दो लड़के, एक सरहद
मिरपुर के पास किसी गाँव का एक बाईस साल का लड़का था। उसके पिता मक्का उगाते थे। घर में दो बकरियाँ थीं। उसने कभी पासपोर्ट नहीं देखा था। जिस सरहद पर उसे अपनी जान देने को भेजा गया था, वह सरहद उसने नहीं खींची थी।
सरहद के उस पार एक और लड़का था। तेईस साल का। मथुरा के किसी किसान घर का बेटा। उसकी भी एक माँ थी। उस पर भी कर्ज़ था। उसकी बहन की शादी भी रुकी पड़ी थी।
इन दोनों ने यह सरहद नहीं खींची थी। इन दोनों ने यह नहीं चुना था। इन दोनों को इससे कोई फ़ायदा नहीं होने वाला था।
पर किसी और को फ़ायदा था। और वे कहीं और बैठे थे।
सबसे पुराना कारोबार
बात थोड़ी पीछे जानी चाहिए। क्योंकि जो हिंदुस्तान में होता है, वह कोई अलग कहानी नहीं है। यह एक पुरानी और वैश्विक कहानी का भारतीय अध्याय है।
सन् १८१५ में, जब वाटरलू की लड़ाई लड़ी जा रही थी, एक लंदनी सौदागर पहले ही अपनी पूँजी को सही जगह लगा चुका था। उसके संदेशवाहकों का नेटवर्क इतना मज़बूत था कि लड़ाई का नतीजा ब्रिटिश सरकार से पहले उसे पता चल गया। इतिहासकार नियाल फ़र्ग्युसन ने अपने दस्तावेज़ी अध्ययन में यह दर्ज किया है कि रोथ्सचाइल्ड परिवार ने नेपोलियन के युद्धों में दोनों तरफ़ पैसा लगाया था। किसी विचारधारा के लिए नहीं, सिर्फ़ गणित के लिए। जब आप क़र्ज़ देने वाले हों तो युद्ध में हार-जीत से फ़र्क़ नहीं पड़ता। हारने वाले को भी चुकाना होता है। जीतने वाला पुनर्निर्माण के लिए उधार लेता है।
सन् १९३४ में अमेरिकी सीनेट की एक जाँच समिति बैठी जिसे न्यी कमेटी कहा जाता है। इसने पहले विश्वयुद्ध में हथियार निर्माताओं और बैंकरों की भूमिका की पड़ताल की। जे. पी. मॉर्गन ने ब्रिटेन के एकमात्र क्रय-एजेंट के रूप में लगभग तीन अरब डॉलर के युद्ध अनुबंध संसाधित किए थे। इस समिति ने अपनी आधिकारिक रिपोर्ट में बड़े हथियार निर्माताओं को “मौत के सौदागर” कहा। यह कोई क्रांतिकारियों की भाषा नहीं थी। यह उन अमेरिकी सीनेटरों की भाषा थी जो बही-खाते पढ़ रहे थे।
पहले विश्वयुद्ध की एक बात इतिहास की किताबों में कम आती है। जर्मनी के कैसर विल्हेम द्वितीय, रूस के ज़ार निकोलस द्वितीय और ब्रिटेन के किंग जॉर्ज पंचम, तीनों एक-दूसरे के चचेरे भाई थे। महारानी विक्टोरिया के पोते। तीनों ने अपनी सेनाओं को मोर्चे पर उतारा और आपस में चिट्ठियाँ लिखते रहे। उन चिट्ठियों के बीच की दूरी में दो करोड़ लोग मारे गए।
दूसरे विश्वयुद्ध में भी बैंक ऑफ़ इंटरनेशनल सेटलमेंट्स ने मित्र-पक्ष और धुरी-पक्ष दोनों के बैंकों के लेनदेन संसाधित किए। पत्रकार एडम लेबॉर ने इस संस्था की जाँच में यह दर्ज किया। वह युद्ध जिसमें छह करोड़ लोग मारे गए, अंतरराष्ट्रीय वित्त की मशीनरी उसमें भी बेरोकटोक चलती रही।
