पाकिस्तान के बलूचिस्तान में इतिहास रचा गया है। कशिश चौधरी वहां की पहली हिंदू महिला असिस्टेंट कमिश्नर बन गई हैं। यह उपलब्धि एक ऐसे क्षेत्र में मिली है, जो पारंपरिक सोच और जातीय राजनीति के लिए जाना जाता है।
कौन हैं कशिश चौधरी?
कशिश पाकिस्तान के अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय से आती हैं। वह सिंध प्रांत के जैकबाबाद की रहने वाली हैं। उन्होंने पाकिस्तान की सिविल सेवा परीक्षा — CSS (Central Superior Services) — पास की है, जो देश की शीर्ष प्रशासनिक सेवा के लिए होती है।
उन्हें बलूचिस्तान के जाफराबाद जिले के उस्ता मोहम्मद शहर में असिस्टेंट कमिश्नर नियुक्त किया गया है। यह पद प्रशासन, कानून-व्यवस्था और विकास परियोजनाओं का नेतृत्व करता है।
क्यों है ये नियुक्ति ऐतिहासिक?
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को प्रशासनिक पदों पर विरले ही जगह मिलती है। और जब बात एक हिंदू महिला की हो, वह भी बलूचिस्तान में — तो यह बिल्कुल अभूतपूर्व घटना बन जाती है।
उस्ता मोहम्मद शहर में अधिकतर आबादी पश्तून और बलूच समुदाय की है। ऐसे में एक हिंदू महिला का नेतृत्व एक साहसिक बदलाव की ओर इशारा करता है।
संघर्ष से सफलता तक
कशिश ने CSS जैसी कठिन परीक्षा पास की, जिसमें हजारों अभ्यर्थी हर साल शामिल होते हैं, पर चयन कुछ ही का होता है। अल्पसंख्यक और महिला होने के कारण उनकी राह और भी मुश्किल थी। शिक्षा, संसाधनों और सामाजिक समर्थन की कमी आम है।
अब उनकी कहानी पाकिस्तान की नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन गई है, खासकर उन लड़कियों के लिए जो हाशिये पर रहती हैं।
पाकिस्तान में प्रतिक्रिया मिली-जुली
उनकी नियुक्ति ने सोशल मीडिया पर हलचल मचा दी। कई लोगों ने इसे सकारात्मक कदम बताया, वहीं कट्टरपंथी समूहों की ओर से चुप्पी देखी गई। कुछ लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि पाकिस्तान की सरकार या शीर्ष नेतृत्व ने अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी।
पाकिस्तान की नौकरशाही और अल्पसंख्यक
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों का प्रशासनिक सेवाओं में प्रतिनिधित्व बहुत कम है। संविधान में स्थान सुनिश्चित होने के बावजूद, व्यावहारिक रूप से मुस्लिम समुदाय का ही दबदबा रहा है।
कशिश की नियुक्ति भले ही व्यवस्था को तुरंत न बदले, लेकिन यह एक बड़ा संदेश देती है — कि प्रतिभा सीमाओं और भेदभाव से परे होती है।
भारत की चुप लेकिन सकारात्मक प्रतिक्रिया
भारत की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया, लेकिन सोशल मीडिया पर भारतीय यूजर्स ने कशिश को जमकर सराहा। इसे संघर्ष और समर्पण की मिसाल बताया गया।


