उन्नीस फरवरी, सन् सोलह सौ तीस। महाराष्ट्र के जुन्नर के निकट शिवनेरी दुर्ग में एक बालक का जन्म हुआ, जो आगे चलकर भारतीय इतिहास की सबसे प्रखर विभूतियों में से एक बना। छत्रपति शिवाजी महाराज केवल एक योद्धा नहीं थे। वे एक राजनीतिज्ञ, एक प्रशासक और एक ऐसे स्वप्नदृष्टा थे जिन्होंने उस काल में एक सुदृढ़ राज्य की नींव रखी, जब दक्कन का समूचा क्षेत्र परस्पर संघर्षरत शक्तियों के बीच बिखरा हुआ था।
प्रारंभिक जीवन और संस्कारों की नींव
शिवाजी महाराज का बचपन साधारण नहीं था। उनकी माता जीजाबाई ने उन्हें न्याय, स्वाभिमान और जनसेवा के संस्कार दिए। तलवारबाजी, छापामार युद्धकला और दुर्ग-स्थापत्य में उनकी दीक्षा बचपन से ही आरंभ हो गई थी। ये अनुभव उनके नेतृत्व की आधारशिला बने।
उनके साहस का पहला बड़ा प्रमाण सन् सोलह सौ उनसठ में मिला, जब बीजापुर सल्तनत के सेनापति अफजल खान ने उन्हें वार्ता के बहाने बुलाकर धोखे से मारने की योजना बनाई। शिवाजी महाराज इस षड्यंत्र को पहले ही भाँप चुके थे। वे सतर्क होकर गए और अफजल खान को स्वयं मार गिराया। यह घटना उनकी दूरदर्शिता और रणनीतिक बुद्धि का जीवंत प्रमाण है।
सैन्य प्रतिभा और अदम्य साहस
शिवाजी महाराज ने पश्चिमी घाट की भौगोलिक विशेषताओं को अपने सैन्य अभियानों का आधार बनाया। तोरणा, राजगड़ और रायगड जैसे महत्त्वपूर्ण दुर्गों पर अधिकार कर उन्होंने अपने राज्य को सुरक्षित और सुसंगठित किया।
सन् सोलह सौ छियासठ में औरंगजेब की आगरा में कड़ी निगरानी से उनका पलायन इतिहास की अत्यंत साहसिक घटनाओं में गिना जाता है। मुगल दरबार की कड़ी चौकसी को चकमा देकर दक्कन वापस लौटना उनकी असाधारण बुद्धिमत्ता का परिचायक था।
समुद्री सुरक्षा के प्रति उनकी सोच उस युग में विलक्षण थी। उन्होंने कोंकण तट की रक्षा के लिए एक सशक्त नौसेना खड़ी की और अरब सागर में सिंधुदुर्ग जैसे जलदुर्ग का निर्माण कराया। यह केवल सैन्य कदम नहीं था, बल्कि व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा और राज्य की आर्थिक स्थिरता की दिशा में एक सुनियोजित कदम था।
कूटनीति और राजनीतिक समझ
शिवाजी महाराज केवल रणक्षेत्र में ही नहीं, कूटनीति की मेज पर भी उतने ही सक्षम थे। मुगलों, दक्कन सल्तनतों और क्षेत्रीय शक्तियों से उन्होंने आवश्यकतानुसार संधियाँ कीं। ये संधियाँ अस्थायी और व्यावहारिक थीं, जो एक अस्थिर राजनीतिक परिवेश में अपने राज्य को जीवित और सुरक्षित रखने की उनकी कला को दर्शाती थीं।
कुछ इतिहासकार मानते हैं कि मुगल सत्ता के साथ उनके लगातार टकराव ने दक्कन में दीर्घकालीन संघर्षों को जन्म दिया। किंतु यह भी सच है कि उनके बिना मराठा पहचान और स्वायत्तता की यह लड़ाई संभव ही नहीं होती।
इतिहासकारों की दृष्टि
विद्वान जदुनाथ सरकार ने शिवाजी महाराज को असाधारण सैन्य प्रतिभा और प्रशासनिक स्पष्टता वाला नेता माना। उनके अनुसार शिवाजी में गतिशीलता और सुदृढ़ रक्षा-व्यवस्था को एक साथ साधने की दुर्लभ क्षमता थी।
दूसरी ओर, मुगल दरबार के इतिहासकारों — खाफी खान और साकी मुस्तईद खान — ने अपनी रचनाओं में उन्हें साम्राज्यीय व्यवस्था को चुनौती देने वाला विद्रोही बताया। इन विरोधाभासी दृष्टिकोणों से यह स्पष्ट होता है कि सत्रहवीं शताब्दी का इतिहास-लेखन राजनीतिक पक्षधरता से कितना प्रभावित था।
प्रशासनिक दृष्टि और संस्थागत निर्माण
