एक बार सिर्फ कल्पना करके देखिए, कोलकाता की चिलचिलाती धूप में एक व्यक्ति रिक्शा खींच रहा है। जिसका नाम मनोज है। वह उन हजारों लोगों में से एक है जो आधुनिकीकरण की मानवीय कीमत चुका रहा है। कोलकाता में हाथ-रिक्शा, जो भारत की आजादी से पहले से शहर की पहचान हैं, अब गायब हो रहे हैं। ऑटो-रिक्शा, बस और ऐप-आधारित टैक्सी ने उनकी जगह ले ली है। लेकिन यह कहानी सिर्फ पुरानी परंपरा की नहीं है। यह मनोज जैसे लोगों की कहानी है… जो अपनी आजीविका, स्वास्थ्य और उम्मीद खो रहे हैं। यह कहानी बताती है कि जब तरक्की होती है, तो सबसे कमजोर लोग पीछे छूट जाते हैं।
रिक्शा चालक का रोज़मर्रा का संघर्ष
मनोज सुबह-सुबह उठता है। वह एक छोटे से कमरे में रहता है, जहां कई रिक्शा चालक एक साथ रहते हैं। वह रिक्शा किराए पर लेता है। उसकी उम्मीद होती है कि दिन भर में किराया, खाना और थोड़ा-सा पैसा घर भेजने के लिए कमा लेगा। लेकिन ज्यादातर दिन वह मुश्किल से खर्च निकाल पाता है।
सड़कें अब रिक्शा चालकों के लिए खामोश हैं। लोग तेज़ और सस्ते साधनों को चुनते हैं। ओला, उबर और ऑटो-रिक्शा ने सवारी छीन ली। कोविड-19 ने हालात और बिगाड़ दिए। पर्यटक और स्थानीय लोग कम हो गए। हर खाली सवारी संजय को याद दिलाती है कि उसका जीवन बदल रहा है।
आर्थिक तंगी की मार
रिक्शा चालकों के लिए पैसा हमेशा कम पड़ता है। मनोज जैसे कई लोग गांवों से कोलकाता काम की तलाश में आए थे। उनके पास करने के लिए कुछ नहीं था, उनको नोकरियाँ नहीं मिलती थीं। इसलिए उन्होंने अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए हाथ-रिक्शा चुना। उनके पास इतना पैसा नहीं था की वो रिक्शा खरीद लेते। इसलिए उन्होंने किराए का रिक्शा चुना।
अब आप ही बताइए की किराया, खाना और ज़रूरी खर्चों के बाद क्या बचेगा। कई बार इन रिक्शा चालकों को सिर्फ खाने लायक पैसे मिलते हैं। बिहार में अपने परिवार को पैसा भेजना अब सपना लगता है। सवारियां कम होने से उनकी कमाई न के बराबर रह गई है। उनके पास न बचत है, न कोई आपातकालीन फंड। वे हर दिन गरीबी की कगार पर जीते हैं। आधुनिकीकरण की मानवीय कीमत उनकी जेब पर भारी पड़ रही है।
स्वास्थ्य पर भारी बोझ
रिक्शा खींचना आसान नहीं। न जाने कितने रिक्शा चालक घंटों कोलकाता की उमस भरी सड़कों पर सवारियां ढोते हैं। यह काम शरीर को तोड़ देता है। कई चालकों को पुरानी बीमारियां, दिल की समस्याएं या प्रदूषण से सांस की तकलीफ होती है। आराम का समय नहीं, डॉक्टर के लिए पैसा नहीं। कोलकाता की गर्मी और उमस हालात बिगाड़ देती है। कई चालकों तो काम के बीच बेहोश हो जाते हैं। फिर भी, वे रुक नहीं सकते। इस काम के बिना उनके पास कुछ नहीं।
कोई सहारा नहीं
अगर कोई चालक बीमार पड़ जाए या बूढ़ा हो जाए, तो क्या होगा? कुछ नहीं। न पेंशन, न स्वास्थ्य बीमा, न कोई सामाजिक सुरक्षा। रिक्शा चालक भारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। वे कल्याण योजनाओं से बाहर हैं। काम नहीं, तो खाना नहीं। कुछ लोग कर्ज लेते हैं, जो उन्हें और जकड़ लेता है। परिवार या दोस्तों का सहारा भी कमज़ोर है। सरकार ने सहायता की बात की, लेकिन ज़मीन पर कुछ नहीं पहुंचता। वे अकेले हैं, एक ऐसी व्यवस्था में जो उन्हें देखती ही नहीं। आधुनिकीकरण उन्हें किनारे धकेल रहा है, बिना किसी सहारे के।
इनमें कई चालक बहुत पुराने हैं, जो पीड़ियों से यही काम कर रहे हैं। काफी चालकों के पास सर छिपाने के लिए जगह तक नहीं है। जिनके अपने रिक्शा हैं, वो लोग रिक्शा में ही सो जाते हैं, और जिनके पास नहीं है वो फूटपाथ पे अपना जीवन गुजार रहे हैं।
समाधान और हकीकत का टकराव
कुछ लोग कहते हैं कि हाथ-रिक्शा पर प्रतिबंध लगना चाहिए। वे इसे अमानवीय और पुराना मानते हैं। लेकिन मनोज जैसे चालकों के लिए यह उनकी एकमात्र आजीविका है। कुछ लोग नए काम सिखाने की बात करते हैं, जैसे ड्राइविंग या कारखाने में काम। सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन पैसा कौन देगा?