अमेरिका के जनरल स्मेडली बटलर को दो बार सर्वोच्च सैन्य सम्मान मिला था। तैंतीस साल की फ़ौजी सेवा। सन् १९३५ में उन्होंने एक छोटी किताब लिखी जिसका नाम था “वॉर इज़ ए रैकेट।” उन्होंने लिखा कि वे पूँजीवाद के गुंडे रहे। वे हाशिये की आवाज़ नहीं थे। वे उस दौर के सबसे सम्मानित अमेरिकी सैनिक थे। बस उन्हें बहुत कम उद्धृत किया जाता है।
यह सब कोई साजिश नहीं है। इसके लिए गुप्त बैठकों की ज़रूरत नहीं। यह एक ढाँचा है जो खुद-ब-खुद चलता है। युद्ध के लिए हथियार चाहिए। हथियारों के लिए पूँजी चाहिए। पूँजी को लाभ चाहिए। लाभ के लिए अगला ख़तरा चाहिए। अगले ख़तरे के लिए अगला युद्ध चाहिए।
वह घाव जो कभी भरना नहीं था
१७ अगस्त १९४७ को, यानी आज़ादी के एक दिन बाद, रेडक्लिफ़ अवार्ड प्रकाशित हुआ। भारत और पाकिस्तान की सरहदें घोषित हुईं। सर सायरिल रेडक्लिफ़ एक लंदनी बैरिस्टर थे। वे जुलाई में भारत आए थे और अपनी खींची हुई लकीरें सार्वजनिक होने से पहले ही चले गए। कहा जाता है कि वे उस नक़्शे के नतीजे देखना नहीं चाहते थे।
इतिहासकारों में इस बात पर बहस है कि रेडक्लिफ़ लाइन किस इरादे से बनी। आयेशा जलाल जैसी विद्वानों ने तर्क दिया है कि पाकिस्तान की परिकल्पना एक सौदेबाज़ी के मोहरे के रूप में हुई जो बाद में एक राज्य बन गई। पैट्रिक फ्रेंच ने उस प्रक्रिया की प्रशासनिक अफ़रातफ़री को दस्तावेज़ी रूप दिया है। जो बात विवादित नहीं है वह यह है कि कश्मीर को एक खुले सवाल के रूप में छोड़ दिया गया। हिंदू राजा, मुस्लिम बहुल आबादी और एक ऐसी विलय-प्रक्रिया जो आज तक नहीं सुलझी। हथियार बेचने वालों की नज़र से देखें तो यह एक ऐसा अनुबंध था जो हर कुछ बरसों में नवीनीकृत होता रहा।
उसके बाद के युद्धों की हथियार-आपूर्ति एक स्पष्ट कहानी कहती है। सन् १९४७-४८ में दोनों पक्ष ब्रिटिश अनुबंधों के तहत बने हथियारों से लड़े। सन् १९६५ तक यह वैश्विक हो गया था। अमेरिका ने सेंटो और सीटो गठबंधन के ढाँचे में पाकिस्तान को हथियार दिए। सोवियत संघ ने भारत के साथ अपना सैन्य संबंध गहरा किया। दोनों महाशक्तियाँ, आपस में वैचारिक लड़ाई लड़ते हुए, उपमहाद्वीप को हथियारों की परीक्षण भूमि के रूप में इस्तेमाल कर रही थीं।
सन् १९७१ का युद्ध बांग्लादेश के जन्म के साथ समाप्त हुआ। इस दौरान निक्सन प्रशासन ने पाकिस्तान का साथ दिया। यह सहानुभूति के कारण नहीं था। गोपनीयमुक्त दस्तावेज़ों और हेनरी किसिंजर के स्वयं के संस्मरणों से साफ़ है कि वाशिंगटन ने यह क़दम चीन के साथ संपर्क का रास्ता खोलने के लिए उठाया था। पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के आचरण से वाशिंगटन को कोई सरोकार नहीं था। उपमहाद्वीप उस शतरंज में एक मोहरा भर था, कोई आबादी नहीं जिसे बचाना हो।
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी एसआईपीआरआई का आर्म्स ट्रांसफ़र डेटाबेस सार्वजनिक रूप से खोजा जा सकता है। कोई भी इसमें जाकर यह देख सकता है कि सन् १९४७ से अब तक हर दशक में भारत और पाकिस्तान को कौन से हथियार किसने दिए। संघर्ष के वर्षों के बाद ख़रीद में उछाल आता है। हर तनाव एक नई ऑर्डर बुक खोलता है। यह आँकड़ा किसी का अनुमान नहीं है। यह दर्ज इतिहास है।
