मान लीजिए आपका फोन तीन साल पुराना हो चुका है। बैटरी दोपहर तक जवाब दे देती है, स्क्रीन बीच-बीच में अटक जाती है, और आप सोच रहे हैं कि अब नया ले ही लिया जाए। दुकान पर पहुँचते हैं तो पसंद वाले मॉडल का दाम पिछली बार देखे गए दाम से कई हज़ार रुपये ऊपर मिलता है। आप फोन वापस रख देते हैं और कहते हैं, “देखते हैं, अगले महीने।” यह कहानी किसी एक की नहीं है। Counterpoint Research के मुताबिक 2026 की शुरुआत से अब तक दुनिया भर में स्मार्टफोन के खुदरा दाम औसतन करीब 20 प्रतिशत बढ़ चुके हैं।
बाज़ार के आँकड़ों में यह झिझक साफ़ दिखती है। जुलाई से सितंबर 2026 की तिमाही में भारत में स्मार्टफोन शिपमेंट पिछले साल की इसी तिमाही के मुक़ाबले 20 प्रतिशत कम रहे। यह Counterpoint का आँकड़ा है, और लगभग एक दशक का सबसे निचला स्तर है। Omdia का अनुमान और सख़्त है। उसके हिसाब से गिरावट 26 प्रतिशत रही और शिपमेंट करीब 3.58 करोड़ फोन तक सिमट गए, जो 2016 के बाद किसी भी तीसरी तिमाही का सबसे कम आँकड़ा है। एक बारीकी याद रखिए। शिपमेंट वे फोन हैं जो कंपनियों ने बाज़ार में भेजे। ग्राहकों ने कितने ख़रीदे, इसका सीधा हिसाब यह नहीं है।
सबसे ज़्यादा चोट सस्ते फोन को लगी। Counterpoint के अनुसार 20,000 रुपये से कम के फोन के शिपमेंट 47 प्रतिशत गिर गए, यानी लगभग आधे। कारण सीधा है। मॉडलों के दाम चढ़े, और जो फोन कल तक 20,000 के नीचे बिकता था, वह उस रेखा के पार चला गया।
दाम चढ़ने की कहानी फोन कंपनियों के दफ़्तरों में नहीं, चिप बनाने वाली फ़ैक्ट्रियों में लिखी गई है। हर स्मार्टफोन में दो तरह की मेमोरी होती है। एक RAM, जिसे DRAM कहते हैं और जिसमें चल रहे ऐप टिके रहते हैं। दूसरी स्टोरेज, जिसे NAND कहते हैं और जहाँ आपकी तस्वीरें और ऐप रखे रहते हैं। AI के बूम के बाद बड़ी टेक कंपनियाँ धड़ाधड़ डेटा सेंटर बना रही हैं, और इन्हें मेमोरी की भारी भूख है। IDC के मुताबिक मेमोरी बनाने वाली बड़ी कंपनियों ने अपनी क्षमता का बड़ा हिस्सा AI सर्वरों के लिए बनने वाली ख़ास मेमोरी की ओर मोड़ दिया है, जहाँ मुनाफ़ा ज़्यादा है। रिपोर्टों के अनुसार बड़े क्लाउड ख़रीदार वहाँ लंबे सौदे भी कर रहे हैं। जो मेमोरी बची, उसके लिए फोन बनाने वाली कंपनियों को ज़्यादा पैसे चुकाने पड़े।
इनके सामने चार रास्ते थे: बढ़ा हुआ ख़र्च ख़ुद झेलना, दाम बढ़ाना, फोन के फ़ीचर घटाना-बदलना, या कम फोन बनाना। ज़्यादातर ने दाम बढ़ाए, और जिन मॉडलों में कमाई पतली थी, उनका उत्पादन घटा दिया। दुनिया भर में यही हुआ। Counterpoint और Omdia, दोनों के शुरुआती अनुमान में तीसरी तिमाही में वैश्विक शिपमेंट 20 प्रतिशत गिरे। Counterpoint के हिसाब से यह 2012 के बाद किसी तीसरी तिमाही का सबसे कमज़ोर स्तर है।
पर पूरा दोष चिप के सिर नहीं मढ़ा जा सकता। Counterpoint के एक विश्लेषक के मुताबिक भारत में मेमोरी की लागत का दबाव पहले से कमज़ोर चल रही माँग पर आ गिरा। रिपोर्टों के अनुसार लोग फोन बदलने में देर कर रहे हैं। और Omdia ने एक वजह गिनाई है जो अक्सर छूट जाती है। इस साल दिवाली देर से है, इसलिए त्योहार के लिए दुकानों में माल भरने का काम सितंबर से खिसककर अक्टूबर में चला गया, और कंपनियों व रिटेलरों ने माल रखने में एहतियात बरता। यानी इस तिमाही की गिरावट का एक हिस्सा बस कैलेंडर का है। फिर भी ऊँचे दाम और सँभलकर होता ख़र्च, दोनों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। ग्राहक फोन लेना छोड़ नहीं रहे। वे उसे आगे टाल रहे हैं।
इस मंदी में सब बराबर नहीं डूबे। Samsung और Apple के शिपमेंट भी घटे, पर दूसरों से कम, इसलिए वैश्विक बाज़ार में उनका हिस्सा बढ़ा। Samsung का करीब 23 और Apple का करीब 22 प्रतिशत। Counterpoint के मुताबिक iPhone 18 Pro की शुरुआत पिछले मॉडलों से बेहतर रही, ख़ासकर चीन और भारत में। उधर Xiaomi के वैश्विक शिपमेंट 30 प्रतिशत से ज़्यादा गिरे, और उसका हिस्सा 14 से घटकर 10 प्रतिशत रह गया। बाज़ार सिकुड़ा, और महँगे फोन बेचने वाले बड़े नाम उसमें से बड़ा हिस्सा ले गए।
राहत जल्दी आती नहीं दिखती। Counterpoint का अनुमान है कि इस साल भारत का स्मार्टफोन बाज़ार करीब 13 प्रतिशत सिकुड़ेगा, और त्योहारी सेल के बाद कंपनियाँ दाम एक बार फिर बढ़ा सकती हैं। Omdia के अनुसार 2027 में भी हल्की गिरावट संभव है और दामों का दबाव अगले साल की पहली छमाही तक बना रह सकता है। IDC का अनुमान है कि मेमोरी की किल्लत 2027 तक खिंच सकती है।
तो दुकानदार जब अगली बार कहे कि “दाम बढ़ गए हैं, भाई साहब”, तो उसकी बात में बाज़ार की सच्चाई है। उसकी एक बड़ी वजह आपसे बहुत दूर, किसी डेटा सेंटर की मशीनों में बैठी है। तब तक बहुत से लोगों का “अगले महीने देखेंगे” चलता रहेगा।
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