। हालांकि, सरकार का तर्क था कि इस चप्पल की निर्माण परंपरा दोनों राज्यों के कुछ क्षेत्रों में है, और यह एक साझा सांस्कृतिक विरासत है।
हाल ही में एक और बड़ा विवाद तब सामने आया जब इटली की मशहूर फैशन कंपनी प्रादा (Prada) ने अपनी स्प्रिंग/समर 2026 मेन्सवेयर कलेक्शन में मिलान फैशन वीक (23 जून 2025) के दौरान कोल्हापुरी चप्पल से मिलती-जुलती सैंडल पेश की। इन सैंडलों में पतली पट्टियाँ, अंगूठे का रिंग और टैन लेदर था, जो कोल्हापुरी चप्पल की विशिष्ट विशेषताएँ थीं, लेकिन प्रादा ने इन्हें केवल “लेदर सैंडल” कहकर पेश किया, बिना भारतीय मूल का कोई उल्लेख किए। इसकी कीमत लगभग ₹1.1 से ₹2.1 लाख (लगभग €1,200) रखी गई, जबकि भारत में असली कोल्हापुरी चप्पल ₹300 से ₹4,000 में मिल जाती है। सोशल मीडिया पर इसकी तीखी आलोचना हुई, और #NotRealKolhapuri, #RespectLocalCraft जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। लोगों ने सवाल उठाया कि बिना कोल्हापुर की मिट्टी छुए, बिना भारतीय कारीगरों की मेहनत लिए कोई कंपनी कैसे ‘कोल्हापुरी’ नाम से चप्पल बेच सकती है?
प्रादा का खुलासा: इस विवाद के बाद, प्रादा ने 27 जून 2025 को महाराष्ट्र चैंबर ऑफ कॉमर्स, इंडस्ट्री एंड एग्रीकल्चर (MACCIA) को जवाब देते हुए स्वीकार किया कि उनकी सैंडल कोल्हापुरी चप्पल से प्रेरित थी। प्रादा के कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी हेड, लोरेंजो बेर्टेली ने अपने पत्र में कहा, “हम स्वीकार करते हैं कि प्रादा मेन्स 2026 फैशन शो में प्रदर्शित सैंडल पारंपरिक भारतीय हस्तनिर्मित फुटवियर से प्रेरित हैं, जिनका सैकड़ों वर्षों का इतिहास है। हम इस भारतीय शिल्पकला के सांस्कृतिक महत्व को गहराई से मान्यता देते हैं।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ये डिज़ाइन अभी प्रारंभिक चरण में हैं और इन्हें व्यावसायिक रूप से उत्पादित या बेचा जाना तय नहीं है। प्रादा ने जिम्मेदार डिज़ाइन प्रथाओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई और भारतीय कारीगर समुदायों के साथ सार्थक संवाद के लिए तत्परता दिखाई। बेर्टेली ने कहा, “हम स्थानीय भारतीय कारीगर समुदायों के साथ संवाद शुरू करने और उनकी शिल्पकला को उचित मान्यता देने के लिए तैयार हैं।”
इसके बावजूद, महाराष्ट्र के कारीगरों और नेताओं ने इसे सांस्कृतिक हथियार (cultural appropriation) का मामला बताया। बीजेपी सांसद धनंजय महाडिक ने कोल्हापुरी चप्पल कारीगरों के एक समूह के साथ 26 जून 2025 को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात की और GI अधिकारों की रक्षा के लिए कार्रवाई की मांग की। सांत रोहिदास लेदर इंडस्ट्रीज एंड चर्मकार डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (LIDCOM) और कर्नाटक के LIDKAR, जो GI प्रमाणन साझा करते हैं, ने कानूनी कार्रवाई पर विचार करने की बात कही है। हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि GI कानून केवल नाम या उत्पत्ति के अनधिकृत उपयोग को रोकते हैं, डिज़ाइन की नकल को नहीं।