सन् १९६२ और उसकी असली क़ीमत
यहाँ थोड़ा रुकना ज़रूरी है। अक्टूबर १९६२ में चीनी सेनाएँ हिमालय की सीमा से आगे बढ़ीं। स्वतंत्र भारत की सबसे शर्मनाक सैन्य हार हुई। एक महीने की लड़ाई के बाद चीन ने उस ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लिया जिसे भारत अपना मानता था। भारतीय सेना ऊँचाई पर बुरी तरह असज्जित थी। ख़ुफ़िया चेतावनियाँ आई थीं पर उन पर ध्यान नहीं दिया गया था।
उसके बाद जो हुआ वह आँकड़ों में साफ़ दिखता है। बत्तीस दिन की लड़ाई ने एक पीढ़ी लंबे हथियार-ख़रीद के चक्र को जन्म दिया। सोवियत संघ ने भारत के साथ अपने सैन्य संबंध को इस तरह गहरा किया जो अगले चार दशकों तक भारत की रक्षा-ख़रीद को परिभाषित करता रहा।
वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी एक संधि-सीमा नहीं है। यह वह लकीर है जिस पर दोनों पक्ष गश्त लगाते हैं, कभी-कभी टकराते हैं और जिसे कभी औपचारिक रूप से तय नहीं किया गया। रणनीतिक साहित्य में इसे “फ्रोज़न कॉन्फ्लिक्ट” कहते हैं। यह न पूरी तरह पिघलकर युद्ध बनता है, न जमकर शांति। बस इतना गर्म रहता है कि रक्षा बजट पर सवाल न उठे।
जून २०२० में गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हाथापाई हुई। लद्दाख में चौदह हज़ार फ़ीट की ऊँचाई पर। बीस भारतीय जवान शहीद हुए। चीन ने फ़रवरी २०२१ में आधिकारिक तौर पर चार मौतें स्वीकार कीं। बाहरी आकलनों में यह संख्या काफ़ी अधिक बताई गई पर बीजिंग ने अपना आँकड़ा कभी नहीं बदला। और इस झड़प के कुछ महीनों के भीतर भारत ने लड़ाकू विमान, तोपख़ाना और गोला-बारूद की आपातकालीन ख़रीद मंज़ूर कर ली।
फ़रवरी २०२१ में भारत सरकार ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ ४८,००० करोड़ रुपये का अनुबंध किया। ८३ एलसीए तेजस Mk1A लड़ाकू विमानों के लिए। यह उस समय भारत के इतिहास का सबसे बड़ा रक्षा अनुबंध था। रक्षा मंत्रालय के दस्तावेज़ों में इसे सीधे गलवान की सीख से जोड़ा गया। जून की झड़प फ़रवरी तक ४८,००० करोड़ का घरेलू आदेश बन चुकी थी। यह नीति की आलोचना नहीं है। यह बस इतना है कि यह व्यवस्था काम कैसे करती है।
जो कंपनियाँ भारतीय सेना को साजो-सामान देती हैं उनके नाम सार्वजनिक हैं। दसॉ एविएशन ने राफ़ेल जेट दिए। रूस के रोसोबोरोनएक्सपोर्ट ने एस-४०० मिसाइल प्रणाली का अनुबंध जीता। लॉकहीड मार्टिन और बोइंग परिवहन विमान और हेलीकॉप्टर देते हैं। एमबीडीए मिसाइलें देती है। ये सब क़ानूनी दायरे में काम करने वाली कंपनियाँ हैं। इन पर कोई आरोप नहीं है। लेकिन ढाँचागत सच्चाई यह है कि एलएसी पर हर झड़प इन कंपनियों के लिए भू-राजनीतिक भाषा में लिखा हुआ उत्पाद-विज्ञापन भी होती है।
भारतीय बोर्डरूम और बॉर्डर
