दोस्तों, आज के दौर में अगर आप गौर करें, तो समाज में दो तरह के लोग दिखते हैं। एक वो, जो बेहद गरीब हैं, भीख माँगकर अपना गुजारा करते हैं, और बस अपनी रोज़ की रोटी की फिक्र में लगे रहते हैं। उन्हें ना आलीशान महल चाहिए, ना मखमल के गद्दे, ना ही चकाचौंध भरी ज़िंदगी। वे अपनी सादगी में, अपनी छोटी-सी दुनिया में खुश हैं। और दूसरी तरफ हैं वो लोग, जो गरीबों का हक छीनकर, उनका गला दबाकर पैसों से लबालब हैं, लेकिन उनकी पैसे की भूख कभी खत्म नहीं होती।
इसी थीम को लेकर बनी है शेखर कम्मुला की फिल्म कुबेरा। ये फिल्म आज के समाज का एक कड़वा और भयावह चेहरा तो सामने लाती है, लेकिन इसका कोई ठोस हल नहीं देती। और सच कहें, तो ऐसी कहानियाँ हम पहले भी कई बार पर्दे पर देख चुके हैं। फिर भी, आइए इस फिल्म की कहानी को थोड़ा करीब से देखते हैं।
फिल्म की शुरुआत मुंबई से होती है, जहाँ हमें एक तेल रिग दिखाया जाता है। यहाँ सागर मंथन तेल भंडार प्रोजेक्ट चल रहा है। इस रिग पर काम करने वाला एक मजदूर तेल की एक संभावना खोज लेता है और अपने इंचार्ज को बताता है। इंचार्ज ये खबर अपने मालिक, निरज मित्रा (जिम सरभ) तक पहुँचाता है। जिम सरभ को फिल्म में एक बेहद अमीर बिजनेसमैन के रूप में दिखाया गया है, जिसके कई बड़े कारोबार हैं।
निरज मित्रा इस मौके को भुनाने के लिए एक बड़े राजनेता, मंत्री सितप्पा से मिलता है। वह चाहता है कि ये प्रोजेक्ट उसे निजी तौर पर मिल जाए। सितप्पा इसके बदले अपनी पार्टी के लिए एक लाख करोड़ रुपये की डील फिक्स करता है। निरज इस सौदे को मान लेता है। लेकिन कोई सबूत न बचे, इसलिए वह रिग पर मौजूद सभी मजदूरों को मरवा देता है और रिग में विस्फोट करवा देता है।
एक लाख करोड़ का खेल
अब निरज मित्रा के सामने चुनौती है इस एक लाख करोड़ रुपये को सही जगह पहुँचाने की, जो कोई आसान काम नहीं। यहाँ कहानी में ट्विस्ट आता है। निरज का पिता (दलीप ताहिल) उसे एक सीबीआई अधिकारी का नाम सुझाता है, जो इस काम को बखूबी अंजाम दे सकता है, लेकिन वह जेल में बंद है।
यहाँ हमें मिलते हैं नागार्जुन, जो सीबीआई अधिकारी दीपक के किरदार में हैं। दीपक पिछले पाँच साल से जेल में है। उसकी एक पत्नी और बेटी है, जिनसे वह बहुत प्यार करता है। निरज, दीपक से जेल में मिलता है और उसे अपने साथ काम करने का ऑफर देता है। दीपक पहले तो मना कर देता है, लेकिन जब कोर्ट में उसकी सुनवाई होती है और उसे 10 साल की और सजा सुनाई जाती है, तो वह मजबूरी में निरज का ऑफर स्वीकार कर लेता है।
शर्त ये है कि दीपक, निरज के हर काम को बिना सवाल किए करेगा। निरज उसे पूरा प्लान समझाता है और सारा काम दीपक के हवाले कर देता है।
काले को सफेद करने की जुगत
दीपक को अब एक लाख करोड़ रुपये को सही ठिकाने लगाना है। वह प्लान बनाता है कि 50 हजार करोड़ काले धन से और 50 हजार करोड़ सफेद धन से ट्रांसफर होंगे। इसके लिए उसे चार ऐसे लोग चाहिए, जो ना पढ़े-लिखे हों और ना ही कोई सवाल करें।
