राम वनजी सुतार का जन्म 19 फ़रवरी 1925 को महाराष्ट्र के धुले ज़िले के गोंडूर गाँव में हुआ था। परिवार साधारण था। पिता बढ़ई का काम करते थे। लकड़ी, औज़ार और हाथों से आकार देने की प्रक्रिया उनके बचपन का हिस्सा थी। तब किसी ने नहीं सोचा था कि यही बच्चा एक दिन दुनिया की सबसे ऊँची प्रतिमा का स्वरूप तय करेगा।
उनकी प्रतिभा को दिशा मिली मुंबई के जे. जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट में। यहाँ उन्होंने मूर्तिकला की औपचारिक शिक्षा ली और उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए स्वर्ण पदक प्राप्त किया। यह केवल तकनीक सीखने का समय नहीं था, बल्कि यह समझने का दौर था कि कला समाज से कैसे संवाद करती है। भारत स्वतंत्रता की ओर बढ़ रहा था और कला भी अपनी पहचान खोज रही थी।
शिक्षा पूरी करने के बाद राम सुतार ने कुछ समय तक सरकारी सेवा में काम किया, लेकिन उनका मन सीमित दायरों में नहीं टिकता था। उन्होंने सार्वजनिक मूर्तिकला को अपना जीवनकार्य बनाया। धीरे धीरे उनकी पहचान एक ऐसे कलाकार के रूप में बनी जो व्यक्तित्व को गरिमा और यथार्थ के साथ प्रस्तुत कर सकता था। उनकी मूर्तियाँ न तो अतिनाटकीय थीं और न ही निर्जीव। वे स्थिर होकर भी संवाद करती थीं।
राम सुतार का सबसे चर्चित कार्य सरदार वल्लभभाई पटेल की स्टैच्यू ऑफ यूनिटी है, जिसकी ऊँचाई 182 मीटर है। यह विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा है। इसका डिज़ाइन राम सुतार ने तैयार किया और निर्माण की पूरी प्रक्रिया में वे सक्रिय रूप से जुड़े रहे। यह केवल ऊँचाई का रिकॉर्ड नहीं था, बल्कि तकनीकी संतुलन, ऐतिहासिक समझ और धैर्य की परीक्षा थी।
इसके अलावा उन्होंने महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव आंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, सुभाष चंद्र बोस और छत्रपति शिवाजी महाराज सहित अनेक ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की प्रतिमाएँ बनाईं। भारत और विदेशों में स्थापित ये मूर्तियाँ आज भी सार्वजनिक स्थलों पर इतिहास को जीवित रखती हैं।
राम सुतार का मानना था कि मूर्ति केवल चेहरे की प्रतिकृति नहीं होती। वह व्यक्ति के विचार, संघर्ष और समय की व्याख्या होती है। किसी भी प्रतिमा पर काम शुरू करने से पहले वे उस व्यक्तित्व के जीवन, लेखन और वैचारिक पृष्ठभूमि का गहन अध्ययन करते थे। वे आधुनिक तकनीक के समर्थक थे, लेकिन परंपरा और अनुशासन से कभी समझौता नहीं किया।
उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक सम्मान मिला। उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण और बाद में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। ये पुरस्कार केवल व्यक्तिगत उपलब्धियाँ नहीं थे, बल्कि भारतीय सार्वजनिक कला की स्वीकार्यता का प्रमाण थे।
राम सुतार का निजी जीवन अत्यंत सादा था। वे प्रसिद्धि और प्रचार से दूरी बनाए रखते थे। उनके पुत्र अनिल सुतार भी मूर्तिकार हैं और बड़े सार्वजनिक स्मारकों के क्षेत्र में सक्रिय हैं। यह विरासत केवल नाम की नहीं, बल्कि दृष्टि और जिम्मेदारी की भी है।
राम सुतार का निधन 17 दिसंबर 2023 को हुआ। लगभग एक शताब्दी लंबे जीवन में वे अंत तक सक्रिय और रचनात्मक बने रहे। उनके जाने से भारत ने केवल एक कलाकार नहीं खोया, बल्कि उस व्यक्ति को खोया जिसने राष्ट्र की आत्मा को दृश्य रूप दिया।
राम सुतार का जीवन यह साबित करता है कि सच्ची कला शोर नहीं मचाती। वह स्थिर खड़ी होकर लोगों को सोचने पर मजबूर करती है। उनकी बनाई मूर्तियाँ आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाती रहेंगी कि राष्ट्र केवल शब्दों से नहीं बनता। उसे आकार भी देना पड़ता है। और कुछ लोग अपने हाथों से वह काम पूरी निष्ठा से करते हैं।
Subscribe Deshwale on YouTube


