भारत में विवाह टूटने के बाद जो होता है वह अक्सर न्याय नहीं होता। अदालतें, नोटिस, वर्षों की सुनवाई और एक ऐसा क़ानूनी ढाँचा जो दशकों पुराने समाज की कल्पना पर टिका है। प्रीनप्शियल एग्रीमेंट यानी विवाह-पूर्व वित्तीय समझौते को क़ानूनी मान्यता देना एक छोटी सी शुरुआत है। पर यह शुरुआत बहुत ज़रूरी है और बहुत देर हो चुकी है।
विवाह को भारत में एक पवित्र सामाजिक संस्था माना जाता है। पर जब यही रिश्ता टूटता है तो जो सामने आता है वह बहुत कुछ और होता है। अदालतें, नोटिस, मुक़दमे, साल-दर-साल की सुनवाई। और इन सबके बीच दोनों तरफ़ के लोग टूटते रहते हैं।
प्रीनप्शियल एग्रीमेंट यानी विवाह से पहले किया गया वित्तीय समझौता। भारत में इसकी कोई क़ानूनी मान्यता नहीं है। इसके लिए कोई केंद्रीय क़ानून नहीं बना। कुछ अदालतें तो इसे सार्वजनिक नीति के ख़िलाफ़ भी मान लेती हैं। पर दुनिया के बाक़ी देश इस सवाल से बहुत पहले निपट चुके हैं।
दुनिया ने पहले सोचा
अमेरिका ने १९८३ में यूनिफ़ॉर्म प्रीमैरिटल एग्रीमेंट एक्ट पारित किया। इसके पीछे सोच सीधी थी कि दो वयस्क अगर स्वेच्छा से एक क़ानूनी रिश्ते में बंध रहे हैं तो उसकी आर्थिक शर्तें पहले से तय करने का हक़ उन्हें मिलना चाहिए। जर्मनी और फ़्रांस में विवाह-पूर्व संपत्ति व्यवस्था पहले से चलती आई है। ब्रिटेन में भले ही इसके लिए अलग क़ानून नहीं है लेकिन वहाँ के सर्वोच्च न्यायालय ने २०१० में Radmacher v Granatino मामले में यह तय किया कि दोनों पक्षों की सहमति से बना ऐसा समझौता निर्णायक महत्त्व रखता है।
यह पूरी सोच एक ही बात पर टिकी है। स्वायत्तता। दो जानकार और सहमत वयस्कों के बीच का समझौता जिसे राज्य बिना किसी ठोस कारण के नज़रअंदाज़ न करे।
जो बात अक्सर छूट जाती है वह यह है कि इन देशों में यह व्यवस्था किसी रातोंरात नहीं आई। दशकों की अदालती नज़ीरें थीं, बहसें थीं और तब जाकर क़ानून बना। भारत में वह बहस अभी शुरू भी नहीं हुई है।
गोवा की चुप्पी में एक जवाब है
भारत में ही एक उदाहरण है जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। गोवा में १८६७ का पुर्तगाली सिविल कोड अब भी लागू है। यह कोड गोवा के भारतीय संघ में विलय के बाद भी वहाँ की व्यक्तिगत और पारिवारिक विधि पर लागू रहा। इसके अंतर्गत दंपती विवाह से पहले अपनी संपत्ति व्यवस्था चुन सकते हैं।
डिफ़ॉल्ट रूप से विवाह के बाद की संपत्ति साझा होती है लेकिन दोनों पक्षों के पास अलग व्यवस्था का विकल्प भी है। पूरी संपत्ति की साझेदारी का विकल्प भी है और संपूर्ण अलगाव का भी।
यह कोई आदर्श व्यवस्था नहीं है। गुज़ारे-भत्ते पर यह कोड ख़ामोश है और वहाँ भी पेचीदगियाँ हैं। लेकिन इसने एक बात साबित कर दी है जो ज़रूरी थी। गोवा के परिवार इस व्यवस्था से टूटे नहीं। समाज नहीं बिखरा। विवाह कोई व्यापारिक सौदा नहीं बन गया। जो डर अक्सर इस बहस में सामने आता है कि आर्थिक शर्तें पहले से तय करना रिश्ते की पवित्रता को नष्ट कर देगा, वह डर गोवा में सच नहीं निकला।
बाक़ी भारत के पास यह विकल्प आज भी नहीं है। और इसकी कोई ठोस वजह किसी ने आज तक नहीं दी।
भारत एकरंगी नहीं है
भारत को हमेशा से पितृसत्तात्मक मान लेना एक आसान बात है। पर इतिहास थोड़ा और जटिल है।
मेघालय की खासी और गारो जनजातियाँ मातृवंशीय हैं। संपत्ति माँ की तरफ़ से चलती है और सबसे छोटी बेटी पैतृक घर की उत्तराधिकारी होती है। केरल के नायर समुदाय में मरुमक्कत्तायम प्रथा थी जहाँ संपत्ति किसी पुरुष के अपने बच्चों को नहीं बल्कि उसकी बहन के बच्चों को जाती थी। यह व्यवस्था बीसवीं सदी के मध्य तक बड़ी संपत्तियों पर लागू रही जब तक विधायी सुधारों ने इसे बदला। कर्नाटक के तटीय क्षेत्रों और पूर्वोत्तर भारत के कई हिस्सों में भी ऐसी परंपराएँ मिलती हैं जहाँ महिलाओं की आर्थिक स्थिति काफ़ी मज़बूत रही है।
