चीन द्वारा अमेरिका पर 34% अतिरिक्त टैरिफ लगाये जाने के साथ ही वैश्विक व्यापार-युद्ध तेज हो गया है। अमेरिका द्वारा बीते कल लत्गाये गए 26% अतिरिक्त कर के जवाब में चीन ने भी एक अहम कदम उठाते हुए 10 अप्रैल से अमेरिका के सामान पर 34% अतिरिक्त टैरिफ लगाने का ऐलान किया है। इस फैसले ने अमेरिकी व्यापारियों और वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है।
चीन का यह नया कदम अमेरिकी सामानों पर मौजूदा 25% टैरिफ से 34% तक का इजाफा करेगा, जिससे दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव और बढ़ने की संभावना है। व्यापार-युद्ध के इस नए चरण ने सिर्फ दो देशों के रिश्तों को ही प्रभावित नहीं किया है, बल्कि दोनों के इस नहले पर दहले वाले कदम से वैश्विक व्यापार भी संकट में आ गया है।
टैरिफ की इस बढ़ोत्तरी के परिणामस्वरूप अमेरिका को अपनी औद्योगिक और कृषि उत्पादों की निर्यात-क्षमता में भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। चीन के इस जवाबी कदम से अमेरिकी कृषि उत्पादों, जैसे कि सोयाबीन, मांस और अन्य कृषि उत्पादों पर असर पड़ने की संभावना है। इससे किसानों को खासा नुकसान हो सकता है।
अमेरिका और चीन के बीच व्यापार-युद्ध का इतिहास 2018 से शुरू होता है जब पहली बार राष्ट्रपति बने ट्रंप ने चीन के खिलाफ भारी टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। उस समय उनका तर्क था कि चीन अमेरिकी बाजारों में अपने महंगे उत्पादों की पहुंच बढ़ाने के लिए ऐसी नीतियां बना रहा है, जो वैश्विक व्यापार के नियमों के खिलाफ हैं।
इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिका के उत्पादों पर टैरिफ बढ़ाकर इसे प्रतिशोधी कार्रवाई के रूप में लिया था। इस प्रकार दोनों देशों के बीच व्यापार-युद्ध एक गहरी खाई बन चुका है, जिससे वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता का माहौल बन गया है।
अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते टैरिफ ने वैश्विक व्यापार को मंदी की ओर धकेल दिया है। यूरोप और एशिया के बाजारों में भारी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। इस व्यापार-युद्ध के कारण उपभोक्ताओं को महंगे सामान मिल रहे हैं और इससे पहले से बढ़ी हुई महंगाई अब आसमान छू सकती है। इन प्रतिस्पर्धात्मक कदमों के कारण ग्लोबल सप्लाई चेन में भी गंभीर व्यवधान उत्पन्न हो रहे हैं। एक ओर जहां कुछ कंपनियां उत्पादन को चीन से दूसरे देशों में स्थानांतरित करने की कोशिश कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर कई देशों को व्यापार की नई दिशा और विकल्प तलाशने की जरूरत महसूस हो रही है।
चीन का पलटवार: 34% टैरिफ क्यों?
चीन का 34% टैरिफ बढ़ाने का कदम ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ा झटका है। इस कदम के पीछे चीन का स्पष्ट संदेश है कि वह अमेरिका की व्यापारिक नीतियों को नकारते हुए अपने घरेलू उत्पादकों को संरक्षित करना चाहता है। चीन ने यह कदम अमेरिकी राष्ट्रपति के दृष्टिकोण और उनके द्वारा चीन के खिलाफ लगाए गए शुल्कों के जवाब में उठाया है। चीन के लिए यह रणनीति अधिक आक्रामक है, क्योंकि इससे अमेरिका के उत्पादों का चीनी बाजार में प्रवेश और भी कठिन हो जाएगा। इसके साथ ही चीन ने यह भी संकेत दिया है कि अगर अमेरिका अपनी नीतियों में बदलाव नहीं करता, तो चीन और भी सख्त कदम उठा सकता है।
टैरिफ-वार का भारतीय व्यापार पर असर
भारत, जो चीन और अमेरिका दोनों के साथ अच्छा-खासा व्यापारिक संबंध रखता है, ऐसी स्थिति में खासा प्रभावित हो सकता है। व्यापार-युद्ध के कारण भारत को चीन और अमेरिका से आने वाली कुछ वस्तुओं के महंगे होने की आशंका है। इसके साथ ही भारतीय निर्यातकों को भी दिक्कतें आ सकती हैं क्योंकि दोनों देशों के बीच बढ़ते टैरिफ का असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर सीधा पड़ेगा। भारत सरकार अभी स्थिति पर पैनी नजर बनाये हुए है और देश के उद्योग-व्यापार जगत को भरोसा दिलाने के लिए अपनी व्यापार नीति में बदलाव लाने की बात कही है, ताकि भारतीय निर्यातक इस बदलते परिदृश्य में अपने व्यापार को बनाये रख सकें।
ट्रंप प्रशासन की आने वाली प्रतिक्रिया
अब सवाल यह है कि अमेरिकी प्रशासन इस कदम का जवाब कैसे देगा। ट्रंप प्रशासन ने पहले ही चीन के खिलाफ व्यापारिक नीतियां कड़ी की थीं, और अब वे और कड़ी हो सकती हैं। हालांकि, अमेरिकी व्यापारियों और कंपनियों ने इससे बचने के लिए अपील की है कि दोनों देशों के बीच बातचीत को बढ़ावा दिया जाए, ताकि व्यापार-युद्ध को शांत किया जा सके। अमेरिकी प्रशासन के लिए यह भी एक चुनौतीपूर्ण स्थिति है, क्योंकि घरेलू स्तर पर महंगाई बढ़ने और व्यापारिक नुकसान होने का खतरा है। इसके अलावा, अमेरिका के लिए यह भी जरूरी होगा कि वह वैश्विक आर्थिक दबाव को संभाले और अपनी व्यापारिक नीतियों में बदलाव करे, ताकि इस टैरिफ वार का अंत लाभदायक हो सके।
अब देखना यह होगा कि अमेरिका और चीन इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए क्या कदम उठाते हैं और कैसे दोनों देश इस व्यापार-युद्ध को शांत करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं। क्योंकि यह व्यापार-युद्ध न केवल अमेरिका और चीन, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी है कि भविष्य में ऐसे कदमों से वैश्विक बाजारों में अस्थिरता आ सकती है।


