एक तस्वीर है मेरे ज़ेहन में।
झारखंड का एक सरकारी अस्पताल। एक माँ अपने चार साल के बेटे को गोद में लिए बैठी है। बच्चे की आँखें बड़ी हैं इसलिए नहीं कि वो खूबसूरत है, बल्कि इसलिए कि उसका चेहरा सूख चुका है। हड्डियाँ दिख रही हैं। वज़न है आठ किलो जो एक साल के बच्चे का होता है। डॉक्टर ने कागज़ पर लिखा गंभीर कुपोषण।
माँ ने पूछा “यह क्या बीमारी है?”
डॉक्टर ने एक पल रुककर कहा “भूख।”
उसी दिन दिल्ली में एक पत्रकार वार्ता हो रही थी। एक मंत्री मुस्कुराते हुए कह रहे थे “भारत आज दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। हम आगे बढ़ रहे हैं। हम विश्वगुरु बन रहे हैं।”
तालियाँ बजीं। कैमरे चमके। खबर बनी।
झारखंड वाली माँ की खबर नहीं बनी।
यह देश दो अलग-अलग भारतों में जी रहा है और दोनों एक-दूसरे को देख नहीं पाते। एक भारत में शेयर बाज़ार ऊपर जाता है, नए कारोबार खड़े होते हैं, सड़कें चमकती हैं, हवाई अड्डे नए बनते हैं। दूसरे भारत में माँ-बाप रात को बच्चों को पानी पिलाकर सुलाते हैं ताकि पेट भरा लगे।
वैश्विक भूख सूचकांक 2024 ने दुनिया के 127 देशों को परखा। भारत आया 105वें नंबर पर। “गंभीर” श्रेणी में। हमसे आगे हैं बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका। वो देश जिनकी अर्थव्यवस्था हमारी अर्थव्यवस्था का एक छोटा सा हिस्सा भी नहीं है। वो देश जिन्हें हम कभी-कभी हल्के में लेते हैं।
लेकिन उन्होंने कुछ ऐसा किया जो हम नहीं कर पाए उन्होंने अपने लोगों का पेट भरने को पहली प्राथमिकता बनाया।
हमने क्या किया? हमने आँकड़े मनाए।
सकल घरेलू उत्पाद एक बड़ा शब्द है। लेकिन इसे समझना मुश्किल नहीं देश में जितना उत्पादन हुआ, जितनी सेवाएँ बिकीं, जितना पैसा घूमा वो सब मिलाकर यह संख्या बनती है। लेकिन यह संख्या यह नहीं बताती कि वो पैसा गया कहाँ। वो यह नहीं बताती कि फायदा किसे मिला।
ऑक्सफैम इंडिया की 2023 की रिपोर्ट बताती है कि इस देश के सबसे अमीर एक प्रतिशत लोगों के पास देश की चालीस प्रतिशत से ज़्यादा दौलत है। और सबसे गरीब पचास प्रतिशत लोगों के पास मतलब 70 करोड़ लोगों के पास सिर्फ 3%।
सोचो एक पल के लिए। 70करोड़ लोग। और उनके हिस्से में देश की सिर्फ3% दौलत।
अर्थव्यवस्था बढ़ती रही। दौलत बढ़ती रही। लेकिन वो बढ़ोतरी ऊपर ही रही नीचे तक आते-आते बूँद भर बचती है।
सरकार कहती है यह रिपोर्ट गलत है। इसकी कार्यप्रणाली में खामियाँ हैं। हम इसे नहीं मानते।
ठीक है। मान लेते हैं रिपोर्ट में कमियाँ हैं।
तो फिर राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण का आँकड़ा देखो जो हमारी अपनी सरकार करवाती है। वो बताता है कि देश में पैंतीस प्रतिशत से ज़्यादा बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास उम्र के हिसाब से रुका हुआ है। यह कोई विदेशी संस्था नहीं कह रही यह हमारे अपने आँकड़े हैं।
रिपोर्ट को नकारना आसान है। अपनी ही सर्वेक्षण को नकारना मुश्किल।
लेकिन शायद सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि हम किस पायदान पर हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि हमें परवाह क्यों नहीं है।
जब भारत ने चाँद पर तिरंगा गाड़ा पूरा देश सड़कों पर था। जश्न था, गर्व था, आँखों में आँसू थे। और होने भी चाहिए थे वो एक असाधारण उपलब्धि थी।
लेकिन उसी देश में उसी साल लाखों बच्चे कुपोषण से जूझ रहे थे। उस खबर पर कोई नहीं रोया। कोई सड़क पर नहीं उतरा।
हम अंतरिक्ष में यान भेज सकते हैं लेकिन हर बच्चे तक खाना नहीं पहुँचा सकते। यह तकनीक की कमी नहीं है। यह इच्छाशक्ति की कमी है। यह प्राथमिकताओं की कमी है।
मुफ्त राशन योजना है। आँगनबाड़ी हैं। मध्याह्न भोजन है। कागज़ पर सब कुछ है।
लेकिन वो माँ अभी भी उस अस्पताल में बैठी है।
कहीं कुछ टूटा हुआ है योजना और उस बच्चे के बीच में। और वो टूटा हुआ हिस्सा है जवाबदेही। कोई नहीं पूछता कि आँगनबाड़ी का खाना पहुँचा या नहीं। कोई नहीं पूछता कि मध्याह्न भोजन के पैसे गए कहाँ। कोई नहीं पूछता क्योंकि वो बच्चे मतदान नहीं करते। और जब वो बड़े होकर मतदान करेंगे तब तक उन्हें किसी और मुद्दे पर भड़का दिया जाएगा।
यह व्यवस्था की विफलता नहीं है। यह व्यवस्था का षड्यंत्र है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े अनाज निर्यातकों में से एक है। हम गेहूँ बेचते हैं। चावल बेचते हैं। दुनिया को खिलाते हैं।
और अपने बच्चों को भूखा सुलाते हैं।
इससे बड़ा विरोधाभास क्या होगा?
यह लेख किसी एक सरकार पर नहीं है। यह पिछले सत्तर सालों की उन हर सरकारों पर है जो आईं, गईं और भूख को कभी असली चुनावी मुद्दा नहीं बनने दिया। जिन्होंने जनता को मंदिर-मस्जिद में उलझाए रखा, जाति में उलझाए रखा ताकि यह सवाल कभी न पूछा जाए कि बच्चे भूखे क्यों हैं।
और हम भी उसी जाल में फँसते रहे।
अगली बार जब कोई नेता कहे “भारत पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है” तो एक सवाल पूछना।
बस एक।
“वो बच्चा जो आज रात भूखा सोएगा उसकी अर्थव्यवस्था क्या है?”
अगर जवाब नहीं मिलता तो समझ जाओ कि जश्न किसके लिए है। और वो जश्न किसकी कीमत पर मनाया जा रहा है।
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