आज़ादी के बाद से भारत में रक्षा क्षेत्र सरकारी उपक्रमों का इलाक़ा था। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड, डीआरडीओ और आयुध निर्माणी बोर्ड। निजी पूँजी को इस कारोबार से दूर रखा गया था। यह बदलना शुरू हुआ सन् २०१६ की रक्षा प्रापण प्रक्रिया से और सन् २०२० की रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया के साथ यह बदलाव और तेज़ हो गया। आत्मनिर्भर भारत के ढाँचे में निजी क्षेत्र के लिए दरवाज़े खुले।
नीतिगत तर्क ठोस है। भारत दशकों से दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातकों में रहा है। घरेलू रक्षा उत्पादन आधार बनाना इस निर्भरता को कम करता है। टाटा समूह, लार्सेन एंड टुब्रो, महिंद्रा डिफ़ेंस और अडाणी डिफ़ेंस एंड एयरोस्पेस जैसे बड़े निजी समूह इस क्षेत्र में आ चुके हैं। उनके अनुबंध सरकारी रिकॉर्ड में हैं।
पर अब पहली बार एक ऐसा घरेलू वर्ग बन रहा है जिसका वित्तीय हित सतत रक्षा ख़र्च में है। और सतत रक्षा ख़र्च के लिए सतत ख़तरे का माहौल चाहिए।
लोकतंत्रों में एक पैटर्न दर्ज है, और वह अमेरिका में सबसे अधिक दिखता है, पर ब्रिटेन और फ्रांस में भी मौजूद है और अब भारत में भी दिखने लगा है। सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी और वरिष्ठ रक्षा अफ़सरशाह रक्षा कंपनियों के सलाहकार मंडलों में जाते हैं। यह अधिकतर मामलों में पूरी तरह क़ानूनी है। पर इससे एक ऐसा वर्ग बनता है जिसकी सेवानिवृत्ति के बाद की आय रक्षा क्षेत्र की सेहत से जुड़ी होती है। यही लोग मीडिया और सरकार को सुरक्षा-वातावरण और सरहदी नीतियों पर राय देते हैं।
भारत-बांग्लादेश की बात भी यहाँ ज़रूरी है। दोनों देशों के बीच लगभग ४,२०० किलोमीटर लंबी सरहद है। यह दुनिया की पाँचवीं सबसे लंबी ज़मीनी सीमा है। यहाँ वर्षों से बाड़-निर्माण परियोजना चल रही है। संसदीय प्रश्नों और सरकारी टेंडर पोर्टल के रिकॉर्ड बताते हैं कि दो दशकों में इस परियोजना से हज़ारों करोड़ रुपये के अनुबंध हुए हैं। इतने निर्माण के बाद भी सीमा के कई हिस्से आज भी पारगम्य हैं। और अनुबंध नवीनीकृत होते रहते हैं। यह संयोग नहीं है, यह व्यवस्था है।
सियाचिन का हिसाब
सियाचिन ग्लेशियर दुनिया का सबसे ऊँचा युद्धक्षेत्र है। सन् १९८४ से भारत और पाकिस्तान के जवान वहाँ एक-दूसरे के सामने तैनात हैं। चार दशक हो गए। इंसानी ज़िंदगी के काम का कोई भूभाग हाथ नहीं बदला। वहाँ तैनाती का ख़र्च संसदीय प्रश्नों और रक्षा विश्लेषणों के हवाले से प्रतिदिन कई करोड़ रुपये बताया गया है। पाकिस्तान का ख़र्च भी इसी के आसपास है। कई जवान दुश्मन की गोली से नहीं, बर्फ़ीले तूफ़ान, हिमस्खलन और ऊँचाई की बीमारी से मारे गए।
सियाचिन पर ख़र्च होने वाला एक-एक रुपया बिहार के किसी प्राथमिक स्कूल से, विदर्भ के किसी अस्पताल से या राजस्थान के किसी गाँव की जल-व्यवस्था से लिया गया रुपया है। यह सेना-विरोधी तर्क नहीं है। यह सिर्फ़ गणित है।