प्रशिक्षण कार्यक्रम हैं, लेकिन छोटे और कमज़ोर। बैटरी-रिक्शा एक समाधान हो सकता है, जो परंपरा और आधुनिकता को जोड़े। लेकिन इसे लागू करना महंगा और धीमा है। इन लोगों को आज रोटी चाहिए, 2 या 5 साल बाद नहीं।
जिन शहरों में लोग शिक्षित होकर नोकरीयां नहीं कर पा रहे है, तो आप लोग सोच सकते हैं की ऐसे लोगों का क्या हाल होता होगा।
चालकों की आवाज़
एक बार मैंने एक कमजोर शरीर वाले रिक्शा चालक को देखा। उसकी उसका पेट पसलियों से चिपक रहा था, चेहरा पसीने से नहा रहा था। मैंने उससे कहा की भी कुछ और काम क्यूँ नहीं करते? पता है उसका जवाब क्या था?
“इसके अलावा मुझे कुछ आता नहीं है।”
“अगर इसे भी छोड़ दिया तो क्या करूंगा?”
“कौन देगा मुझे काम?”
उसकी इस बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मेरे मन में ढेरों सवाल थे, लेकिन मैं उससे पूछने योग्य नहीं था। यह लोग दया नहीं चाहते… क्यूंकी अगर दया चाहते तो शायद भारत के लगभग 4.5 लाख भिखारियों में वो भी शामिल होते। ये लोग मेहनत का काम, सम्मान और मौका चाहते हैं। यह लोग भी जानते हैं कि दुनिया बदल रही है, लेकिन शायद सरकार और हम लोग इन्हे भूल गए हैं।
क्या किया जा सकता है?
आसान जवाब नहीं है, लेकिन रास्ते हैं। छोटे प्रशिक्षण कार्यक्रम चालकों को नई स्किल्स सिखा सकते हैं, जैसे साइकिल ठीक करना या ड्राइविंग। सरकारी छोटे लोन से वे छोटे व्यवसाय शुरू कर सकते हैं। अनौपचारिक कामगारों के लिए स्वास्थ्य केंद्र उनकी तकलीफ कम कर सकते हैं। इन विचारों को पैसा और इच्छाशक्ति चाहिए, लेकिन ये मुमकिन हैं।
ज़रूरी है कि चालकों को इंसान समझा जाए, न कि पुरानी चीज़। आज कोलकाता में हाथ-रिक्शा और उनके चालक एक बड़ी समस्या बन गए हैं। हालांकि यह पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। लेकिन इस समय हाथ-रिक्शा से रोजगार चलाना काफी मुश्किल हो गया है, और शायद आने वाले सालों में हमे ये हाथ-रिक्शा देखने को न मिलें।
देखभाल की पुकार
आधुनिकीकरण की मानवीय कीमत कोलकाता के रिक्शा चालकों पर भारी है। वे सिर्फ नौकरी नहीं खो रहे… वे दुनिया में अपनी जगह खो रहे हैं। जैसे-जैसे शहर तरक्की की दौड़ में हैं, और ये लोग पीछे छूट रहे हैं। इन लोगों की ज्यादा मांग नहीं है, ये लोग बस एक निष्पक्ष मौका मांग रहे हैं।
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