पिछली बार मैंने बात की थी पीर अली खान की… एक किताब बेचने वाले ने कैसे पटना में 1857 की क्रांति की आग जलाई। आज मैं एक और ऐसे नायक के बारे में बताऊंगा जिसकी कहानी इतिहास के पन्नों में कहीं खो गई… कनकलता बरुआ – असम की युवा शहीद!
एक चिंगारी जो क्रांति बनी
महज़ 17 साल की उम्र में इस गांव की बेटी ‘कनकलता बरुआ’ ने तिरंगा थामा और अंग्रेजों की गोलियों का सामना किया। जब तक उसकी सांसे चलती रही, उसका दिल आजादी के सपनों के लिए के धड़कता रहा। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उसने कहा, “अगर मैं अपने देश के लिए मरूं, मुझे गर्व होगा।” उसकी शहादत ने असम के युवाओं में जोश भरा। अधिकतर लोगों को कनकलता के बारे में नहीं जानते और खासकर आज की युवा पीढ़ी। ये लेख उसी महान क्रांतिकारी के बलिदान को समर्पित है, जिसका योगदान भारत को आज़ादी दिलाने में तो रहा, लेकिन कहीं न कहीं हम उसे भूल गए। इस लेख के माध्यम से, कनकलता की कहानी को अमर रखने का यह मेरा छोटा सा प्रयास है। कनकलता का बलिदान हमें याद दिलाता है कि छोटे से गांव की बेटी भी इतिहास बदल सकती है।
असम की मिट्टी में जन्मी एक जिद
असम के जिस बोरंगबारी गांव में कनकलता बरुआ का जन्म हुआ था, वहां सबकुछ बेहद सादा था… हरे-भरे खेत, बांस की झोपड़ियां, और उन पर मंडराता हुआ ब्रिटिश राज का साया। 22 दिसंबर, 1924 को इसी गांव में एक साधारण किसान परिवार में कनकलता ने आंखें खोलीं। उस वक्त शायद ही किसी ने सोचा हो कि यही लड़की एक दिन तिरंगा हाथ में लेकर सीधी ब्रिटिश गोलियों के सामने खड़ी होगी।
उनका परिवार ‘डोलकशरिया बरुआ’ कहलाता था, जिसकी जड़ें पुराने अहोम साम्राज्य से जुड़ी थीं। दादा घना कांता बरुआ गांव में एक जाने-माने शिकारी थे। कनकलता के दादा के कारण उनके परिवार का एक रुतबा था, लेकिन वह रुतबा कनकलता के बचपन को आसान नहीं बना सका।
जब वो महज़ पांच साल की थीं, तब मां का साया सिर से उठ गया। पिता कृष्ण कांता बरुआ, जो खुद एक किसान और स्वदेशी आंदोलन के समर्थक थे, उन्होंने दूसरी शादी करली। उसके बाद जब कनकलता तेरह साल की हुईं तो उन्होंने अपने पिता को भी खो दिया। नतीजा ये हुआ कि तीसरी कक्षा में ही किताबें बंद हो गईं। महज़ तेरह साल की बच्ची के कंधों पर परिवार के और छोटे बच्चों की ज़िम्मेदारी आ गई।
जब सवालों ने राह दिखाई
यह वो दौर था जब ज़्यादातर लड़कियों की ज़िंदगी घर की देहरी से बाहर नहीं जाती थी। लेकिन कनकलता की दुनिया धीरे-धीरे बदल रही थी। गांव की चौपालों में आज़ादी की फुसफुसाहटें तेज़ हो रही थीं। गांधीजी के विचार गांव तक पहुंच चुके थे। और इन सबके बीच कनकलता चुपचाप सबकुछ सोख रही थीं।
उनके चाचा, देवेंद्र नाथ बोरा, कांग्रेस से जुड़े हुए थे। घर में और आस-पास आज़ादी की बातें होती थीं, और कनकलता उन बातों से दूर नहीं रह सकीं। उनके भीतर कुछ पनपने लगा था… एक बेचैनी… एक सवाल कि क्या लड़कियां सिर्फ घर तक ही सीमित रहें? क्या वो देश की लड़ाई में शामिल नहीं हो सकतीं?