भारतीय सेना में भर्ती का बोझ ख़ास इलाक़ों और ख़ास वर्गों पर है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, बिहार और उत्तराखंड के खेतिहर इलाक़े। ये उद्योगपतियों के बच्चे नहीं हैं। ये किसानों के, दिहाड़ी मज़दूरों के, उन परिवारों के बच्चे हैं जिनके लिए फ़ौज की पेंशन पूरक नहीं, बल्कि आजीविका है। जब कोई जवान एलएसी या एलओसी पर शहीद होता है, तिरंगे में लिपटा ताबूत जिस घर जाता है वह घर इस झटके को आर्थिक रूप से झेलने की स्थिति में नहीं होता।
पाकिस्तान की तरफ़ भी तस्वीर एकदम वैसी ही है। पाकिस्तानी सेना पंजाब और ख़ैबर-पख़्तूनख़्वा से भर्ती करती है, ऐसे परिवारों से जिनकी आर्थिक पृष्ठभूमि एक जैसी है। एसआईपीआरआई के आँकड़ों के अनुसार पाकिस्तान के रक्षा बजट की वजह से शिक्षा और स्वास्थ्य वर्षों से कुपोषित रहे हैं। मिरपुर का लड़का और मथुरा का लड़का असल में एक ही लड़का है जिसे एक ऐसी लकीर ने बाँट दिया जो उसने नहीं खींची थी।
तनाव जिसका बिल आम आदमी भरता है
कारगिल सन् १९९९ में हुआ। संसद पर हमले के बाद सन् २००१ में गतिरोध हुआ। पुलवामा के बाद सन् २०१९ में तनाव बढ़ा। हर बड़े भारत-पाकिस्तान टकराव के साथ वस्तुओं के दाम बढ़े, शेयर बाज़ार डगमगाए और सीमा-पार व्यापार सिकुड़ा। इस बिल का सबसे बड़ा हिस्सा छोटे व्यापारियों और किसान परिवारों ने चुकाया। अमृतसर और लाहौर के वे व्यापारी जो एक भाषा बोलते हैं, एक-सी रसोई बनाते हैं और एक इतिहास साझा करते हैं, वे उन राजधानियों में बने तनाव की क़ीमत चुकाते हैं जहाँ वे कभी गए भी नहीं।
शांति जो टिक नहीं पाई
फ़रवरी १९९९ में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बस से लाहौर गए। लाहौर घोषणापत्र पर दस्तख़त हुए। दोनों सरकारों ने बातचीत की प्रतिबद्धता जताई। कुछ महीनों के भीतर पाकिस्तानी बलों की कारगिल में घुसपैठ पकड़ी गई।
जुलाई २००१ में प्रधानमंत्री वाजपेयी और राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ की आगरा वार्ता बिना किसी नतीजे के समाप्त हुई। सन् २००४ से २००८ के बीच समग्र वार्ता प्रक्रिया चली। व्यापार और आपसी संपर्क में कुछ प्रगति हुई। नवंबर २००८ में मुंबई हमलों के बाद यह प्रक्रिया स्थगित हो गई और दोबारा उस रूप में शुरू नहीं हो सकी।
हर बार जब शांति का कोई रास्ता खुलता दिखा, कोई घटना उसे बंद कर गई। इसका कोई एक स्पष्टीकरण नहीं है। यह लेख यह भी नहीं कहता कि शांति जान-बूझकर तोड़ी जाती है। पर यह सवाल ज़रूर बनता है कि जब संघर्ष के आर्थिक फ़ायदे मुट्ठीभर लोगों के पास जाते हों और क़ीमत करोड़ों लोग चुकाते हों, तो जिनके हाथ में असली ताक़त है उन्हें संघर्ष ख़त्म होने से आख़िर मिलता क्या है? यह असुविधाजनक सवाल है। पर है ज़रूरी।
मीडिया और युद्ध का बाज़ार
बालाकोट हवाई हमले फ़रवरी २०१९ में हुए। उसके बाद भारतीय न्यूज़ चैनलों की टीआरपी उन वर्षों की सबसे ऊँची रही। बीएआरसी इंडिया के रेटिंग आँकड़े यह दर्ज करते हैं। स्टूडियो में सेवानिवृत्त जनरल बैठे और ग्राफ़िक्स चमकते रहे। दक्षिण एशियाई संघर्ष-टेलीविज़न का व्यापार-मॉडल ख़तरे की मुद्रास्फ़ीति पर टिका है। शांत सरहद बुरी टीआरपी है। पाकिस्तानी मीडिया का भी यही हाल है। दोनों तरफ़ स्टूडियो एक जैसे हैं, बस चैनलों के नाम और झंडों के रंग अलग-अलग हैं।