रास्ते में उसकी नजर कुछ भिखारियों पर पड़ती है, और उसे आइडिया आता है कि भिखारियों के नाम पर फर्जी स्विस बैंक खाते खोलकर काले धन को सफेद किया जा सकता है। निरज को ये आइडिया पसंद आता है, और फिर शुरू होता है भिखारियों को ढूँढने का सिलसिला।
देवा की एंट्री
यहाँ कहानी में धनुष की धमाकेदार एंट्री होती है, जो भिखारी देवा का किरदार निभाते हैं। देवा भीख माँगकर अपना पेट भरता है। निरज के लोग उसे काम का लालच देकर अपने साथ ले जाते हैं। साथ ही, तीन और भिखारी—खेलू, खुशबू और दिव्या—को भी पकड़कर निरज के गेस्ट हाउस में लाया जाता है, जहाँ उनकी ट्रेनिंग शुरू होती है।
लेकिन निरज का इरादा साफ है—वह कोई सबूत नहीं छोड़ना चाहता। उसका प्लान है कि काम खत्म होते ही इन चारों भिखारियों को मार दिया जाए। ट्रेनिंग के बाद चारों के स्विस खाते खोले जाते हैं, और प्रत्येक के खाते में 10,000 करोड़ रुपये डाल दिए जाते हैं।
सबसे पहले खेलू के खाते से पैसे ट्रांसफर करके उसे मार दिया जाता है। फिर दिव्या का नंबर आता है, और उसके बाद खुशबू, लेकिन दीपक खुशबू को बचा लेता है, क्यूंकी खुशबू एक गर्भवती महिला है
देवा का भागना और पीछा
अब बारी आती है देवा की। उसके खाते से भी पैसे ट्रांसफर हो जाते हैं, और उसे मारने की तैयारी होती है। लेकिन तभी दीपक का फोन आता है, जो उसे मारने से मना करता है, क्योंकि किसी वजह से देवा का ट्रांसफर पूरा नहीं हो पाता। मौका पाकर देवा वहाँ से भाग निकलता है।
यहीं से शुरू होता है एक लंबा और थोड़ा बेवजह सा पीछा करना, जिसने फिल्म को डेढ़ घंटे तक खींच दिया। पूरी फिल्म में निरज का गैंग और दीपक, देवा को पकड़ने की कोशिश में लगे रहते हैं।
रश्मिका की एंट्री और अनावश्यक ट्रैक
इसी बीच रश्मिका मंदाना की एंट्री होती है, जो समीरा का किरदार निभाती हैं। समीरा दिल्ली से अपने प्रेमी के कहने पर मुंबई आती है, लेकिन उसका प्रेमी उसे धोखा दे देता है। मुंबई के कॉटन ग्रीन स्टेशन पर रोती हुई समीरा को देवा मिलता है, और फिर शुरू होता है उनका पकड़म-पकड़ाई का खेल। सच कहें, तो रश्मिका का किरदार फिल्म में कुछ खास जोड़ नहीं पाता। वे ज्यादातर समय बस भागती नजर आती हैं।
छोटे लेकिन प्रभावी किरदार
सयाजी शिंदे एक पुलिस इंस्पेक्टर के रोल में हैं, लेकिन उनका रोल बेहद छोटा है। दो-तीन सीन के बाद दीपक उन्हें मार देता है। फिर भी, जितने समय वे पर्दे पर हैं, अपना काम बखूबी निभाते हैं।
क्लाइमेक्स और ट्विस्ट
फिल्म के अंत में देवा को सारा माजरा समझ आ जाता है। यहाँ एक ट्विस्ट आता है, जहाँ देवा को पता चलता है कि उसके पास ढेर सारा पैसा है, और वह बड़े-बड़े शहरों के भिखारियों की जिंदगी सुधारना चाहता है । वह यही शर्त निरज और दीपक के सामने रखता है।
