अगले हफ्ते महाराष्ट्र राज्य सड़क परिवहन निगम ‘राजमाता जिजाऊ’ ब्रांड के तहत ५० अत्याधुनिक बसों को हरी झंडी दिखाने जा रहा है। ये बसें पैनिक बटन और लाइव ट्रैकिंग जैसी सुविधाओं से लैस हैं। लेकिन क्या यह केवल एक दिखावा है या ग्रामीण महाराष्ट्र की लाइफलाइन बन चुकी इस व्यवस्था में असल बदलाव की शुरुआत? आइए जानते हैं कि यह नया प्रयोग आम मुसाफिरों की जिंदगी कितनी बदलेगा।
लाल परी के नाम से मशहूर एसटी बस दशकों से महाराष्ट्र के गाँवों की धड़कन रही है। विदर्भ के सुदूर अंचलों से लेकर कोंकण की वादियों तक यह बस केवल एक वाहन नहीं बल्कि लोगों की जरूरत है। एसटी का मतलब है ‘स्टेट ट्रांसपोर्ट’ लेकिन आम आदमी के लिए यह उम्मीद का दूसरा नाम है। पिछले काफी समय से इन बसों की हालत खस्ता थी और मुसाफिरों को सुरक्षा की चिंता सताती थी। अब सरकार इसे बदलने की कोशिश कर रही है। अगले हफ्ते से ५० नई बसें सड़कों पर दौड़ेंगी जिनमें सुरक्षा के लिए खास तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। यह सिर्फ रंग-रोगन का काम नहीं है बल्कि आम आदमी के सफर को गरिमा देने की एक कोशिश है।
महिलाओं की सुरक्षा के लिए खास इंतजाम
इन नई बसों को बनाने के पीछे सबसे बड़ा मकसद महिलाओं को सुरक्षित महसूस कराना है। लंबी दूरी के रास्तों पर अक्सर महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस करती थीं। अब हर बस में पैनिक बटन लगाए गए हैं। अगर किसी महिला को कोई परेशानी महसूस होती है तो वह बटन दबाकर सीधे ड्राइवर और कंट्रोल रूम को खबर कर सकती है। पुराने समय में शोर-शराबे वाली बस में चिल्लाकर मदद माँगना मुश्किल होता था लेकिन अब तकनीक खामोशी से अपना काम करेगी। सरकार अब यह समझ रही है कि परिवहन सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह जाना नहीं है बल्कि उस दौरान मिलने वाली मानसिक शांति भी जरूरी है।
पुरुष यात्रियों के लिए भी सुरक्षा के फायदे
अक्सर चर्चा सिर्फ महिलाओं की होती है लेकिन ये बसें पुरुषों के लिए भी उतनी ही मुफीद हैं। भीड़भाड़ वाले वक्त में जेबकतरी या आपसी झगड़े आम बात हैं। बसों में लगे सीसीटीवी कैमरे ऐसे तत्वों के लिए डर का काम करेंगे। इसके अलावा पैनिक बटन किसी भी मेडिकल इमरजेंसी में जान बचाने का जरिया बन सकता है। अगर किसी पुरुष यात्री को अचानक दिल का दौरा पड़ता है या तबीयत बिगड़ती है तो वह इस सिस्टम का इस्तेमाल कर तुरंत मदद पा सकता है। अजनबियों से भरी बस में अब किसी को मदद के लिए भीड़ के भरोसे नहीं रहना पड़ेगा। यह सिस्टम एक व्यवस्थित ढांचा तैयार करता है ताकि हर यात्री को वक्त पर मदद मिल सके।
दुनिया के बाकी देशों का हाल
अगर हम दुनिया के दूसरे देशों की बात करें तो एसटी बस को अभी लंबा रास्ता तय करना है। जापान में बसें अपनी पाबंदी के लिए जानी जाती हैं जहाँ एक मिनट की देरी को भी अपराध माना जाता है। दक्षिण कोरिया में बस अड्डों पर भी हीटिंग और कूलिंग की सुविधा होती है ताकि मुसाफिर को गर्मी या सर्दी न लगे। स्विट्जरलैंड की ‘पोस्ट-बस’ पहाड़ियों के मुश्किल रास्तों पर जिस सटीकता से चलती है वह काबिले तारीफ है। रवांडा जैसे देश ने भी अपनी बसों को डिजिटल कर दिया है ताकि लोग बिना नकद के सफर कर सकें।
दूसरी तरफ उत्तर कोरिया में बसें बहुत पुरानी हैं और वहाँ लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। सिंगापुर और जर्मनी जैसे देशों ने साबित किया है कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट किसी लग्जरी से कम नहीं हो सकता। इन देशों के मुकाबले हमारी ५० बसें एक छोटी शुरुआत हैं लेकिन यह सुखद है कि हमने कम से कम इंजन तो स्टार्ट किया है।
लाइव ट्रैकिंग और समय की बचत
जीपीएस तकनीक का जुड़ाव इस बस सेवा का सबसे व्यावहारिक हिस्सा है। पहले बस स्टैंड पर घंटों धूल फाँकनी पड़ती थी क्योंकि पता ही नहीं होता था कि बस कहाँ है। अब हर बस कंट्रोल रूम से जुड़ी होगी। अगर बस किसी घाट में खराब हो जाती है तो अधिकारियों को तुरंत पता चल जाएगा। आने वाले समय में मुसाफिर अपने मोबाइल पर देख सकेंगे कि बस कितनी दूर है। यह उन लोगों के लिए बहुत बड़ी राहत है जिन्हें वक्त पर अस्पताल या दफ्तर पहुँचना होता है। तकनीक का असली फायदा तभी है जब वह आम आदमी की परेशानी कम करे।