अकादमिक साहित्य में एक अवधारणा है जिसे “सुरक्षा दुविधा” कहते हैं। जब एक राज्य रक्षात्मक उद्देश्य से हथियार बनाता है, पड़ोसी राज्य उसे आक्रामक ख़तरा मानकर हथियार बनाता है। पहला राज्य देखकर और हथियार बनाता है। कोई युद्ध नहीं चाहता। दोनों तरफ़ बजट बढ़ते जाते हैं। इस दुविधा का एक उपोत्पाद यह है कि जनता को ख़तरे के चक्र में सोचने की आदत पड़ जाती है। वह यह पूछती है कि किस पक्ष ने पहले उकसाया। वह यह नहीं पूछती कि जब दोनों पक्ष हथियार ख़रीदते रहते हैं तो फ़ायदा किसका होता है। वह रक्षा बजट नहीं पढ़ती। और ऐसी जनता कुछ ख़ास हितों के लिए बेहद उपयोगी होती है।
दो लड़के, एक सवाल
मिरपुर का लड़का और मथुरा का लड़का काल्पनिक नहीं हैं। वे मिश्रित चरित्र हैं पर असली हैं। वे उन सभी नौजवानों का सांख्यिकीय औसत हैं जो सतहत्तर सालों में इस सरहद पर खड़े रहे। उनके नतीजे विकलांगता-पेंशन की फ़ाइलों में दर्ज हैं। उन मानसिक आघात के मामलों में दर्ज हैं जो कभी नाम नहीं पा सके क्योंकि किसी भी सेना के पास उन्हें स्वीकार करने का बुनियादी ढाँचा नहीं था। उन परिवारों के कर्ज़ के खातों में दर्ज हैं जिन्होंने जनाज़े का ख़र्च उधार लेकर उठाया।
जिन्होंने उन हथियारों के लिए पूँजी लगाई, जो रक्षा बजटों की पैरवी करते रहे, जो उन कंपनियों के बोर्ड में बैठे जिन्होंने निगरानी के बुर्ज, बाड़ और लड़ाकू जेट बनाए, उनके नतीजे तिमाही आय रिपोर्टों में हैं। शेयर मूल्य के ग्राफ़ों में हैं। पूँजी के उस तर्क में हैं जिसकी न कोई राष्ट्रीयता है, न कोई शोक।
युद्धों के नाम हैं। तारीख़ें हैं। स्मारक हैं। शहीद हैं। राष्ट्रीय अवकाश हैं।
पर सतहत्तर सालों में, तमाम लाशों और तमाम सरहदों के बाद, एक सवाल का ईमानदार जवाब नहीं मिला।
वह सवाल जो एक मृत सैनिक की माँ ने पूछा था।
मेरा बेटा किसके लिए गया?
यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है जिनमें अमेरिकी सीनेट की न्यी कमेटी के सन् १९३४ के रिकॉर्ड, स्मेडली बटलर की “वॉर इज़ ए रैकेट” (सन् १९३५), एसआईपीआरआई आर्म्स ट्रांसफ़र डेटाबेस, भारत की रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (सन् २०२०), एलसीए तेजस Mk1A अनुबंध (फ़रवरी २०२१) पर रक्षा मंत्रालय के दस्तावेज़, बीएआरसी इंडिया के व्यूअरशिप आँकड़े, सियाचिन परिचालन लागत पर संसदीय प्रश्न, नियाल फ़र्ग्युसन की “द हाउस ऑफ़ रोथ्सचाइल्ड”, एडम लेबॉर की “टॉवर ऑफ़ बासेल”, आयेशा जलाल की “द सोल स्पोकसमैन”, पैट्रिक फ्रेंच की “लिबर्टी ऑर डेथ”, हेनरी किसिंजर के संस्मरण और अमेरिकी राष्ट्रीय अभिलेखागार में रखी गोपनीयमुक्त निक्सन-युग की केबलें शामिल हैं।
Subscribe Deshwale on YouTube


