इस साल नेशनल फिल्म अवार्ड्स का मंच किसी बड़े शहर में नहीं, बल्कि गुजरात के नर्मदा जिले स्थित एकता नगर में सजा। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी की छांव में हुआ यह समारोह अपने आप में एक ऐतिहासिक पल रहा।
यह सिर्फ एक जगह बदलने की बात नहीं थी। इस बार का समारोह भारतीय सिनेमा की विविधता को भी बखूबी दिखाता है, जहां एक तरफ पांच दशक पुरानी विरासत को सम्मानित किया गया, तो दूसरी तरफ नए चेहरों को भी उतनी ही गर्मजोशी से जगह मिली।
शाम की सबसे भावुक तस्वीर कन्नड़ सिनेमा के दिग्गज अनंत नाग को दादासाहेब फाल्के पुरस्कार मिलने की रही। भारतीय सिनेमा के इस सबसे बड़े सम्मान के हकदार अनंत नाग ने अपने करियर में तीन सौ से ज्यादा फिल्मों में काम किया है, वह भी पूरे पांच दशकों तक फैले सफर में। पिछली बार यह सम्मान मलयालम सिनेमा के दिग्गज मोहनलाल को मिला था, और अब यह कड़ी अनंत नाग के नाम जुड़ गई है।
सर्वश्रेष्ठ अभिनेता की श्रेणी में इस बार एक दिलचस्प संयोग देखने को मिला। मलयालम सिनेमा के मामूटी को उनकी फिल्म ब्रह्मायुगम के लिए यह पुरस्कार मिला, जो उनके करियर का चौथा सर्वश्रेष्ठ अभिनेता अवार्ड है। इसके साथ ही वह अमिताभ बच्चन के बराबर आ गए हैं, जो अब तक इस श्रेणी में सबसे ज्यादा बार सम्मानित होने का रिकॉर्ड साझा करते हैं।
लेकिन यह पुरस्कार सिर्फ मामूटी के नाम नहीं रहा। कार्तिक आर्यन को भी उनकी फिल्म चंदू चैंपियन के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता चुना गया। एक तरफ चार दशकों से ज्यादा का अनुभव रखने वाला अभिनेता, तो दूसरी तरफ हिंदी सिनेमा का युवा चेहरा, दोनों का एक ही मंच पर सम्मानित होना इस साल के अवार्ड्स की खूबसूरती बन गया।
सर्वश्रेष्ठ फिल्म का खिताब आदित्य सुहास जांभले की आर्टिकल 370 को मिला। इसी फिल्म में अपने अभिनय के लिए यामी गौतम को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला। सर्वश्रेष्ठ निर्देशन की श्रेणी में राजकुमार पेरियासामी को उनकी फिल्म अमरन के लिए सम्मानित किया गया।
सहायक भूमिकाओं में भी इस बार कई नाम चमके। संजय मिश्रा को भक्षक के लिए, सचना नमीदास को महाराजा के लिए, और रोपाश्री वर्काडी को मिथ्या के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता-अभिनेत्री का सम्मान मिला।
राष्ट्रीय, सामाजिक और पर्यावरणीय मूल्यों को बढ़ावा देने वाली सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार अरुण मथेस्वरन की कैप्टन मिलर को मिला। वहीं रणदीप हुड्डा ने स्वतंत्र वीर सावरकर के लिए निर्देशक के तौर पर अपनी पहली फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ डेब्यू फिल्म का सम्मान हासिल किया, जो इस साल के अवार्ड्स की “नई शुरुआत” वाली भावना को सबसे बेहतर तरीके से दर्शाता है।
मनोरंजन प्रधान श्रेणी में नाग अश्विन की कल्कि 2898 एडी को सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म का पुरस्कार मिला, जिसने दर्शकों को पूरी तरह से मनोरंजन देने के लिए यह सम्मान अपने नाम किया।
गैर-फीचर फिल्मों की श्रेणी में भी दिलचस्प नतीजे रहे। भंगार को सर्वश्रेष्ठ गैर-फीचर फिल्म चुना गया, जबकि आनंद एल राय को स्टैच्यू ऑफ यूनिटी एकता का प्रतीक के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशन (गैर-फीचर) का पुरस्कार मिला। सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री का खिताब राम-नामी को मिला।
समारोह के दौरान जारी एक आधिकारिक बयान में कहा गया कि आने वाले सालों में यह आयोजन सिर्फ राजधानी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों में जाएगा। इसका मकसद पूरे भारत की सिनेमाई प्रतिभा को एक साथ लाना और “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की भावना को मजबूत करना बताया गया।
यही वजह है कि इस साल का समारोह सिर्फ पुरस्कारों की सूची नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की एक झलक बन गया। एक तरफ पांच दशक की मेहनत का सम्मान हुआ, तो दूसरी तरफ पहली बार निर्देशन करने वाले कलाकार को भी वही सम्मान मिला। विरासत और नई शुरुआत, दोनों एक ही शाम में, एक ही मंच पर साथ खड़े नजर आए।
72वें नेशनल फिल्म अवार्ड्स ने यह भी दिखाया कि भारतीय सिनेमा किसी एक भाषा, एक पीढ़ी या एक शहर तक सीमित नहीं है। यह असल मायनों में पूरे देश की कहानी है, जो हर बार खुद को नए तरीके से गढ़ती रहती है।
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