बजट और विस्तार की चुनौती
परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने ऐलान किया है कि २०२६ के आखिर तक ८००० नई बसें बेड़े में शामिल की जाएंगी। इनमें बिजली से चलने वाली बसें भी होंगी। पिछले कुछ सालों में निगम काफी घाटे में रहा है और हड़तालों की वजह से साख भी गिरी है। नई बसों में निवेश करना जनता का भरोसा जीतने का एक तरीका है। इन बसों का नाम ‘राजमाता जिजाऊ’ रखा गया है जो हमारी संस्कृति से जुड़ाव महसूस कराता है। लेकिन असली चुनौती इन बसों के रखरखाव की है। रिबन काटना आसान है पर यह देखना मुश्किल कि क्या छह महीने बाद भी ये पैनिक बटन काम करेंगे? अक्सर सरकारी चीजें देखरेख के अभाव में खराब हो जाती हैं और हमें इस ढर्रे को तोड़ना होगा।
अंधभक्ति नहीं बल्कि सवाल पूछना जरूरी है
एक नागरिक के तौर पर हमें यह याद रखना चाहिए कि ये बसें हमारे टैक्स के पैसों से आई हैं। सुरक्षित और साफ-सुथरा सफर देना सरकार का फर्ज है कोई अहसान नहीं। हमें सिर्फ ५० बसों को देखकर खुश नहीं होना चाहिए बल्कि यह पूछना चाहिए कि बाकी हजारों बसों का क्या? बस स्टैंड की हालत कब सुधरेगी? जब तक जनता सवाल नहीं पूछेगी प्रशासन ढीला ही रहेगा। अंधभक्ति के बजाय जिम्मेदारी तय करना ज्यादा जरूरी है ताकि व्यवस्था में सुधार आए। हमें लगातार दबाव बनाए रखना होगा ताकि अधिकारी अपनी जिम्मेदारी समझें।
नई बसों के रूट और किराया
ये नई बसें उन रास्तों पर चलाई जाएंगी जहाँ मुसाफिरों की तादाद ज्यादा है। मुंबई से पुणे का रूट जो निगम के लिए कमाई का जरिया है वहाँ ये बसें ज्यादा दिखेंगी। इसके अलावा नासिक से पुणे और औरंगाबाद से पुणे के बीच भी इन्हें चलाया जाएगा। कोल्हापुर और मुंबई के बीच भी इनकी सेवा शुरू करने की चर्चा है। किराया साधारण बसों से थोड़ा ज्यादा हो सकता है।
अगर साधारण बस का किराया ३२० रुपये है तो इनका किराया ३८० से ४०० रुपये के बीच हो सकता है। अच्छी बात यह है कि महिलाओं को ‘महिला सम्मान योजना’ के तहत ५० फीसदी की छूट मिलती रहेगी। यानी महिलाओं को सिर्फ १९० या २०० रुपये देने होंगे। ७५ साल से ऊपर के बुजुर्ग हमेशा की तरह मुफ्त सफर कर सकेंगे। निगम अब उन लोगों को अपनी तरफ खींचना चाहता है जो प्राइवेट बसों में ज्यादा पैसे खर्च करते हैं।
मशीनों के बीच इंसान की भूमिका
बस सिर्फ एक मशीन नहीं है बल्कि इसमें काम करने वाले ड्राइवर और कंडक्टर इसका अहम हिस्सा हैं। इन लोगों को नई तकनीक सिखाना एक बड़ा काम है। जो ड्राइवर बरसों से पुरानी स्टयरिंग थामे हुए थे उन्हें अब डिजिटल डैशबोर्ड समझना होगा। शुरुआत में थोड़ी उलझन हो सकती है। मुसाफिर भी शायद मजाक में पैनिक बटन दबा दें जिससे कंट्रोल रूम को परेशानी हो सकती है। लेकिन यह सब सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है। हमें अपने स्टाफ पर भरोसा करना होगा और उन्हें सही ट्रेनिंग देनी होगी तभी यह प्रयोग कामयाब होगा।
भविष्य की राह और चुनौतियां
यह बदलाव देखकर अच्छा लगता है पर हमें सावधान भी रहना चाहिए। निगम पहले भी कई बड़े वादे कर चुका है जो बाद में ठंडे बस्ते में चले गए। ८००० बसों के लिए पैसा कहाँ से आएगा? क्या यह निजी साझेदारी से होगा या सरकार पूरा पैसा देगी? तकनीक तो अच्छी है पर इसे ठीक करने वाले मैकेनिकों को भी तैयार करना होगा। ऐसा न हो कि बस खराब हो जाए और उसे ठीक करने के लिए स्पेयर पार्ट्स ही न मिलें।
मुझे लगता है कि छोटे शहरों के मुसाफिरों की प्रतिक्रिया देखना सबसे दिलचस्प होगा। उन्होंने बरसों से खराब बसों में सफर किया है। जब वे सीसीटीवी और डिजिटल बोर्ड देखेंगे तो उन्हें गर्व महसूस होगा। हो सकता है कि सह्याद्रि के घने जंगलों में जीपीएस का सिग्नल थोड़ा कमजोर रहे पर कम से कम कदम तो आगे बढ़ाए गए हैं। एसटी बस अब अपनी पुरानी चमड़ी उतारकर नए दौर में कदम रख रही है। इसकी आत्मा वही है पर अब इसके पास तकनीक का कवच है। हमें उम्मीद है कि यह शुरुआत महाराष्ट्र के हर जिले तक पहुँचेगी और सफर वाकई सुहाना होगा।