तो एक ऐसा क़ानूनी ढाँचा जो पत्नी को हमेशा और हर जगह आर्थिक रूप से कमज़ोर मान ले, वह भारत की पूरी तस्वीर नहीं है। यह बात असहज करती है लेकिन इसे कहना ज़रूरी है।
क़ानूनों की भीड़ में आदमी
भारत में भरण-पोषण और गुज़ारे-भत्ते के लिए एक नहीं बल्कि कई क़ानून एक साथ लागू होते हैं।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा १४४ के तहत तलाक़ की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही मजिस्ट्रेट भरण-पोषण का आदेश दे सकता है। हिंदू विवाह अधिनियम १९५५ में तलाक़ के दौरान और बाद में गुज़ारे-भत्ते का प्रावधान है। हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम १९५६ एक अलग दायित्व बनाता है। घरेलू हिंसा अधिनियम २००५ के तहत आर्थिक राहत और अंतरिम भरण-पोषण का एक और रास्ता है। और फिर मुस्लिम, ईसाई तथा पारसी समुदायों के अपने-अपने व्यक्तिगत क़ानून भी हैं।
इन क़ानूनों को पढ़कर अंदाज़ा नहीं होता कि ज़मीन पर क्या होता है। एक ही मामले में इनमें से कई क़ानून एक साथ अलग-अलग अदालतों में लगाए जा सकते हैं। हर नया क़ानून, हर नई अदालत, हर नई तारीख़। यह क़ानूनी बोझ इतना भारी हो सकता है कि लड़ाई की नहीं, थकान की जीत होती है।
मुस्लिम विवाह में निकाह के वक़्त तय होने वाला मेहर और ख़ुला की प्रक्रिया कुछ हद तक पहले से सहमति का एक ढाँचा देती है। ईसाई समुदायों में चर्च-आधारित सुलह की व्यवस्था भी रही है। लेकिन दोनों समुदायों के सदस्य सामान्य सिविल और आपराधिक क़ानूनों के तहत भी अदालत जा सकते हैं और जाते हैं।
इन सभी प्रावधानों का मूल मक़सद ग़लत नहीं है। ये उस दौर में बने जब महिलाओं की आर्थिक निर्भरता एक व्यापक सच्चाई थी। वह सच्चाई आज भी कहीं-कहीं है। लेकिन अकेली नहीं है। और जब ये सारे क़ानून एक साथ एक ही मामले में लगाए जाएँ तो असर बहुत एकतरफ़ा हो सकता है।
मुंबई की वरिष्ठ पारिवारिक मामलों की अधिवक्ता मृणालिनी देशमुख दो दशकों से अधिक के अनुभव के आधार पर सार्वजनिक रूप से कह चुकी हैं कि आपसी सहमति के बिना चलने वाले लगभग नब्बे प्रतिशत तलाक़ के मामले असल में गुज़ारे-भत्ते की लड़ाई बन जाते हैं। उनका यह भी कहना है कि इनमें से ज़्यादातर मामले वास्तविक वित्तीय ज़रूरत से कम और प्रतिशोध की भावना से ज़्यादा चलते हैं। दो दशक से ज़्यादा की प्रैक्टिस वाली एक वरिष्ठ वकील का यह बयान कोई मामूली टिप्पणी नहीं है।
इस सबका एक और पहलू भी है जिस पर कम ध्यान जाता है। परिवार अदालतों के वकीलों और बिचौलियों का एक पूरा तंत्र है जिसे लंबे मुक़दमों से फ़ायदा होता है। जल्दी सुलह उनके हित में नहीं है। इसलिए वह होती भी नहीं।
मधु किश्वर और क़ानून की उलटी मार
मधु किश्वर एक शोधकर्ता हैं जिन्होंने मनुषी पत्रिका की सह-स्थापना १९७८ में की थी। शुरुआती दशकों में वे दहेज विरोध और घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ चलने वाले अभियानों की सक्रिय आवाज़ थीं।
बाद के दशकों में उनका नज़रिया बदला। १९९९ में ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से आई उनकी किताब Off the Beaten Track में उन्होंने यह तर्क रखा कि कुछ महिला-समर्थक क़ानूनों ने उन समुदाय-आधारित विवाद-निपटान व्यवस्थाओं को कमज़ोर कर दिया जो पीढ़ियों से काम करती आ रही थीं। २०१७ में The Print में प्रकाशित एक लेख में उन्होंने कुछ संगठनों पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने विदेशी फ़ंडिंग के ज़रिये ऐसे क़ानून भारत में बनवाए जो यहाँ की ज़मीनी सच्चाई से कटे हुए थे।