शिवाजी महाराज की महानता केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं थी। उन्होंने एक ऐसी शासन-व्यवस्था खड़ी की जो योग्यता पर आधारित थी। मंत्रियों और सेनापतियों की नियुक्ति कुल या वंश के आधार पर नहीं, बल्कि दक्षता के आधार पर होती थी। राजस्व सुधार, न्यायिक निगरानी और सुव्यवस्थित नागरिक प्रशासन ने उनके राज्य को टिकाऊ आधार दिया।
चौथ और सरदेशमुखी जैसी राजस्व व्यवस्थाओं ने आसपास के क्षेत्रों पर मराठा प्रभाव को सुदृढ़ किया। उनके उत्तराधिकारी राजाराम के शासनकाल में तमिलनाडु के गिंगी दुर्ग को मराठा शक्ति का दक्षिणी केंद्र बनाया गया, जो शिवाजी महाराज की राजनीतिक दूरदर्शिता की विरासत का विस्तार था।
मराठा साम्राज्य का उत्कर्ष
सन् सोलह सौ अस्सी में शिवाजी महाराज के निधन के बाद भी मराठा शक्ति लगातार बढ़ती रही। आरंभ में छत्रपति के प्रधानमंत्री के रूप में कार्य करने वाले पेशवा धीरे-धीरे सत्ता के केंद्र बन गए। बाजीराव प्रथम के नेतृत्व में मराठा सेनाएँ मालवा, बुंदेलखंड और दिल्ली की सीमाओं तक पहुँची थीं। एक क्षेत्रीय राज्य अखिल भारतीय महत्त्वाकांक्षाओं वाली महाशक्ति बन गया था।
सन् सत्रह सौ इकसठ में पानीपत की तीसरी लड़ाई में पराजय एक गहरा आघात था। किंतु इसके बावजूद मराठा संघ अठारहवीं शताब्दी की भारतीय राजनीति में एक निर्णायक शक्ति बना रहा। यह सब संभव हुआ उन प्रशासनिक और सैन्य नींवों के कारण, जो शिवाजी महाराज ने स्थापित की थीं।
सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक प्रासंगिकता
शिवाजी महाराज की स्मृति केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं है। महाराष्ट्र के घर-घर में उनके चित्र हैं। उनके दुर्ग — रायगड, तोरणा, सिंधुदुर्ग — लाखों लोगों के लिए आस्था और गौरव के केंद्र हैं। गुजराती, कन्नड़ और तमिल परिवारों में भी उनकी कथाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती हैं।
दक्षिण भारत में थंजावुर के मराठियों पर उनका सांस्कृतिक प्रभाव आज भी देखा जा सकता है। यह समुदाय तमिलनाडु में बसते हुए स्थानीय समाज में घुल-मिल गया, किंतु मराठा सांस्कृतिक पहचान को उसने सहेजे रखा।
आधुनिक भारत में उनकी विरासत की व्याख्या विभिन्न रूपों में होती है। एक वर्ग के इतिहासकार उन्हें हिंदू स्वाभिमान और मुगल साम्राज्यवाद के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रतीक मानते हैं। दूसरे वर्ग के विद्वान उन्हें दक्कन की सामाजिक-आर्थिक और क्षेत्रीय राजनीति के व्यापक संदर्भ में देखते हैं, जहाँ प्रशासनिक नवाचार धार्मिक व्याख्या से अधिक महत्त्वपूर्ण है। इन भिन्न दृष्टिकोणों से यह सिद्ध होता है कि शिवाजी महाराज का व्यक्तित्व आज भी जीवंत बहस का विषय है।
एक स्थायी विरासत
छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती केवल एक वीर योद्धा के स्मरण का अवसर नहीं है। यह प्रारंभिक आधुनिक भारत में सत्ता, वैधता और राज्य-निर्माण की जटिलताओं पर विचार करने का क्षण है।
उन्होंने जो दुर्ग बनाए, जो नौसेना खड़ी की, जो प्रशासनिक ढाँचा रचा — वह सब उनकी मृत्यु के बाद भी भारतीय इतिहास को दिशा देता रहा। उनका जीवन यह सिखाता है कि सच्चे नेतृत्व के लिए रणनीतिक दूरदर्शिता और संस्थागत निर्माण — दोनों एक साथ आवश्यक हैं।
उनकी विरासत आज भी उतनी ही प्रेरक है, जितनी विवादास्पद। और शायद यही उनकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक प्रामाणिकता है।
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