छत्रपति संभाजी महाराज, मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज के ज्येष्ठ पुत्र, एक ऐसे वीर योद्धा थे जिन्होंने नौ वर्ष (1681-1689) के अपने शासनकाल में अदम्य साहस और हिंदू धर्म की रक्षा का प्रतीक बनकर इतिहास रचा। मुगल सम्राट औरंगजेब की विशाल सेना, आंतरिक विश्वासघात और यूरोपीय शक्तियों के खिलाफ उनकी जंग ने उन्हें भारतीय इतिहास में अमर कर दिया। आइए, उनके जीवन, संघर्ष और अनछुए पहलुओं को जानें।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
14 मई 1657 को पुरंदर किले में जन्मे संभाजी का पालन-पोषण शिवाजी महाराज और उनकी माता सईबाई के सान्निध्य में हुआ। बचपन से ही उन्हें युद्धकला, प्रशासन और नीतिशास्त्र की शिक्षा दी गई। संभाजी ने संस्कृत, मराठी, हिंदी, फारसी और पुर्तगाली सहित 13 भाषाओं में निपुणता हासिल की। वे न केवल एक योद्धा, बल्कि एक विद्वान और कवि भी थे। उन्होंने बुद्धभूषण नामक संस्कृत ग्रंथ लिखा, जिसमें राज्यcraft और नैतिकता पर उनके विचार थे।
शिवाजी महाराज के निधन (1680) के बाद सौतेली माता सोयराबाई के साथ उनके संबंध तनावपूर्ण हुए। साजिशों के बावजूद, संभाजी ने अपनी योग्यता सिद्ध कर 20 जनवरी 1681 को रायगढ़ किले में छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक करवाया।
चुनौतियों से भरा शासनकाल
संभाजी का शासनकाल चुनौतियों से भरा था। औरंगजेब ने दक्कन में मराठा शक्ति को कुचलने के लिए लाखों सैनिकों की सेना भेजी। कुछ मराठा सरदारों ने विश्वासघात किया, और पुर्तगाली व ब्रिटिश शक्तियां कोंकण तट पर खतरा बन रही थीं। फिर भी, संभाजी ने साहस और रणनीति से साम्राज्य की रक्षा की।
औरंगजेब के खिलाफ सैन्य रणनीतियां
संभाजी की सबसे बड़ी उपलब्धि थी औरंगजेब के विस्तारवादी नीतियों का डटकर मुकाबला करना। उनकी कुछ प्रमुख सैन्य उपलब्धियां थीं:
- बुर्हानपुर पर आक्रमण (1681): संभाजी ने मुगल व्यापार केंद्र बुर्हानपुर पर आश्चर्यजनक हमला कर उसकी संपत्ति लूटी, जिससे मराठा सेना को धन मिला और औरंगजेब को झटका लगा।
- रायगढ़ और पन्हाला की रक्षा: मुगल सेना ने मराठा किलों को घेर लिया, लेकिन संभाजी की गुरिल्ला रणनीति ने युद्ध को लंबा खींचा, जिससे मुगल संसाधन क्षीण हुए।
- गठबंधन की कूटनीति: संभाजी ने राजपूत राजा दुर्गादास राठौर और बीजापुर-गोलकुंडा सल्तनतों के साथ गठजोड़ कर मुगलों को कमजोर किया।
- नौसेना का विकास: अपने पिता की तरह, संभाजी ने मराठा नौसेना को मजबूत कर कोंकण तट को पुर्तगाली और ब्रिटिश खतरों से बचाया।
उनकी एक अनूठी रणनीति थी बरसात में हमले करना, जब मुगल तोपें कीचड़ में बेकार हो जाती थीं। उन्होंने युद्ध से पहले रातभर ढोल बजवाकर मुगल सैनिकों को नींद से वंचित रखा।
सांस्कृतिक और प्रशासनिक योगदान
संभाजी केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि साहित्य और संस्कृति के संरक्षक भी थे। उन्होंने सभी धर्मों का सम्मान किया और मंदिरों, मस्जिदों व गिरजाघरों को नष्ट होने से बचाया। उनकी प्रशासनिक नीतियां शिवाजी की तरह थीं—निष्पक्ष कर प्रणाली, विकेंद्रित शासन और किसानों के लिए कल्याण योजनाएं। औरंगजेब द्वारा नष्ट किए गए तुलजापुर भवानी और पंढरपुर विठ्ठल जैसे मंदिरों को उन्होंने पुनर्निर्माण करवाया।
विश्वासघात और बलिदान
1689 में, संभाजी को उनके सेनापति गनोजी शिर्के ने धोखा देकर मुगलों के हवाले कर दिया। औरंगजेब ने उन्हें 40 दिनों तक अमानवीय यातनाएं दीं, इस्लाम अपनाने और मराठा रहस्य बताने की मांग की। संभाजी ने दृढ़ता से कहा, “औरंगजेब मुझे अपना पूरा साम्राज्य दे दे, तब भी मैं अपना धर्म नहीं छोड़ूंगा!”
11 मार्च 1689 को तुलापुर में उनकी क्रूर हत्या कर दी गई। उनकी आंखें निकाली गईं, जीभ काटी गई और शरीर के टुकड़े किए गए। लेकिन इस बलिदान ने मराठों में प्रतिशोध की आग जलाई, जिसने अंततः मुगल साम्राज्य के पतन का मार्ग प्रशस्त किया।
संभाजी की विरासत
संभाजी का बलिदान हिंदू प्रतिरोध का प्रतीक बना। उनकी मृत्यु ने मराठों को एकजुट किया, और उनके भाई राजाराम व बाद में छत्रपति शाहू ने साम्राज्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। आज महाराष्ट्र में उन्हें धर्म वीर के रूप में पूजा जाता है। संभाजीनगर (पूर्व में औरंगाबाद) को 2023 में उनके सम्मान में नामित किया गया।
अनछुए तथ्य
- किशोर सेनापति: 9 साल की उम्र में उन्होंने पहला सैन्य अभियान संभाला।
- मुगल कैद से भाग निकले: 1679 में आगरा से साधु के वेश में भागे।
- औरंगजेब का डर: मुगल दरबारी ने लिखा, “शिवाजी कांटा था, लेकिन संभाजी बिच्छू है।”
- पत्नी येसुबाई की वीरता: संभाजी की मृत्यु के बाद येसुबाई ने मुगलों का विरोध किया और उनके पुत्र शाहू की रक्षा की।
छत्रपति संभाजी महाराज का जीवन छोटा लेकिन प्रेरणादायी था। उन्होंने न केवल मराठा साम्राज्य को बचाया, बल्कि स्वराज्य और हिंदवी स्वराज के सपने को जीवित रखा। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची महानता सिद्धांतों और बलिदान में निहित है