उन्होंने ANHAD, MAJLIS, Lawyers Collective, Centre for Science and Environment, Voluntary Health Association of India और Citizens for Justice and Peace जैसे संगठनों का नाम लेते हुए कहा कि ये अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार ढाँचों को भारतीय क़ानूनी भाषा में ढालते हैं, बिना उन समुदायों की राय लिए जिनके लिए ये क़ानून बनते हैं। मनुषी के लिए उन्होंने ख़ुद कभी विदेशी फ़ंडिंग स्वीकार नहीं की और इसे उन्होंने एक सचेत निर्णय बताया।
Lawyers Collective का FCRA पंजीकरण केंद्रीय गृह मंत्रालय ने २०१६ में रद्द किया। उस निर्णय को अदालत में चुनौती दी गई। उन विशेष आरोपों का अंतिम न्यायिक निपटान जो भी हो, एक तथ्य सार्वजनिक रूप से दर्ज है कि Lawyers Collective ने घरेलू हिंसा अधिनियम २००५ के मसौदे और उसकी वकालत में सक्रिय भूमिका निभाई थी।
किश्वर की चिंता महिला सुरक्षा के ख़िलाफ़ नहीं थी। चिंता यह थी कि सुरक्षा के नाम पर जो ढाँचा खड़ा हुआ वह कहाँ से आया और किसकी ज़रूरतों को ध्यान में रखकर बना। एक ऐसी शोधकर्ता का यह सवाल जो ख़ुद इस आंदोलन से उठी थी, इसे दरकिनार नहीं किया जा सकता।
उत्तर भारत की खाप पंचायतों की अपनी सीमाएँ और गंभीर ख़ामियाँ हैं, ख़ासकर जाति और सम्मान के सवालों पर। लेकिन किश्वर ने यह भी दर्ज किया कि इन्होंने वैवाहिक विवादों को जिस गति से सुलझाया वह गति औपचारिक न्यायालय प्रणाली ने कभी नहीं दिखाई। तीन दशक बाद भारतीय पारिवारिक अदालतों की जो स्थिति है उसे देखते हुए यह एक दूरदर्शी टिप्पणी लगती है।
वे जो बच नहीं पाए
दिसंबर २०२४। बेंगलुरु।
अतुल सुभाष की उम्र चौंतीस साल थी। वे तकनीकी क्षेत्र में काम करते थे। उन्होंने एक विस्तृत वीडियो और लिखित बयान छोड़ा जिसमें कई अदालतों में एक साथ चल रहे मुक़दमों और संस्थागत उदासीनता का ज़िक्र था। मामला संसद तक पहुँचा। विरोध प्रदर्शन हुए।
हैदराबाद के तकनीकी पेशेवर सैयद शफ़ाथ अली भी उसी वर्ष चले गए। उनके परिजनों का कहना था कि वर्षों की वैवाहिक मुक़दमेबाज़ी ने उन्हें तोड़ दिया। पुणे के एक सॉफ़्टवेयर पेशेवर प्रदीप की भी उसी दौर में ऐसी ही मौत की ख़बर आई।
ये अकेले मामले नहीं हैं। पुरुष अधिकार संगठन ऐसे मामले वर्षों से दर्ज करते आए हैं और उनकी तादाद बढ़ती जा रही है।
“जो सबसे ज़्यादा पिसता है वह वही तनख़्वाहदार पति है जिसके पास न लंबी लड़ाई के लिए पर्याप्त पैसे हैं और न कोई रसूख़। वह क़ानून की मंशा से नहीं टूटता। वह उस खाई से टूटता है जो क़ानून की किताब और ज़िले की अदालत के बीच हर रोज़ मौजूद रहती है।”
जो सबसे ज़्यादा पिसता है वह अक्सर वही तनख़्वाहदार पति होता है जिसके पास न लंबी लड़ाई के लिए पर्याप्त पैसे हैं और न कोई रसूख़। सबसे ऊपर के तबके के लोग इस व्यवस्था को अपनी शर्तों पर झेल लेते हैं। सबसे नीचे के तबके की भी अपनी अनौपचारिक व्यवस्थाएँ होती हैं। बीच में जो है वह टूटता है।
और तकलीफ़ रुकती नहीं है। माँ को भी नोटिस मिलता है। बहन भी मुक़दमे में घसीटी जाती है। पूरा परिवार उस लड़ाई का हिस्सा बन जाता है जो शुरू दो लोगों के बीच हुई थी।
नवंबर २०२५ में अदालत के लोगों ने क्या कहा