कनकलता ने ये सवाल खुद से नहीं, अपने समय से किया… और जवाब भी खुद ही चुना।
गांव, परिवार, जिम्मेदारियां… इन सबके बीच एक किशोरी ने अपने लिए एक रास्ता चुना… विरोध का, आज़ादी की मांग का। और वहीं से शुरू हुई उस लड़की की कहानी, जिसे आज भी ज़्यादातर लोग नाम से नहीं जानते, लेकिन जिसका बलिदान आज़ादी की मिट्टी में दर्ज है।
जब बचपन सिर्फ उम्र भर की थकान बन जाए
कनकलता का बचपन अगर एक शब्द में कहें तो… भारी था। वो बचपन जिसमें न खेल था, न कोई छांव और न ही माँ-बाप का साय। उनके उपर थीं सिर्फ जिम्मेदारियां… और वो भी बहुत जल्दी सिर पर आ गईं।
उनके पिता, कृष्ण कांता बरुआ, एक मेहनती किसान थे। दिन भर खेतों में पसीना बहाते, और दिल से स्वदेशी आंदोलन को मानते थे। शायद यही वजह थी कि देशभक्ति के बीज कनकलता के दिल में बहुत जल्दी पड़ गए।
लेकिन ज़िंदगी ने उन्हें एक के बाद एक झटके दिए। मां, कर्णेश्वरी बरुआ, जब चल बसीं तब कनकलता बस पांच साल की थीं। इतनी छोटी उम्र, और मां का जाना… उस अकेलेपन को शायद वो कभी कह नहीं पाईं।
हैरानी की बात ये थी कि इतने दुखों के बावजूद वो टूटी नहीं। उनकी आंखों में जो चमक थी, वो कम नहीं हुई। गांधीजी के विचारों ने उन्हें रास्ता दिखाया। और उनके चाचा, देवेंद्र नाथ बोरा ने उनकी सोच को दिशा दे दी।
ये वो पल थे जब कनकलता सिर्फ एक अनाथ लड़की नहीं रही। वो धीरे-धीरे उस लड़ाई की ओर बढ़ने लगी जो उसके वश से बहुत बड़ी थी… लेकिन उसका हौसला उससे भी बड़ा था।
कहते हैं न कि मंज़िलें उन्हें ही मिला करती हैं, जो उन्हें पाने का हौसला रखते हैं।
बेशक कनकलता अपनी आंखों से आजा़दी नहीं देख पाईं, लेकिन आज़ादी के लिए उनका बलिदान, उनकी क्रांतिकारी सोच अपने आप में आज़ादी थी। कनकलता उसी क्षण आज़ाद हो गईं थीं, जिस क्षण उन्होंने उनके मन में भारत की आज़ादी की चिंगारी भड़की।
जब असमिया बन गई आवाज़, और आवाज़ बन गया हथियार
कनकलता बरुआ के लिए असमिया भाषा सिर्फ शब्दों का ज़रिया नहीं थी… वो उनकी पहचान थी, उनकी आत्मा थी।
उनका गांव, उनकी मिट्टी, उनकी संस्कृति… सबकुछ इसी भाषा में सांस लेता था। घर से लेकर गांव की चौपाल तक, हर बात असमिया में होती। और यही भाषा धीरे-धीरे कनकलता की लड़ाई की ताकत बन गई।
हो सकता है उन्हें ज़्यादा पढ़ाई का मौका न मिला हो, हिंदी की थोड़ी-बहुत समझ रही हो जो कांग्रेस की सभाओं में काम आई… लेकिन जब वो असमिया में बोलती थीं, तो लोग रुककर सुनते थे। उनकी बातों में जो अपनापन था, जो जज़्बा था, वो किसी भी भाषण से ज्यादा असर करता।
गांव की औरतें, बुज़ुर्ग, किसान सब उन्हें सुनते थे, और धीरे-धीरे उनके साथ चलने लगे। असमिया में उन्होंने जो कहा, वो लोगों के दिल में उतर गया। यही वो जुड़ाव था जो कनकलता को सिर्फ एक युवती नहीं, बल्कि एक जननेता बना रहा था।
उनकी भाषा ने उनके संघर्ष को ज़मीन दी। और यही भाषा वो हथियार बन गई जिससे कनकलता ने अंग्रेज़ी सत्ता को चुनौती दी। वो बोलती थीं, और गांव की मिट्टी गूंज उठती थी।
देश को समर्पित जीवन
सिर्फ 17 साल की उम्र में कनकलता की पूरी दुनिया आजादी की लड़ाई बन चुकी थी। अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल के साथ-साथ वो लगातार स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय थीं। उनके पास खुद के सपनों, पढ़ाई या निजी जिंदगी के लिए कोई समय नहीं बचा था। उनके दिल में सिर्फ एक ही ख्वाब था… आज़ाद भारत। जहां आज उनकी उम्र के लड़के-लड़कियां पढ़ाई, करियर या शादी के बारे में सोचते हैं, वहीं कनकलता ने खुद को पूरी तरह देश को समर्पित कर दिया था। यही फैसला उन्हें आम लड़कियों आम युवाओं से अलग करता है। आज की युवा पीढ़ी उनके समर्पण से सीख सकती है कि कभी-कभी देश के लिए लिया गया एक साहसी कदम, पूरे जीवन को अमर बना देता है।
