ब्रिटेन की संस्कृति मंत्री लिसा नैन्डी ने एक बयान देकर भारत में फिर से कोहिनूर हीरे की बहस को हवा दे दी है। इस 105.6 कैरेट के बेशकीमती हीरे को भारत को लौटाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि इसे पूरी तरह लौटाने के बजाय “साझा उपयोग” का मॉडल अपनाया जाना चाहिए। ये प्रस्ताव भारत-ब्रिटेन सांस्कृतिक सहयोग समझौते के तहत सामने आया है, लेकिन इसने देश भर में आशा, नाराज़गी और न्याय की मांगों को फिर से जगा दिया है। भारत के लिए कोहिनूर सिर्फ एक हीरा नहीं है, यह उस लूट और अपमान का प्रतीक है जो औपनिवेशिक शासन के दौर में झेला गया।
कोहिनूर: इतिहास में डूबा रत्न
कोहिनूर का इतिहास सदियों पुराना है। यह दक्षिण भारत की गोलकुंडा खदानों से निकला था और धीरे-धीरे मुग़ल बादशाहों और सिख शासक महाराजा रणजीत सिंह के ख़ज़ानों की शोभा बना। नादिर शाह जैसे फ़ारसी आक्रमणकारी इसकी चमक से इतने प्रभावित हुए कि इसे ‘कोहिनूर’ यानी ‘रोशनी की पहाड़ी’ नाम दे दिया।
लेकिन 1849 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने पंजाब पर कब्ज़ा किया और महज दस साल के महाराजा दलीप सिंह को मजबूर किया गया कि वो इसे ब्रिटिश महारानी को “भेंट” करें। तभी से कोहिनूर ब्रिटेन में है, रानी मां के ताज में जड़ा हुआ और लंदन के टावर में सजा हुआ। इतिहासकार अनीता शर्मा कहती हैं, “यह कोई लेन-देन नहीं था, यह सत्ता की लूट थी, जिसने भारत की गरिमा और संप्रभुता को छीना।”
ब्रिटेन का प्रस्ताव: सांझा उपयोग या फिर एक और बहाना?
लिसा नैन्डी की भारत यात्रा सिर्फ व्यापारिक समझौते तक सीमित नहीं रही। उन्होंने भारत के संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के साथ एक सांस्कृतिक समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसमें भारतीय पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण और कोहिनूर जैसे ऐतिहासिक धरोहरों पर साझा पहुंच की बात शामिल है।
उनका कहना है कि यह “हमारी साझा विरासत का उत्सव” है, जिसमें हीरे को भारत लाने के लिए अस्थायी प्रदर्शनियों का आयोजन किया जा सकता है। यूरोप में भी ऐसे मॉडल अपनाए गए हैं, जैसे ग्रीस द्वारा पार्थेनन मार्बल्स पर साझा प्रदर्शन की मांग। भारत में यह विचार कुछ विद्वानों को व्यावहारिक लगा है, लेकिन कई लोगों के लिए यह “न्याय से बचने की चाल” जैसी लगती है।
इतिहासकार प्रिया मेनन कहती हैं, “साझा उपयोग एक ऐसा समझौता है जो उपनिवेशवाद के नैतिक कर्ज से बचने की कोशिश करता है।”
भारत की पुकार: कोहिनूर को वापस लाओ
सोशल मीडिया से लेकर संसद तक, कोहिनूर को भारत वापस लाने की मांग ज़ोर पकड़ रही है। #ReturnKohinoor जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, और हज़ारों लोगों ने एक ऑनलाइन याचिका पर हस्ताक्षर कर सरकार से इस दिशा में गंभीर पहल की मांग की है।
कोहिनूर सिर्फ एक हीरा नहीं है, यह भारत की आत्मा का हिस्सा है। आंध्र प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में इसकी ऐतिहासिक जड़ें हैं, और लोककथाओं में इसे शक्ति और भाग्य से जोड़ा गया है। मुंबई के सामाजिक कार्यकर्ता रोहन देसाई कहते हैं, “कोहिनूर भारत की मिट्टी का है, न कि किसी ब्रिटिश म्यूज़ियम का। साझा उपयोग तो ऐसा है जैसे हमसे हमारी ही धरोहर उधार ली जा रही हो।”
राजनयिक रास्ता: इतिहास का हिसाब या भविष्य का समझौता?
कोहिनूर की बहस सिर्फ एक हीरे की नहीं, बल्कि भारत-ब्रिटेन संबंधों की परीक्षा है। एक ओर व्यापारिक रिश्ते हैं, दूसरी ओर ऐतिहासिक न्याय की उम्मीद। ब्रिटेन के कानून, खासकर जो क्राउन ज्वेल्स की रक्षा करते हैं, इस वापसी को और भी मुश्किल बनाते हैं। अगर कोहिनूर लौटा दिया गया, तो इससे और भी artefacts, जैसे अमरावती मार्बल्स या टीपू सुल्तान की तलवारों की वापसी की मांगें उठ सकती हैं।
हालांकि दुनिया भर में यह बदलाव आ रहा है। नाइजीरिया के बेनिन ब्रॉन्ज़ और इथियोपिया की मगतला की धरोहरों को लौटाया गया है। भारत को भी उम्मीद है कि कोहिनूर की अस्थायी प्रदर्शनी दिल्ली या अमृतसर में लग सकती है, जहां उसके इतिहास और महत्व को विस्तार से बताया जा सके।
कोहिनूर आज भी भारत के अतीत का आइना है और उसके भविष्य की दिशा का संकेत। ब्रिटेन का साझा उपयोग वाला प्रस्ताव भले ही कुछ लोगों को तार्किक लगे, लेकिन ज़्यादातर भारतीयों के लिए यह दिल से जुड़ा मामला है। जब तक कोहिनूर भारत की धरती पर नहीं लौटता, तब तक न्याय अधूरा ही रहेगा।
लेकिन यह बहस एक बड़ा सवाल छोड़ जाती है, क्या सांस्कृतिक कूटनीति से हम औपनिवेशिक घावों को भर सकते हैं?
कोहिनूर हीरे से जुड़े मुख्य तथ्य
| विशेषता | विवरण |
| मूल स्थान | गोलकुंडा खदान, दक्षिण भारत |
| वजन | 105.6 कैरेट |
| ऐतिहासिक मालिक | मुग़ल, फ़ारसी आक्रांता, सिख साम्राज्य |
| कैसे गया ब्रिटेन | 1849 में लाहौर संधि के तहत |
| वर्तमान स्थान | लंदन के टॉवर में, रानी मां के मुकुट में |
| नया प्रस्ताव | अप्रैल 2025: ‘साझा उपयोग’ का सुझाव |