१६ नवंबर २०२५ को नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ़ इंडिया में एकम न्याय फ़ाउंडेशन का वार्षिक सम्मेलन हुआ। अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस से पहले का यह आयोजन था। भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश यू यू ललित ने मुख्य भाषण दिया।
उन्होंने कहा कि आपराधिक मामलों में राष्ट्रीय सजा दर लगभग बीस प्रतिशत है और वैवाहिक क्रूरता के मामलों में यह पाँच प्रतिशत से भी नीचे आ जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि व्यवस्था को इस तरह से पुनर्गठित किया जाना चाहिए कि निर्दोष लोग अंतहीन मुक़दमों में न घसीटे जाएँ।
बॉम्बे हाई कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस साधना जाधव ने उसी मंच से बात की। उन्होंने कहा कि यह मान लेना ग़लत है कि महिलाएँ कभी झूठे आरोप नहीं लगातीं। उन्होंने यह भी कहा कि जब किसी पुरुष पर आरोप लगता है तो उसके बच्चे, माँ-बाप और भाई-बहन सब उसकी क़ीमत चुकाते हैं।
यह कोई मामूली मंच नहीं था। और बोलने वाले कोई बाहरी टिप्पणीकार नहीं थे।
भारत की अदालतें पहले से ही मुक़दमों के अभूतपूर्व बोझ तले दबी हैं। हर वह वैवाहिक विवाद जो एक दशक तक खिंचता है, किसी ज़रूरी आपराधिक मुक़दमे की सुनवाई की जगह लेता है। इस नुक़सान को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता जितना लिया जाना चाहिए।
तो आगे क्या
प्रीनप्शियल एग्रीमेंट का तर्क तीन बातों पर खड़ा है।
पहली बात स्वायत्तता। दो वयस्क अपनी मर्ज़ी से विवाह के वित्तीय पहलुओं को पहले से तय करें तो अदालत को उस समझौते को मानना चाहिए। दूसरी बात दक्षता। एक अच्छा समझौता और उसमें शामिल मध्यस्थता की अनिवार्य शर्त कई अदालतों में एक साथ चलने वाले मुक़दमों को रोक सकती है। तीसरी बात न्यायसंगतता। दोनों पक्षों की सहमति से तय हुई वित्तीय शर्तें लागू होनी चाहिए और वे दोनों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।
ऐसा समझौता सरल होना चाहिए। साफ़ भाषा में लिखा हुआ। नोटरी या रजिस्ट्रार के सामने पंजीकृत। और इसमें यह शर्त हो कि अदालत जाने से पहले प्रमाणित मध्यस्थता की कोशिश की जाए। वैवाहिक वित्तीय विवादों को आपराधिक अदालतों तक पहुँचने की नौबत ही नहीं आनी चाहिए।
मृणालिनी देशमुख ख़ुद यह सार्वजनिक रूप से कह चुकी हैं कि वकीलों की ज़िम्मेदारी है कि वे पारिवारिक मामलों में आपसी सुलह को प्रोत्साहित करें और लंबी मुक़दमेबाज़ी समाज की बुनियाद के लिए ख़तरा है। यह किसी आदर्शवादी की बात नहीं है। यह दशकों के पेशेवर अनुभव वाली एक वरिष्ठ वकील का मत है जो अदालतों के भीतर से आया है, बाहर से नहीं।
क़ानून को आज की तस्वीर देखनी होगी
१९५५ के हिंदू विवाह अधिनियम ने जिस महिला की कल्पना की थी वह आज की स्नातकोत्तर डिग्रीधारी और कमाने वाली महिला से बहुत अलग थी। उस वक़्त का समाज अलग था। क़ानून उसी समाज के लिए बना था। सत्तर साल में बहुत कुछ बदल गया है। क़ानून नहीं बदला।
महिलाओं की सुरक्षा के प्रावधान ज़रूरी हैं और उन्हें बने रहना चाहिए। असली हिंसा के मामलों में, असली आर्थिक शोषण के मामलों में, क़ानून को मज़बूत होना ही चाहिए। यह बहस उस सुरक्षा को कमज़ोर करने की नहीं है।
लेकिन कहीं न कहीं भारत में अतुल सुभाष जैसा कोई और भी है। किसी ज़िले की अदालत के बाहर बैठा। अगली तारीख़ का इंतज़ार करते हुए। थका हुआ। अकेला। यह सोचते हुए कि यह कब ख़त्म होगा। उसे क़ानून अभी ठीक से देख नहीं पाता।
प्रीनप्शियल एग्रीमेंट कोई रामबाण नहीं है। लेकिन यह एक शुरुआत है। जिसकी देर बहुत हो चुकी है।
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