भारत छोड़ो आंदोलन की अगुआ
1942 का भारत छोड़ो आंदोलन उस समय पूरे देश में आग की तरह फैल रहा था, और कनकलता बरुआ उस लपट की चिंगारी बन चुकी थीं। गांधीजी के आदर्शों से प्रेरित होकर वह ‘मृत्यु बाहिनी’ नामक एक युवा क्रांतिकारी संगठन से जुड़ गईं। इस समूह में शामिल होने की न्यूनतम उम्र 18 थी, लेकिन 17 साल की कनकलता ने अपने साहस से सभी को प्रभावित किया।
20 सितंबर 1942 को उन्होंने असम के गोहपुर थाने पर तिरंगा फहराने की योजना बनाई। उनके साथ निहत्थे ग्रामीण भी थे। जब पुलिस अधिकारी रेबती महन सोम ने उन्हें चेतावनी दी, तो भी वह नहीं रुकीं। वो तिरंगा हाथ में लिए आगे बढ़ती रहीं और तभी सिपाही गोगल चिपाही ने उन्हें गोली मारी, लेकिन शहीद होने के बाद भी उन्होंने झंडे को जमीन पर नहीं गिरने दिया। उनके पीछे-पीछे मुकुंद काकोटी ने झंडा थामा, लेकिन वो भी शहीद हो गए। बेशक घटना में कई जानें गई, पर हौसले नहीं। उसी दिन उनके बलिदान से रमपति राजखोवा द्वारा उस थाने पर तिरंगा लहराया गया। कनकलता और उनके साथियों का यह बलिदान आज भी असम की मिट्टी में गूंजता है… चुपचाप, लेकिन बुलंद।
अमर शब्द जो गूंजते हैं
अपनी आखिरी जुलूस से पहले कनकलता ने कहा, “अगर मैं अपने देश के लिए मरूं, मुझे गर्व होगा।” यह सुनहरा वाक्य उनके नन्हे दिल की ताकत दिखाता है। जुलूस के दौरान बोले गए ये शब्द उनकी देशभक्ति को दर्शाते हैं। उनके शब्द सरल लेकिन गहरे थे, जो उनके साथियों को प्रेरित करते थे। आज भी ये शब्द असम के इतिहास में गूंजते हैं। नौजवानों के लिए यह एक चुनौती है… साहस उम्र से नहीं, विश्वास से आता है। इस तरह, कनकलता की आवाज आज भी जीवित है। उनके शब्द हमें सिखाते हैं कि सही के लिए खड़ा होना कितना जरूरी है, चाहे रास्ता कितना भी मुश्किल हो।
एक अविस्मरणीय साहस की याद
कनकलता की एक घटना उनकी दृढ़ता को दर्शाती है। जुलूस से पहले उन्होंने अपने भाई-बहनों से कहा कि शायद वह न लौटें। घर के काम निपटाकर वह बोरंगबारी चौराहे पर स्वयंसेवकों से मिलीं। उनकी हिम्मत ने नेताओं को प्रभावित किया, और उन्हें महिला समूह की अगुआ बनाया गया। परिवार को अलविदा कहकर खतरे की ओर बढ़ना उनकी ताकत दिखाता है। वह एक विद्रोही बनीं, जो महिलाओं के लिए प्रेरणा बनीं।
असम के दिल में हमेशा याद
कनकलता का बलिदान आज भी सम्मानित है। भारतीय तटरक्षक बल का जहाज, आईसीजीएस कनक लता बरुआ, 1997 में उनके नाम पर रखा गया, जिसे 2020 में फिर से कमीशन किया गया। 2011 में गौरीपुर में उनकी मूर्ति स्थापित हुई। कनकलता बरुआ पुरस्कार असम की महिलाओं को सम्मानित करता है। तेजपुर का कनकलता उद्यान उनकी याद में है। उनकी कहानी फिल्मों ‘इपाह फुलिल इपाह शोरिल’ और ‘पुरब की आवाज’ में बयां हुई। उन्हें असम की रानी लक्ष्मीबाई कहा जाता है। ये सम्मान हमें याद दिलाते हैं कि हमें भारत की आजादी के लिए किए गए बलिदानों को नहीं भूलना चाहिए।
एक अमर विरासत
20 सितंबर, 1942 को कनकलता की जिंदगी खत्म हुई, जब 17 साल की उम्र में उन्हें तिरंगा थामे गोली मारी गई। उनका शव बोरंगबारी लाया गया और उसी रात अंतिम संस्कार हुआ। उनकी जिंदगी छोटी थी, लेकिन उनका असर विशाल था। वह असम की महिलाओं और युवाओं के लिए प्रेरणा बनीं। असम की युवा शहीद कनकलता बरुआ हमें दिखाती हैं कि हीरो छोटे गांवों से भी निकल सकते हैं। कनकलता का साहस हमें प्रेरित करता है कि सही के लिए खड़े हों, जैसा उन्होंने अपनी छोटी सी जिंदगी में किया।