सांस्कृतिक हथियार और संरक्षण
ये विवाद सांस्कृतिक हथियार और बौद्धिक संपदा की सुरक्षा के गंभीर सवाल उठाते हैं। कोल्हापुरी चप्पल जैसे पारंपरिक उत्पादों का नाम और डिज़ाइन बड़े ब्रांड्स द्वारा इस्तेमाल करना न केवल कारीगरों की मेहनत का अपमान है, बल्कि यह उनकी आजीविका को भी खतरे में डालता है। इसके लिए सरकार को और सख्त बौद्धिक संपदा कानून लागू करने चाहिए, जो स्थानीय कारीगरों को उनके उत्पाद की पहचान और लाभ का पूरा हक दिलाए। साथ ही, उपभोक्ताओं को भी जागरूक होना होगा कि वे असली कोल्हापुरी चप्पल खरीदें, न कि नकली प्रतिकृतियाँ।
भविष्य के लिए सुझाव
इस पूरे मामले ने यह साबित कर दिया कि सिर्फ नाम रखने से कोई उत्पाद कोल्हापुरी नहीं बन जाता। एक असली कोल्हापुरी चप्पल में कारीगर की आत्मा, परंपरा और पीढ़ियों का अनुभव छुपा होता है। यह मुद्दा सिर्फ एक चप्पल तक सीमित नहीं – यह लोकल बनाम ग्लोबल, मेहनत बनाम मार्केटिंग और परंपरा बनाम प्रॉफिट की लड़ाई है। इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या बड़े ब्रांड्स हमारी पारंपरिक कारीगरी की पहचान को कॉपीराइट के नाम पर हथिया सकते हैं? और अगर ऐसा होता है, तो असली कलाकारों को क्या मिलेगा?
वक्त की ज़रूरत है कि कोल्हापुरी चप्पल जैसी पारंपरिक कला को सिर्फ फैशन नहीं, बल्कि “कल्चरल एसेट” यानी सांस्कृतिक संपत्ति के रूप में देखा जाए। इसके लिए कुछ ठोस कदम उठाए जा सकते हैं:
- कारीगरों को प्रशिक्षण और संसाधन: कारीगरों को आधुनिक डिज़ाइन और मार्केटिंग की ट्रेनिंग दी जाए ताकि वे वैश्विक माँग के अनुसार अपने उत्पाद को अनुकूलित कर सकें।
- ऑनलाइन और अंतरराष्ट्रीय मंच: सरकार और निजी संगठनों को कारीगरों के लिए डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भाग लेने के अवसर प्रदान करने चाहिए।
- जागरूकता अभियान: उपभोक्ताओं को असली और नकली कोल्हापुरी चप्पल में अंतर समझाने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएँ।
- सहकारी समितियाँ: कारीगरों के लिए सहकारी समितियाँ बनाई जाएँ, जो उनकी कला को बढ़ावा दे और उन्हें उचित मूल्य दिलाए।
आज जब हम पर्यावरण के प्रति जागरूक हो रहे हैं, तो कोल्हापुरी चप्पल जैसा पारंपरिक, टिकाऊ और हाथ से बना उत्पाद हमारे जीवन और फैशन का हिस्सा ज़रूर होना चाहिए। यह चप्पल न केवल एक फैशन स्टेटमेंट है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक विरासत और कारीगरों की मेहनत का प्रतीक है। प्रादा जैसे ब्रांड्स द्वारा इसकी प्रेरणा लेना स्वागतयोग्य है, बशर्ते वे इसकी जड़ों को सम्मान दें और कारीगरों को उचित श्रेय और मुआवजा दें। अगली बार जब आप फुटवियर खरीदें, तो सिर्फ ब्रांड न देखें – सोचें कि आप एक कारीगर के पसीने और उसकी परंपरा को अपना रहे हैं। आइए, हम सब मिलकर ‘वोकल फॉर लोकल’ को और मजबूत करें और कोल्हापुरी चप्पल जैसी कला को विश्व पटल पर और ऊँचा उठाएँ।
आपके विचार: आप इस पारंपरिक कला को वैश्वीकरण के दौर में और बेहतर तरीके से संरक्षित और प्रचारित करने के लिए क्या सुझाव देंगे?


