संजय शाह
निकिता रॉय एक सुपरनैचुरल थ्रिलर है। बॉलीवुड के आम लाउड धमाकों और बेतुकी चीखों से वो थोड़ी अलग है। ये एक शांत मगर डरावनी कहानी पेश करती है, जो भारतीय फिल्म को मानो हॉलीवुड वाले निखार के साथ जोड़ता है। पूनम और शत्रुघ्न सिन्हा के बेटे और सोनाक्षी सिन्हा के भाई निर्देशक कुश एस. सिन्हा, ने अपनी इस पहली फिल्म से फिल्ममेकिंग में शानदार शुरुआत की है। चलो, गहराई में उतरते हैं।
निकिता रॉय की कहानी मुंबई से शुरू होती है। यहां लेखिका और तर्कवादी निकिता रॉय (सोनाक्षी) अपने संस्थान के जरिए तर्कों के लिए और अंधविश्वास के खिलाफ काम करती हैं। फिल्म शुरु होते ही, कुछ ही पलों में, कहानी लंदन का रुख लेती है। निकिता के भाई, डॉ. सनल रॉय (अर्जुन रामपाल) की वहां रहस्यमयी हालात में मौत हुई है। एक पूल से सनल की कार नदी में जा गिरी है। पुलिस इसे हादसा करार दे कर केस बंद करने वाली है। लेकिन निकिता का शक उसे मामले की जांच करने के लिए मजबूर करता हैं। इसमें उनकी मदद करता है जॉली (सुहैल नय्यर)। निकिता की तहकीकात उन्हें बन बैठे गॉड मेन अमर देव (परेश रावल) तक ले जाती है। निकिता को सनल की रहस्यमयी मौत से अमर देव का कनेक्शन होने का संदेह है। लेकिन अमर देव से टकराना आसान नहीं है। उसके अनगिनत फोलोअर्स है। वो ताकतवर है। और निकिता का जब उससे सामना होता है तबअमर देव बेधड़क निकिता को उसे बेनकाब करने की चुनौती देता है। इतना ही नहीं, अमर देव डरावने ढंग से भविष्यवाणी भी करता है कि वो तीन दिन में मर जाएगी। उसने सनल को भी ऐसी ही चेतावनी दी थी और वो तीन दिनों में मर भी गया था। क्या निकिता सच उजागर कर पाएगी और अपने भाई के लिए इंसाफ हासिल कर पाएगी? यही सवाल फिल्म निकिता रॉय की रोमांचक कहानी को आगे बढ़ाता है।

निकिता रॉय अपने अनोखे टेकिंग से हिंदी सुपरनैचरल थ्रिलर में अलग दिखती है। जेनर के आम ओवर-द-टॉप तत्वों, जैसे कि भारी-भरखम संगीत, अंधेरे दृश्य, और चटक गिमिक्स, तीनों से ये फिल्म अपने आप को दूर रख सकी है। उसके बजाय, फिल्म संयम रखती है, जिससे इसके सीन रोचकता के तथा, शांत तीव्रता के साथ खुलते हैं, और अनोखा असर छोड़ते हैं। सनल की मौत और अमर देव के रोल की कहानी धीरे-धीरे खुलती है, जो दर्शकों को बांधे रखती है, भले ही शुरू में रोमांच कम हो। और हां, फिल्म अप्रत्याशित मोड़ के साथ खत्म होती है, जो दर्शकों को संतुष्ट करता है और उनके समय को वसूल भी करता है।
परफॉर्मेंस में सोनाक्षी सिन्हा की ये एक सब से बेहतरीन भूमिकाओं में से है। वो निकिता के किरदार को सहजता और स्वाभाविक आकर्षण के साथ निभाती है। परेश रावल, फिल्मी बाबाओं के नाटकीय अंदाज से बचते हुए, अमर देव को डरावना मगर आकर्षक बनाते हैं, जो उत्सुकता और डर दोनों जगाता है। सुहैल नय्यर अच्छा सहयोग देते हैं। अर्जुन रामपाल सीमित रोल में भी छाप छोड़ते हैं।
अंशुल चौबे की सिनेमैटोग्राफी फिल्म के मूड को सूट करते हुए संयम और तीव्रता का बैलेंस बनाती है। रितेश सोनी की कसी हुई एडिटिंग कहानी को चुस्त रखती है। अभिनव शेखर का संगीत फिल्म के अनुरूप है और माहौल को संगीन बनाता है। निकिता रॉय से नवोदित निर्देशक कुश एस. सिन्हा अपनी काबिलियत साबित करते हैं। उनकी फिल्म सुपरनैचरल जेनर में अलग साबित होती है। ताजा और अलग सिनेमाई अनुभव के लिए इसे देख सकते है।
रेटिंग: 5 में से 3 स्टार्स
कलाकार: सोनाक्षी सिन्हा, परेश रावल, अर्जुन रामपाल, सुहैल नय्यर, कैलिरोई त्जियाफेटा
निर्देशक: कुश एस. सिन्हा
लेखक: पवन क्रिपलानी
निर्माता: निक्की भागनानी, विक्की भागनानी, किंजल घोने, दिनेश गुप्ता, अंकुर टकरानी, विपिन अग्निहोत्री
छायांकन: अंशुल चौबे
संपादन: रितेश सोनी
संगीत: अभिनव शेखर
नोटः यह समीक्षा मूल अंग्रेजी समीक्षा से एआई (AI) का उपयोग करके अनुवादित की गई है। इसमें यथासंभव सुधार सावधानीपूर्वक किए गए हैं। स्पष्टता के लिए पाठकों को मूल अंग्रेजी संस्करण देखने की सलाह दी जाती है।


