क्या आप भी पनीर लवर हैं?
अगर हाँ, तो यह लेख खासतौर पर आपके लिए है। शायद ही कुछ लोग होंगे जिन्हें पनीर पसंद न हो बहुसंख्यक लोगों को तो पनीर बेहद पसंद होता है। जब भी हम रेस्टोरेंट जाते हैं, स्टार्टर में पनीर ही मंगवाते हैं, और अगर आप शाकाहारी हैं, तो मुख्य भोजन में भी पनीर से जुड़ा कोई न कोई व्यंजन ज़रूर ऑर्डर करते हैं।
लेकिन अगर मैं आपसे कहूँ कि जो पनीर आप रेस्टोरेंट में खा रहे हैं, वह शायद पनीर हो ही नहीं तो?
जी हाँ, सही सुना आपने। महाराष्ट्र सरकार ने एक ऐसा फैसला लिया है जिसने राज्यभर के पनीर-प्रेमियों को चौंका दिया है। सरकार ने “एनालॉग पनीर” पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है इसका मतलब है कि इसका निर्माण, बिक्री, भंडारण और परिवहन, सब कुछ अब अवैध माना जाएगा।
अब सवाल यह है कि यह एनालॉग पनीर होता क्या है। सरल भाषा में समझें तो यह एक ऐसा उत्पाद है जो दिखने में बिल्कुल पनीर जैसा लगता है, बनावट और स्वाद भी काफी हद तक मिलता-जुलता है, लेकिन यह दूध से नहीं बनता। इसकी जगह पाम ऑयल जैसे वनस्पति तेल, मिल्क पाउडर और स्टार्च जैसी सस्ती सामग्री का इस्तेमाल होता है।
यानी जिस पनीर को आप “हेल्दी प्रोटीन सोर्स” समझकर खाते हैं, हो सकता है वह केवल एक नकली नकल हो जिसमें न वह पोषण हो जो असली पनीर में होता है, न वह शुद्धता।
यह फैसला महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी एफडीए ने लिया है, और आदेश 30 जुलाई को एफडीए आयुक्त तुकाराम मुंढे ने जारी किया। आदेश के साथ ही यह प्रतिबंध तत्काल प्रभाव से लागू हो गया यानी अब कोई भी रेस्टोरेंट, होटल या क्लाउड किचन इसे न बना सकता है, न बेच सकता है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि महाराष्ट्र देश का पहला राज्य नहीं है जिसने यह कदम उठाया। छत्तीसगढ़ पहले ही यह प्रतिबंध लगा चुका है, और अब महाराष्ट्र दूसरा राज्य बन गया है जिसने अपने उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य को लेकर इतना सख्त रुख अपनाया है।
यह प्रतिबंध खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 की धारा 30(2)(a), धारा 18 और धारा 29 के तहत लगाया गया है। यही वह कानून है जो देश में खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता को नियंत्रित करता है।
एफडीए ने साफ कर दिया है कि अगर कोई भी व्यक्ति या प्रतिष्ठान एनालॉग पनीर को असली डेयरी पनीर बताकर बेचता है, तो इसे उपभोक्ताओं को गुमराह करना माना जाएगा। यह धारा 24 के तहत एक अनुचित व्यापारिक गतिविधि की श्रेणी में आता है, और ऐसे मामलों में कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
अब बात करते हैं सज़ा की, क्योंकि यही सबसे ज़्यादा चर्चा में है। अगर कोई भी इस कानून को तोड़ते हुए पकड़ा जाता है, तो उसे छह महीने तक की जेल और एक लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।
लेकिन अगर किसी असुरक्षित खाद्य पदार्थ के सेवन से किसी व्यक्ति की मौत हो जाती है, तो सज़ा और भी सख्त हो जाती है आजीवन कारावास और कम से कम दस लाख रुपये का जुर्माना। यह दिखाता है कि सरकार इस मुद्दे को कितनी गंभीरता से ले रही है।
इस फैसले के पीछे सिर्फ एक दिन की सोच-विचार नहीं है। यह मुद्दा पिछले साल महाराष्ट्र विधानसभा में भी उठाया गया था, जब कई विधायकों ने एनालॉग पनीर पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। अब जाकर सरकार ने उस दिशा में यह बड़ा कदम उठाया है।
एफडीए की टीमें अब पूरे महाराष्ट्र में होटलों, रेस्टोरेंट्स, कैटरर्स और क्लाउड किचन पर औचक छापेमारी करेंगी। निरीक्षण के दौरान पहले भी यह देखा गया है कि एनालॉग पनीर बिना मूल पैकेजिंग, सही लेबल, इनवॉइस या बैच पहचान के परिवहन हो रहा था, जिससे इसका स्रोत पता करना मुश्किल हो जाता था।
यही वजह है कि एफडीए इस बार केवल मिसब्रांडिंग पर नहीं, बल्कि पूरे उत्पाद की आपूर्ति श्रृंखला पर ही शिकंजा कस रहा है।
लेकिन यहाँ एक मोड़ है जो शायद आपको पता न हो। यह प्रतिबंध स्थायी नहीं है। खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के तहत किसी भी वस्तु पर प्रतिबंध केवल एक साल के लिए लगाया जा सकता है, और खुद एफडीए के एक अधिकारी ने माना है कि उनके पास पूर्ण या स्थायी प्रतिबंध लगाने का कानूनी अधिकार नहीं है।
यानी एक साल बाद इस प्रतिबंध को नवीनीकृत करना होगा, या फिर सरकार को एक नया, अधिक मज़बूत कानून बनाना होगा अगर वह इसे हमेशा के लिए रोकना चाहती है। फिलहाल के लिए, अगला एक साल महाराष्ट्र के रेस्टोरेंट्स और उपभोक्ताओं दोनों के लिए एक तरह की परीक्षा अवधि है।
तो अगली बार जब आप किसी रेस्टोरेंट में पनीर टिक्का या पनीर बटर मसाला ऑर्डर करें, तो एक बार ज़रूर सोचिए कहीं आप असली पनीर के नाम पर कुछ और तो नहीं खा रहे।
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