By: Ragini Chaubey

डिजिटल दौर के इस बढ़ते आधुनिक समय में शायद ही कोई ऐसा होगा जो कंप्यूटर का उपयोग न करता हो। कर्मचारी हों या छात्र, आज हर किसी की जिंदगी में टेक्नॉलजी का बहुत महत्व है। सुबह उठने से लेकर रात को बिस्तर पर वापस जाने तक कंप्यूटर और मोबाइल हमारे साथी जैसे बन गए हैं। कर्मचारियों को ऑफिस में काम करना हो या हमें किसी के साथ चैट करनी हो, आज ज्यादातर टायपिंग इन्हीं डिवाइसेस के जरिए होती है। हमारा काफी समय कंप्युटर या मोबाईल के सामने ही गुजरता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस कंप्युटर और फोन पर हम टायपिंग करते हैं, उसके सारे अक्षर आगे-पीछे क्यों होते हैं? इन्हें सीधा यानी A, B, C, D के क्रम में क्यों नहीं रखा गया? अगर नहीं पता है तो चलिए जानते हैं।

जब हम पहली बार कीबोर्ड देखते हैं तो शायद ही किसी के मन में यह सवाल आता है कि आखिर इसके अक्षरों को alphabet के क्रम में क्यों नहीं रखा गया। आखिर A के बाद B, फिर C और उसके बाद D रखना कितना आसान होता। ऐसा होता तो शायद छोटे बच्चों से लेकर पहली बार कंप्युटर चलाने वाले लोगों तक, सभी के लिए कीबोर्ड समझना और सीखना आसान होता। लेकिन कीबोर्ड पर ऐसा नहीं है। यहां हमारी नजर सबसे पहले Q, W, E, R, T और Y पर जाती है और इन्हीं छह अक्षरों की वजह से इस लेआउट को QWERTY नाम मिला। दिलचस्प बात यह है कि इसकी कहानी कंप्युटर के जमाने से बहुत पहले शुरू हो चुकी थी।

आज हम कीबोर्ड पर किसी की को दबाते हैं और स्क्रीन पर तुरंत अक्षर दिखाई देता है। लेकिन 19वीं सदी में टायपिंग का तरीका बिल्कुल अलग था। उस समय मकैनिकल टाइप्राइटर का इस्तेमाल किया जाता था। इन मशीनों में हर की के पीछे एक मकैनिकल मेकनिज़म और मेटल टाइप बार होता था। जब कोई की दबाई जाती थी तो उससे जुड़ा टाइप बार ऊपर उठता और स्याही वाली पट्टी से टकराकर कागज पर उस अक्षर की छाप छोड़ देता। यानी आज के कीबोर्ड की तरह उस समय कोई स्क्रीन नहीं होती थी और न ही किसी अक्षर को तुरंत मिटाने की सुविधा। हर शब्द सीधे कागज पर उतरता था।

यहीं से कीबोर्ड पर अक्षरों की कहानी शुरू होती है। शुरुआती टाइपराइटरों में कीबोर्ड की बनावट को लेकर कई तरह के प्रयोग किए गए। क्रिस्टोफर लैथम शोल्स और उनके सहयोगियों ने जिस अक्षर-विन्यास को विकसित किया, वह आगे चलकर QWERTY के नाम से जाना गया। हालांकि यह मान लेना सही नहीं होगा कि एक दिन अचानक किसी ने बैठकर QWERTY का पूरा विन्यास तैयार कर दिया और वही हमेशा के लिए मानक बन गया। इसके पीछे कई बदलाव और प्रयोग हुए थे। उस समय टाइपराइटर की यांत्रिक बनावट को ध्यान में रखना भी जरूरी था, क्योंकि मशीन के अंदर मौजूद धातु की छड़ें तेजी से टाइप किए जाने पर कुछ परिस्थितियों में एक-दूसरे से टकरा सकती थीं या उलझ सकती थीं।

यहीं QWERTY को लेकर एक बहुत लोकप्रिय कहानी भी सामने आती है। अक्सर कहा जाता है कि कीबोर्ड को जानबूझकर इस तरह बनाया गया था ताकि टाइपिंग धीमी हो जाए और टाइपराइटर की कुंजियां आपस में न फंसें। लेकिन इसे पूरी तरह सच मानना सही नहीं है। QWERTY के विकास की कहानी इससे कहीं ज्यादा जटिल है। अक्षरों की व्यवस्था में बदलाव के पीछे मशीन से जुड़ी समस्याओं को कम करने के साथ-साथ टाइपिंग को सुविधाजनक बनाने और उस समय की व्यावहारिक जरूरतों जैसे कई कारण शामिल थे। इसलिए यह कहना कि QWERTY का एकमात्र उद्देश्य लोगों को धीमा टाइप करवाना था, इतिहास को बहुत ज्यादा सरल बना देना होगा।

