By: Ragini Chaubey
क्या मृत्यु भी किसी के लिए मुक्ति का द्वार हो सकती है? काशी के मणिकर्णिका घाट पर पहुँचने वाले लोगों का विश्वास यही कहता है। गंगा किनारे बसे इस घाट को हिंदू परंपरा में महाश्मशान कहा जाता है, जहाँ चिताओं की लौ जीवन के अंतिम सत्य की याद दिलाती है। श्रद्धालुओं का मानना है कि यहाँ अंतिम संस्कार होने पर आत्मा जन्म और मृत्यु के चक्र से छूट जाती है। यही विश्वास मणिकर्णिका को बनारस के सबसे अहम घाटों में शामिल करता है।
इस घाट के नाम के पीछे एक पौराणिक कथा भी है। मणिकर्णिका का अर्थ है कान का रत्न-जड़ित आभूषण। कथा के अनुसार, यहाँ बने कुंड में देवी पार्वती का कर्णफूल गिर गया था और उसी से घाट का नाम पड़ा। कुछ कथाओं में यह कर्णकुंडल भगवान शिव का बताया गया है। एक और प्रचलित विश्वास यह है कि अंतिम संस्कार के समय स्वयं शिव मृतक के कान में तारक मंत्र फूँकते हैं और उसे मुक्ति दिलाते हैं।
नाम का एक रिश्ता झाँसी की रानी से भी जुड़ता है। लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी में हुआ था और बचपन में उनका नाम मणिकर्णिका था। हालाँकि यह साबित नहीं है कि उनका नाम इसी घाट के नाम पर रखा गया था, इसलिए इसे नाम का मेल भर मानना ठीक होगा।
इतिहास की बात करें तो वाराणसी के सबसे पुराने घाटों में इसकी गिनती होती है। इसके पत्थर के घाट के बनने का समय कुछ स्रोत 1372 बताते हैं, जबकि कुछ इसे 1300 के आसपास का मानते हैं। 18वीं सदी में बाजीराव पेशवा के संरक्षण में इसका पुनर्निर्माण हुआ। माना जाता है कि 1791 में अहिल्याबाई होलकर ने भी इसे सँवारने में योगदान दिया।
वाराणसी में श्मशान के लिए दो घाट हैं, हरिश्चंद्र और मणिकर्णिका, और इनमें मणिकर्णिका को अधिक प्रमुख माना जाता है। यहाँ की सबसे खास बात जलती चिताओं का सिलसिला है। चिताएँ यहाँ दिन-रात जलती रहती हैं और सन्नाटा शायद ही कभी पसरता है। गंगा की सीढ़ियों पर लकड़ियों के ढेर और शवयात्राओं के साथ पहुँचे परिजन यहाँ का आम दृश्य हैं। इसी चाह में कि अपनों को मुक्ति मिले, देश के कई हिस्सों से लोग उनका अंतिम संस्कार करने यहाँ आते हैं।
यहाँ की सबसे चर्चित धारणा ‘अखंड अग्नि’ से जुड़ी है। यह पवित्र अग्नि हज़ारों वर्षों से जल रही है और यहाँ हर चिता इसी से प्रज्वलित होती है। हालाँकि इसकी सटीक उम्र का कोई प्रमाणित रिकॉर्ड नहीं मिलता। अलग-अलग स्रोत इसे 3,000 से 3,500 वर्ष पुरानी बताते हैं।
इस अग्नि को संभालने की ज़िम्मेदारी पीढ़ियों से डोम समुदाय निभाता आ रहा है। उनके मुखिया को डोम राजा कहा जाता है, जो घाट के आपसी विवाद सुलझाने का काम भी देखते हैं। विश्वास है कि डोम राजा के हाथों आग मिले बिना अंतिम संस्कार अधूरा माना जाता है। एक रिपोर्ट के अनुसार यहाँ माचिस नहीं चलती और हर चिता उसी अग्नि से जलाई जाती है।
लेकिन जिन हाथों पर इस अनुष्ठान की ज़िम्मेदारी है, उनकी अपनी ज़िंदगी आसान नहीं रही। डोम समुदाय अनुसूचित जाति में गिना जाता है। 2015 की एक रिपोर्ट में डोम राजा ने बताया था कि उन्हें विश्वनाथ मंदिर समेत शहर के पवित्र मंदिरों में प्रवेश की अनुमति नहीं है। जिस घाट को मुक्ति का द्वार कहा जाता है, उसकी आग के रखवाले खुद समाज के हाशिये पर खड़े दिखते हैं।
इस काम की एक अलग कीमत भी है। एक शोधकर्ता ने 2010 के दशक में आठ वर्षों तक मणिकर्णिका के डोम समुदाय पर अध्ययन किया। उनके मुताबिक यहाँ पलने वाले बच्चों के लिए रोज़ चिताएँ देखना सामान्य बात बन जाती है, पर यह आदत बन जाना खुद एक बोझ है। जब उन्होंने एक युवा डोम से बचपन के बारे में पूछा, तो जवाब मिला कि सब कुछ आम था।
मणिकर्णिका की कहानी इसलिए दो परतों में चलती है। एक परत आस्था की है, जहाँ चिता की लौ मुक्ति का रास्ता मानी जाती है। दूसरी परत उन लोगों की है, जो इस आस्था को रोज़ अपने कंधों पर ढोते हैं और जिनकी कहानी इस घाट की चर्चाओं में अक्सर पीछे छूट जाती है। जब तक ये दोनों पहलू साथ नहीं देखे जाते, तब तक इस घाट को पूरी तरह समझना मुश्किल है।
मृत्यु को यहाँ जीवन के अंतिम सत्य के रूप में देखा जाता है। इसी सोच के कारण मणिकर्णिका कई लोगों के लिए भय से ज़्यादा श्रद्धा और स्वीकार का स्थान बन जाता है। यहाँ जलती हर चिता याद दिलाती है कि जीवन की हर यात्रा का एक पड़ाव होता है, और उसे स्वीकार करना भी एक तरह की मुक्ति है।
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