फिल्म का अंत आते-आते दीपक भी मर जाता है, और मरने से पहले वह देवा से कहता है कि वह उसका बचपन का दोस्त (भाई) है। लेकिन इस ट्विस्ट का कोई खास मतलब नहीं बनता, और ये फिल्म में बेमानी-सा लगता है।
अभिनय और तकनीकी पक्ष
अगर बात करें कलाकारों की, तो नागार्जुन ठीक-ठाक थे, लेकिन कुछ खास नहीं। रश्मिका ने हमेशा की तरह औसत अभिनय किया… वो बस फिल्म में थीं, और कुछ खास नहीं कर पाईं। धनुष और जिम सरभ ने अपने दमदार अभिनय से दर्शकों का ध्यान खींचा। खासकर धनुष का भिखारी वाला किरदार और जिम का खलनायक रोल काफी प्रभावी रहा।
फिल्म की कहानी शेखर कम्मुला और चैतन्य पिंगली ने लिखी है। निर्देशन और पटकथा भी शेखर कम्मुला की है। संवाद शेखर और अंगोरम पन्नीरसेल्वम ने लिखे हैं। फिल्म को प्रोड्यूस किया है सुनिल नारंग, पुस्कुर राम मोहन राव और अजय कैकाला ने, और प्रोडक्शन कंपनी है श्री वेंकटेश्वर सिनेमाज एलएलपी।
फिल्म का बजट 120 करोड़ रुपये है, जो काफी ज्यादा लगता है। शायद ये बजट ज्यादातर कलाकारों की फीस में गया हो, क्योंकि फिल्म में ऐसा कुछ खास नहीं दिखता, जो इतने बड़े बजट को जायज ठहराए।
संगीत की बात करें, तो देवी श्री प्रसाद का संगीत बस ठीक-ठाक है, कुछ खास नहीं। सिनेमाटोग्राफी निकेत बोम्मिरेड्डी ने की है, और संपादन कार्तिका श्रीनिवास का है। हिन्दी डब फिल्म में 2 गाने है, वहीं तेलगु में 4 गाने हैं और तमिल में 2 गाने हैं।
कमियाँ और खामियाँ
फिल्म के डायलॉग बहुत प्रभावी नहीं हैं। कुछ सीन बेतुके लगते हैं, जैसे देवा का टूटी उंगलियों वाले हाथ से पेड़ की डाल पकड़कर लटकना। कहानी में भी कुछ नयापन नहीं है। हिंदी सिनेमा में गरीबी और सामाजिक असमानता पर पहले भी कई फिल्में बन चुकी हैं, जैसे शिवाजी। कुबेरा में वो ताजगी या गहराई नहीं दिखती, जो दर्शकों को बाँधे रखे। फिल्म की लंबाई, औसतन ज़्यादा है, करीब-करीब सवा तीन घंटे की इस फिल्म में वो खासपन नहीं है जो इस फिल्म को देखने के लिए मजबूर कर सके।
अंतिम विचार
कुल मिलाकर, कुबेरा एक बार देखने लायक तो है, लेकिन इसे देखकर ऐसा नहीं लगता कि आप कुछ नया या यादगार देख रहे हैं। नागार्जुन और धनुष जैसे सितारों से आप उम्मीद करते हैं कि फिल्म धमाकेदार होगी, लेकिन ये उस मुकाम तक नहीं पहुँच पाती। ऊपर से, फिल्म का रिलीज टाइमिंग भी ठीक नहीं है, क्योंकि इसके सामने आमिर खान की ‘सितारे ज़मीन पर’ रिलीज हुई है, जो शायद इसे पछाड़ दे।
मेरे हिसाब से, मैं इस फिल्म को 2 स्टार दूँगा। ये समाज का एक कड़वा सच तो दिखाती है, लेकिन उसका कोई हल नहीं देती, और ना ही वो ताकतवर प्रभाव छोड़ती है, जो एक अच्छी फिल्म को चाहिए।
तो दोस्तों, आप इसे एक बार देख सकते हैं, लेकिन ज्यादा उम्मीदें न रखें!
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