अब सवाल यह है कि अगर QWERTY यांत्रिक टाइपराइटर की जरूरतों के दौर में विकसित हुआ था, तो आज कंप्यूटर और स्मार्टफोन में भी वही व्यवस्था क्यों मौजूद है? आखिर आज हमारे कीबोर्ड में वे धातु की छड़ें नहीं होतीं। हम किसी कुंजी को दबाते हैं और सॉफ्टवेयर उस अक्षर को तुरंत स्क्रीन पर दिखा देता है। फिर भी QWERTY क्यों नहीं बदला?

इसका जवाब काफी हद तक हमारी आदत और मानकीकरण में छिपा है। जैसे-जैसे टाइपराइटर का इस्तेमाल बढ़ा, QWERTY की अक्षर व्यवस्था भी ज्यादा लोगों तक पहुंचती गई। लोग इसी व्यवस्था पर टाइपिंग सीखने लगे। टाइपिंग की कक्षाएं और प्रशिक्षण भी इसी विन्यास के आधार पर होने लगे। निर्माताओं ने भी ऐसे कीबोर्ड बनाए, जिनसे लोग पहले से परिचित थे। धीरे-धीरे एक ऐसी पूरी व्यवस्था तैयार हो गई, जिसमें कीबोर्ड को बदलना सिर्फ अक्षरों की जगह बदलने जितना आसान नहीं रह गया।

इसे एक छोटे उदाहरण से समझिए। अगर आज अचानक आपके सामने ऐसा कीबोर्ड रख दिया जाए, जिसमें Q की जगह A हो, W की जगह B और बाकी सभी अक्षर भी पूरी तरह अलग जगह पर हों, तो क्या आप उसी गति से टाइप कर पाएंगे? शायद नहीं। आपको दोबारा कीबोर्ड सीखना पड़ेगा। यही समस्या बड़े स्तर पर भी लागू होती है। जब करोड़ों लोग एक ही अक्षर-विन्यास के आदी हो चुके हों, स्कूलों और कार्यालयों में उसी पर प्रशिक्षण दिया जा रहा हो और निर्माता भी उसी मानक के अनुसार कीबोर्ड बना रहे हों, तो पूरी व्यवस्था को बदलना आसान नहीं होता।

इसी वजह से कंप्यूटर के आने के बाद भी QWERTY कीबोर्ड बना रहा। फिर लैपटॉप आए, स्मार्टफोन आए, टैबलेट आए और छूकर चलने वाले कीबोर्ड ने भौतिक कुंजियों की जरूरत तक काफी हद तक खत्म कर दी। लेकिन स्क्रीन पर दिखाई देने वाला कीबोर्ड भी अक्सर वही QWERTY अक्षर-विन्यास अपनाता है। यानी तकनीक बदलती गई, उपकरण बदलते गए, टाइपिंग का तरीका बदलता गया, लेकिन कीबोर्ड की परिचित व्यवस्था हमारे साथ बनी रही।

इस पूरी कहानी की सबसे दिलचस्प बात यही है कि आज हम जिस कीबोर्ड को बेहद सामान्य समझते हैं, वह असल में तकनीक के इतिहास की एक पुरानी विरासत है। हम हर दिन QWERTY कीबोर्ड का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन शायद ही कभी सोचते हैं कि इसकी शुरुआत उस दौर में हुई थी, जब कंप्यूटर नाम की चीज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा तो दूर, आम कल्पना का भी हिस्सा नहीं थी।

तो अगली बार जब आप लैपटॉप पर कोई ई-मेल लिखें, स्मार्टफोन पर संदेश भेजें या किसी दस्तावेज में टाइपिंग करें, एक पल के लिए कीबोर्ड पर नजर जरूर डालिएगा। Q, W, E, R, T, Y सिर्फ छह बेतरतीब अक्षर नहीं हैं। इनके पीछे 19वीं सदी के यांत्रिक टाइपराइटर, बदलती तकनीक, कई प्रयोग और इंसानी आदत की एक लंबी कहानी छिपी है। और शायद यही वजह है कि करीब डेढ़ सौ साल पुराना यह कीबोर्ड विन्यास आज भी हमारी डिजिटल जिंदगी का हिस्सा बना हुआ है।

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