११ मार्च २०२६ की सुबह एक तस्वीर सोशल मीडिया पर तेज़ी से फैली। तस्वीर में मुंबई की मेयर रितु तावड़े की सरकारी गाड़ी थी और उस पर लाल-नीली चमकती बत्तियाँ लगी थीं। ये वही बत्तियाँ हैं जो पुलिस की गाड़ियों या एम्बुलेंस पर दिखती हैं। ‘एक्स’ पर एक यूज़र ने सवाल उठाया कि क्या यह क़ानूनी तौर पर अधिकृत है। बात बस इतनी थी, पर आगे जो हुआ वह दिलचस्प था।
दो दिन के भीतर आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली ने मेयर के दफ़्तर को औपचारिक पत्र लिखा। और १४ मार्च २०२६ तक बृहन्मुंबई महानगरपालिका यानी बीएमसी ने मेयर की गाड़ी और एस्कॉर्ट स्कॉर्पियो दोनों से बत्तियाँ हटा दीं। यह विवाद चार दिन में सुलझ गया। लेकिन इसकी जड़ें करीब एक दशक पुरानी हैं।
क़ानून क्या कहता है
क़ानूनी स्थिति बिल्कुल साफ़ है। मई २०१७ में केंद्र सरकार ने सरकारी गाड़ियों पर लाल बत्ती पर पाबंदी लगाई। मक़सद वीआईपी संस्कृति को ख़त्म करना था। आदेश व्यापक था। मंत्रियों, नौकरशाहों और जनप्रतिनिधियों की गाड़ियों से बत्ती हटा ली गई। सिर्फ़ पुलिस और वास्तविक आपातकालीन सेवाओं को छूट मिली।
महाराष्ट्र सरकार इससे भी पहले कदम उठा चुकी थी। दिसंबर २०१३ में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर राज्य ने उन पदों की सूची में कटौती की जिन्हें बत्ती लगाने का अधिकार था। संशोधित सूची २०१४ में जारी हुई। उसमें मुंबई के मेयर का नाम नहीं था। पहले मेयर की गाड़ी पर एम्बर रंग की बत्ती की अनुमति थी, वह भी तब छिन गई। यानी एक दशक से ज़्यादा समय से मेयर की गाड़ी पर कोई भी बत्ती क़ानूनी नहीं है। फिर भी जब मेयर तावड़े ने पदभार संभाला और उन्हें नई सरकारी गाड़ी दी गई, तो उस पर लाल-नीली बत्तियाँ ऐसे लगाई गईं जैसे यह तो होना ही था।
बीएमसी की भूलने की आदत
मुंबई का यह नागरिक निकाय एशिया के सबसे अमीर नगर निगमों में से एक है। इसका सालाना बजट हज़ारों करोड़ रुपये का है। इसमें क़ानूनी प्रकोष्ठ हैं, सतर्कता विभाग है, ख़रीद अधिकारी हैं। फिर भी ख़रीद की पूरी प्रक्रिया में किसी ने यह जाँचना ज़रूरी नहीं समझा कि देश के सबसे बड़े शहर के मेयर की गाड़ी पर लगाई जा रही बत्ती क़ानूनी है या नहीं।
एस्कॉर्ट स्कॉर्पियो पर भी वही बत्तियाँ थीं। इसका मतलब यह है कि यह कोई अकेली चूक नहीं थी। यह एक ऐसी पुरानी रवायत जैसी दिखती है जिसे कभी सवाल नहीं किया गया।
सियासी बहस भी खूब हुई
विपक्ष ने तीखे सवाल उठाए। बीएमसी में विपक्ष की नेता किशोरी पेडनेकर ने पूछा कि क्या मुंबई के मेयर अब प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से भी बड़े हो गए हैं, जिनकी गाड़ियों से भी बत्ती हटाई जा चुकी है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने पलटवार करते हुए कहा कि बत्ती छत पर नहीं, बोनट पर थी और बिना वजह मेयर को निशाना बनाया जा रहा है। यहाँ ग़ौर करने वाली बात यह है कि सत्ता पक्ष का बचाव बत्ती की क़ानूनी वैधता पर नहीं, उसकी जगह पर टिका था। मानो सवाल यह नहीं था कि बत्ती होनी चाहिए थी या नहीं, बल्कि यह था कि वह कहाँ लगाई गई थी। यह बचाव अपने आप में यह मान लेता है कि बत्ती का होना तो स्वाभाविक है।
क़ानूनी नज़रिये से शायद यह फ़र्क मायने रखता हो। पर पश्चिमी एक्सप्रेस हाईवे पर जाम में फँसे किसी आम आदमी के लिए लाल-नीली चमकती बत्ती बस वही होती है जो दिखती है।
मेयर तावड़े ने ख़ुद कहा कि उन्हें बत्ती में कोई दिलचस्पी नहीं थी और जो गाड़ी मिली वे उसी में बैठती थीं। यह भी सामने आया कि तत्कालीन मेयर विश्वनाथ महादेश्वर के कार्यकाल में यही बत्ती पहले भी हटाई जा चुकी थी। यानी नियम कभी सही से माने भी गए थे। बाद में कहीं न कहीं यह सिलसिला टूट गया।
दुनिया में कहाँ होती है ऐसी बात
