मुंबई का पवई इलाका — जहां हर दिन रचनात्मकता की कहानियाँ जन्म लेती हैं, वहां 30 अक्टूबर 2025 की सुबह एक ऐसा हादसा हुआ जिसने शहर की रूह तक हिला दी। आरोपी रोहित आर्या (लगभग 50 वर्ष) नागपुर मूल का था, और खुद को एक वेब‑सीरीज़ डायरेक्टरबताता था।
मौके पर मौजूद सूत्रों के अनुसार, उसने बच्चों (उम्र लगभग 13‑17 वर्ष) को आर.ए स्टूडियो, पवई में ऑडिशन के नाम पर बुलाया — यह दावा किया गया कि उन्हें नया टीवी/वेब प्रोजेक्ट मिलेगा। पर्दे के पीछे जो कारण सामने आए हैं, वे यह हैं: माता-पिता को यही लगा कि यह एक सामान्य शूट या टेस्ट होगा। लेकिन जैसे ही बच्चे स्टूडियो पहुंचे, दरवाज़े बंद कर दिए गए — और यहीं से शुरू हुआ मुंबई के दिल दहला देने वाला हाईजैक ड्रामा।
आरोपी ने वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाला और कहा कि उसकी “आवाज़ सुनी जाए”। सवाल ये उठता है — कौन सी आवाज़? क्या वह सिस्टम से नाराज़ था? या अपनी असफलता और मानसिक तनाव का बदला मासूमों से लेना चाहता था? शुरुआती जांच से यही साफ़ हुआ कि वह पिछले कुछ महीनों से अस्थिर मानसिक स्थिति में था और सोशल मीडिया पर “सिस्टम के खिलाफ न्याय” की बातें करता था। लेकिन इस ‘न्याय’ की कीमत निर्दोष बच्चों को क्यों चुकानी पड़ी?
वह किसी को बारबार कुछसंदेश देने कि बात कह रहा था। और वह सुसाइड करने वाला था, पर फिर उसने अपनी बात लोगो के सामने रखने का सोचा ओर यब गलत तरीका अपनाया। कहा जा रहा है कि वह वीडियो में उसको सरकार से ₹2 करोड़ बकाया लेना है वह बोल रहा था, जिसे वह “सिस्टम ने ग़लत तरीके से” नहीं लौटाया है, और उसने कहा कि वह “मैं आतंकी नहीं हूँ, मैं केवल बात करना चाहता हूँ” — लेकिन तभी उसने बच्चों को बंधक बनाकर अपनी बात को जोर से रखने का तरीका अपनाया।
पुलिस के लिए ये ऑपरेशन किसी टाईम बम को निष्क्रिय करने जैसा था। घंटों की बातचीत, नेगोशिएशन और आखिर में फोर्स्ड एंट्री के बाद आरोपी ढेर कर दिया गया। बच्चे सुरक्षित निकाल लिए गए — लेकिन ये ‘सुरक्षा’ शब्द अब मुंबई में कितना खोखला लगने लगा है।
क्योंकि असली सवाल यह है — जब आरोपी ने ऑडिशन का विज्ञापन दिया, क्या किसी ने उसकी जांच की? क्या स्टूडियो ने आईडी या क्रेडेंशियल वेरिफाई किए? बच्चों को बुलाने से पहले माता-पिता से अनुमति पत्र लिया गया था? या सबकुछ बस भरोसे पर चल रहा था?
इस हादसे ने साफ़ कर दिया कि आज की मुंबई, जो सुरक्षा और सतर्कता की मिसाल मानी जाती है, उसमें भी “मानवीय लापरवाही” किसी भी सुरक्षा व्यवस्था से बड़ी कमजोरी है। माता-पिता अपने बच्चों को ‘सेफ जोन’ समझकर स्टूडियो, कोचिंग या शूटिंग लोकेशन पर भेज देते हैं — लेकिन अब यह भरोसा टूट चुका है। अब पैरेंट्स को डबल-श्योर होना पड़ेगा। किसने बुलाया, कहाँ बुलाया, क्या वेरिफिकेशन है, कौन जिम्मेदार है — इन हर सवाल का जवाब लिए बिना बच्चों को बाहर भेजना सीधा रिस्क है।
यह मामला सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि हमारी समाजिक सोच पर सवाल है। हम एक ऐसे शहर में रह रहे हैं जहाँ हर तीसरा इंसान “कुछ बड़ा करने” की होड़ में है — लेकिन कुछ लोग इसी महत्वाकांक्षा के बोझ तले पागलपन की हद तक टूट रहे हैं।
वो आदमी क्या कहना चाहता था? शायद उसे लगा कि किसी ड्रामे से ही उसकी बात सुनी जाएगी। शायद उसने ध्यान खींचने के लिए सबसे आसान, लेकिन सबसे निर्दयी रास्ता चुना — बच्चों का भय।
अब सवाल सिर्फ पुलिस या सिस्टम से नहीं है। सवाल हम सब से है। कितनी बार हम किसी कॉल, ईमेल या सोशल पोस्ट पर यकीन कर लेते हैं बिना सोचे कि उसके पीछे कौन है? कितनी बार स्कूल, एक्टिंग एजेंसी या इवेंट ऑर्गनाइज़र सिर्फ भरोसे के दम पर बच्चों को भेजते हैं? और सबसे बड़ा सवाल — क्या हम अब भी सोचते हैं कि “ऐसी चीज़ें हमारे साथ नहीं होंगी”?
पवई की यह घटना हमें याद दिलाती है कि ख़तरा अब कहीं भी, किसी भी रूप में आ सकता है — और सबसे आसान निशाना वो हैं जिनके पास बचाव की ताकत नहीं, यानी हमारे बच्चे।
मुंबई फिर उठेगी, बच्चे फिर मुस्कुराएँगे, लेकिन इस बार शहर को अपने भरोसे की परिभाषा बदलनी होगी।
अब सिर्फ सुरक्षा कैमरे नहीं, बल्कि सुरक्षित मानसिकता की ज़रूरत है।
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