अपना पता एक बार ध्यान से देखिए। अब सोचिए कि देश में कितने लोगों के पते का कोई न कोई हिस्सा आपसे मिलता होगा। लगभग हर राज्य में गांधी नगर है, स्टेशन रोड है, शिवाजी चौक है। कई कस्बों के नाम तो दूसरे राज्यों के कस्बों से भी मिलते हैं। 1972 से पहले डाकघर में बैठा कर्मचारी इन सबको हाथ से सुलझाता था, और कई बार चिट्ठी ऐसी लिपि में लिखी होती थी जिसे पढ़ना भी मुश्किल होता था। पचास साल पहले भारतीय डाक विभाग इसी उलझन से जूझ रहा था।
1947 में जब देश आज़ाद हुआ, तब यहाँ 23,344 डाकघर थे, जिनमें ज़्यादातर शहरों में थे। आगे चलकर यह नेटवर्क गाँवों तक पहुँचा और चिट्ठियों की संख्या भी बढ़ती गई। लेकिन छँटाई का तरीका वही पुराना रहा। क्लर्क अपनी याददाश्त, अनुभव और अंदाज़े पर चलते थे। भारत में यह काम और कठिन था। चिट्ठियाँ हिंदी, अंग्रेज़ी, तमिल, बांग्ला, उर्दू और न जाने कितनी भाषाओं में आती थीं। एक ही जगह का नाम तीन अलग तरह से लिखा मिल सकता था। एक शहर की चिट्ठी आसानी से मिलते-जुलते नाम वाले दूसरे शहर पहुँच जाती थी, और हर गलत मोड़ का मतलब था कई दिन की देरी। विभाग को ऐसी चीज़ चाहिए थी जो भाषा पर निर्भर न हो। जवाब था, अंक।
पोस्टल इंडेक्स नंबर, यानी PIN, 15 अगस्त 1972 को शुरू किया गया। इसका विचार श्रीराम भीकाजी वेलंकर को दिया जाता है, जो उस समय संचार मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव और डाक-तार बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य थे। वेलंकर सिर्फ़ सरकारी अधिकारी नहीं थे। वे संस्कृत के कवि भी थे और 1996 में उन्हें संस्कृत के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार मिला। 1973 में उन्होंने नई दिल्ली में हुई अंतरराष्ट्रीय डाक-टिकट प्रदर्शनी इंडिपेक्स की अध्यक्षता की, जिसमें 120 देश शामिल हुए थे। वे 31 दिसंबर 1973 को सरकारी सेवा से रिटायर हुए और 1999 में मुंबई में उनका निधन हुआ। स्वतंत्रता दिवस के दिन इसे शुरू करना एक अच्छा संयोग था, पर असली मेहनत इसकी बनावट में थी।
PIN एक कीप की तरह बना है। यह बड़े दायरे से शुरू होकर क़दम-दर-क़दम छोटा होता जाता है। पहला अंक ज़ोन बताता है। देश में नौ ज़ोन हैं: आठ क्षेत्रीय और एक सेना के लिए। ज़ोन 1 में दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर आते हैं। ज़ोन 8 में बिहार और झारखंड हैं। ज़ोन 9 सेना डाक सेवा के लिए सुरक्षित है, जो सैनिकों तक उनकी तैनाती की जगह पर डाक पहुँचाती है। पहले दो अंक मिलकर उप-क्षेत्र बताते हैं, जो आमतौर पर कोई राज्य या डाक सर्कल होता है। पहले तीन अंक छँटाई ज़िले की पहचान कराते हैं, जिसका मुख्यालय उस इलाके के सबसे बड़े शहर का मुख्य डाकघर होता है। आख़िरी तीन अंक उस डिलीवरी डाकघर की पहचान हैं जो चिट्ठी को अंत में पहुँचाता है।