क्या दूसरे बड़े लोकतंत्रों में ऐसा होता है? सीधा जवाब है नहीं। ब्रिटेन में गाड़ी पर लाल फ़्लैशिंग लाइट लगाना क़ानूनन वर्जित है। वहाँ १९८८ के रोड ट्रैफ़िक एक्ट के बाद नीला रंग सिर्फ़ आपातकालीन सेवाओं के लिए है। फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड और स्कैंडिनेवियाई देशों में भी चमकती बत्ती सख़्ती से पुलिस, दमकल और एम्बुलेंस तक सीमित है। अमेरिकी मेयरों के पास बत्ती वाली गाड़ियाँ नहीं होतीं। सीनेटरों के पास भी नहीं। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने २०१३ में ही कहा था कि जनप्रतिनिधियों की गाड़ियों पर बत्ती की यह परंपरा दुनिया के प्रमुख लोकतंत्रों में कहीं नहीं है। एक दशक से ज़्यादा बाद भी यह बात उतनी ही सच है।
उपनिवेशवाद, दरबार और भारतीय मानस
अब एक ज़रा अलग बात।
राजनीतिक मनोवैज्ञानिक आशीष नंदी ने अपनी १९८३ की किताब ‘द इंटिमेट एनिमी’ में एक अहम बात कही थी। उपनिवेशवाद सिर्फ़ ताक़त से नहीं, बल्कि लोगों की सोच को बदलकर टिका था। अंग्रेज़ चले गए, पर उनके जाने के साथ यह मानसिक ढाँचा नहीं गया। जो लोग शासित हुए, उन्होंने सत्ता की भाषा और उसके प्रतीकों को अपना लिया था। बत्ती इसी का एक हिस्सा है। वह सिर्फ़ यह नहीं बताती कि कोई ख़ास आ रहा है। वह यह भी कहती है कि कुछ लोग दूसरों से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हैं और यह फ़र्क सड़क पर भी दिखना चाहिए।
समाजशास्त्री दीपंकर गुप्ता ने ‘मिस्टेकेन मॉडर्निटी’ में एक और बात की। उनका तर्क था कि भारत की असली चुनौती तकनीकी पिछड़ापन नहीं है। समस्या नागरिकता की संस्कृति के न होने की है। गुप्ता ने मतदाता और नागरिक के बीच एक महत्त्वपूर्ण फ़र्क किया। मतदाता वोट देता है। नागरिक सवाल पूछता है, अधिकार माँगता है और यह मानता है कि सत्ता उसके प्रति जवाबदेह है। भारत की राजनीतिक व्यवस्था ने मतदाता तो बड़े पैमाने पर बनाए, लेकिन नागरिक बनाने की प्रक्रिया अधूरी रही।
बत्ती इसी अधूरेपन का एक छोटा पर ठोस प्रतीक है। फुटपाथ पर खड़ा इंसान और गाड़ी में बैठा नेता अगर क़ानून की नज़र में बराबर हैं, तो सड़क पर भी यह बराबरी दिखनी चाहिए। बत्ती इसी बराबरी को चुनौती देती है।
गुप्ता का यह भी कहना था कि राजनीतिक वर्ग को अपने मतदाताओं का नागरिक बनना रास नहीं आता। निर्भर और श्रद्धालु मतदाता ज़्यादा सुविधाजनक होता है। जो सोचता नहीं, बस देखता है और झुकता है। नेता का काफ़िला गुज़रे, लोग रुकें, रास्ता दें – यह सिलसिला उसी रिश्ते की रोज़ाना पुष्टि है।
१९७१ में प्रिवी पर्स ख़त्म हुए, रियासतें गईं। लेकिन उनके साथ जो झुककर सलाम करने की संस्कृति थी, वह नहीं गई। वह राजाओं से नेताओं की तरफ़ खिसक गई। शाही पालकी की जगह आयातित एसयूवी ने ले ली। राजसी ध्वज की जगह बत्ती ने। तरीक़ा बदला, सोच नहीं बदली।
नंदी ने यह भी लिखा था कि यह सिलसिला एकतरफ़ा नहीं है। बहुत बार आम लोग ख़ुद भी इस शक्ति प्रदर्शन में हिस्सेदार होते हैं। बत्ती वाली गाड़ी का आना, भीड़ का रास्ता देना, यह एक जाना-पहचाना लेन-देन है। इसे क़ानून से रोका जा सकता है। पर जो मानसिक भूख इसे स्वाभाविक बनाती है, वह किसी आदेश से नहीं जाती।
मुंबई का दूसरा चेहरा
यह पूरी कहानी सिर्फ़ निराशाजनक नहीं है। मुंबई एक अलग तरह का शहर भी है। यहाँ की लोकल ट्रेन में कोई किसी के लिए झुककर नहीं चलता। वार्ड का पार्षद फुटपाथ रोके तो उसकी तस्वीर घंटे भर में ऑनलाइन होती है। और यही वह शहर है जहाँ से एक सोशल मीडिया पोस्ट ने यह पूरा विवाद शुरू किया। जहाँ एक आरटीआई कार्यकर्ता ने एक बड़े संस्थान को सवाल का जवाब देने पर मजबूर किया।
बत्ती हट गई। मामला सुलझ गया।
पर जिस बेपरवाह तरीक़े से वह बत्ती लगाई गई थी, वह सोच अभी भी जस की तस है। वह किसी और रूप में फिर सामने आएगी। असली सवाल तब भी वही होगा जो आज है।
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