मध्य प्रदेश के उज्जैन का PIN 456001 लेकर देखिए। 4 पश्चिमी ज़ोन है। 5 मध्य प्रदेश का उप-क्षेत्र है। 6 उज्जैन का छँटाई ज़िला है। आख़िरी 001 मुख्य डाकघर की पहचान है। देश के किसी भी कोने में बैठा छँटाई कर्मचारी इन छह अंकों से समझ लेता है कि चिट्ठी कहाँ जानी है, पते का एक भी शब्द पढ़े बिना। कुछ छोटी बातें भी जानने लायक हैं। किसी छँटाई ज़िले में डिलीवरी डाकघरों को उनके खुलने के क्रम से नंबर मिलते हैं, और 01 मुख्य डाकघर को मिलता है। पास-पास के दो डाकघरों के सिर्फ़ पहले चार अंक एक जैसे होते हैं। और चूँकि ज़ोन 1 से 9 तक ही हैं, भारत में कोई भी PIN 0 से शुरू नहीं होता।
हर PIN एक ही डिलीवरी डाकघर का होता है। वही डाकघर अपने अधीन आने वाले सभी उप-डाकघरों और शाखा डाकघरों की डाक लेता है। इसलिए एक PIN कई गाँवों के समूह को भी कवर कर सकता है। यानी PIN से छँटाई करने वाले को पता चलता है कि चिट्ठी किस डाकघर जानी है, पर घर कौन-सा है, यह वह नहीं बताता। यह आख़िरी काम आज भी पते और इलाके को जानने वाले डाकिये के भरोसे है।
अंकों पर आधारित ऐसी व्यवस्था अपनाने वाला भारत पहला देश नहीं था। अमेरिका ने नौ साल पहले, 1 जुलाई 1963 को ZIP कोड शुरू किया था, और मक़सद वही था: डाक की तेज़ छँटाई। भारत ने अंकों की श्रेणीबद्ध व्यवस्था का मूल विचार लिया, लेकिन अपनी भौगोलिक बनावट और अनेक भाषाओं के हिसाब से अपना अलग ढाँचा बनाया।
1972 में PIN चिट्ठियों, मनीऑर्डर और तार के लिए था। आज हम इसे किसी और काम में ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं। शॉपिंग ऐप पर डालकर देखते हैं कि सामान हमारे इलाके में पहुँचेगा या नहीं। बैंक, सिम और KYC के फ़ॉर्म में भरते हैं। फूड डिलीवरी और कैब ऐप इसी से तय करते हैं कि वे हमारे इलाके में सेवा देते हैं या नहीं। 2022 में इस व्यवस्था को 50 साल पूरे हुए, और सरकार ने इस मौक़े पर एक स्मारक डाक टिकट जारी किया।
PIN की एक सीमा है। वह इलाके तक पहुँचाता है, दरवाज़े तक नहीं। इसे दूर करने के लिए डाक विभाग ने आईआईटी हैदराबाद और इसरो के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर के साथ मिलकर 27 मई 2025 को DIGIPIN शुरू किया। यह अक्षांश और देशांतर पर आधारित 10 अक्षरों का कोड है, और हर कोड लगभग 4 मीटर गुणा 4 मीटर के एक वर्ग को दर्शाता है। दोनों कोड अलग-अलग काम करते हैं। PIN छँटाई व्यवस्था को बताता है कि चिट्ठी किस ज़ोन, ज़िले और डाकघर को संभालनी है। DIGIPIN का मक़सद डिलीवरी करने वाले को बताना है कि ठीक कहाँ रुकना है।
ज़्यादातर सरकारी योजनाओं को चर्चा में आने के लिए अभियान चलाना पड़ता है। PIN कोड को इसकी ज़रूरत नहीं पड़ी। यह बस काम करने लगा, और धीरे-धीरे हर भारतीय के पते का हिस्सा बन गया। 1972 में छँटाई घर के एक क्लर्क की परेशानी के हल के रूप में यह शुरू हुआ था, और आज भी अपना काम कर रहा है।
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