हर सुबह वही नज़ारा दोहराया जाता है। छोटे-छोटे बच्चे, जिन्हें अभी जूतों के फीते बांधना भी ठीक से नहीं आता, भारी-भरकम बैग लादे स्कूल की तरफ चलते हैं। कई बार तो माता-पिता खुद बैग उठाकर स्कूल के गेट तक साथ जाते हैं, क्योंकि बच्चे का वज़न ही उतना नहीं होता जितना उसका बस्ता।
इस बैग में किताबें, कॉपियां, टिफिन, पानी की बोतल, आर्ट का सामान और कई बार अलग से वर्कबुक भी होती हैं। यह सिर्फ एक दिन की बात नहीं, यह रोज़ की आदत बन चुकी है।
सबसे हैरानी की बात यह है कि इस समस्या को हल करने के लिए नियम पहले से मौजूद हैं। साल 2018 में मद्रास हाई कोर्ट ने इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया था। कोर्ट ने आदेश दिया कि पहली और दूसरी कक्षा के बच्चों को होमवर्क नहीं दिया जाना चाहिए, और स्कूल बैग का वज़न बच्चे के शरीर के वज़न के दस प्रतिशत से ज़्यादा नहीं होना चाहिए।
इसके बाद केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भी राज्यों को यही सलाह दी। साल 2020 में एनसीईआरटी की एक विशेषज्ञ समिति ने “स्कूल बैग नीति” तैयार की, जिसमें फिर वही सिद्धांत दोहराया गया कि बैग का वज़न बच्चे के शरीर के वज़न के दस प्रतिशत के भीतर रहना चाहिए। भारतीय बाल रोग अकादमी भी यही सुझाव देती है।
सवाल यह है कि जब नियम इतने साफ हैं, तो हालात क्यों नहीं बदले। असली दिक्कत यही है कि नियम बनते हैं, घोषणाएं होती हैं, लेकिन स्कूलों में उन्हें लागू करने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं बनती।
आज भी कई स्कूल कई-कई विषयों की अलग-अलग कॉपियां, अतिरिक्त गाइड बुक्स और प्रैक्टिस बुक्स अनिवार्य कर देते हैं। छोटे बच्चों का होमवर्क भी बंद नहीं हुआ, बस उसका नाम बदल गया है अब उसे “रिवीज़न”, “प्रैक्टिस” या “फैमिली एक्टिविटी” कहा जाता है।
भारी बैग का असर सिर्फ थकान तक सीमित नहीं है। लगातार भारी बोझ उठाने से बच्चों की मुद्रा, कंधे, गर्दन और पीठ पर असर पड़ सकता है। यह समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब बच्चों को सीढ़ियां चढ़नी पड़ें या स्कूल तक लंबी दूरी तय करनी पड़े। यह नुकसान धीरे-धीरे जमा होता है, इसलिए इसे रोकने के लिए भी एक व्यवस्थित तरीके की ज़रूरत है, न कि सिर्फ सलाह की।
इस समस्या का एक कम चर्चा वाला पहलू भी है। होमवर्क अक्सर यह नहीं मापता कि बच्चे ने कितना सीखा, बल्कि यह मापता है कि उसके माता-पिता के पास कितना समय और संसाधन हैं। जिन घरों में माता-पिता बच्चे के प्रोजेक्ट में मदद कर सकते हैं, प्रिंटआउट निकाल सकते हैं, प्रेजेंटेशन सुधार सकते हैं, वहां काम बेहतर दिखता है। लेकिन जिन परिवारों में माता-पिता लंबे समय तक काम करते हैं या जिनकी पढ़ाई सीमित रही है, वहां बच्चों का काम कमज़ोर दिख सकता है, और उन्हें उसी आधार पर आंका जाता है। इस तरह होमवर्क, जो असमानता कम करने के लिए सोचा गया था, वही असमानता को और बढ़ा देता है।
यहां सवाल यह भी उठता है कि इस पूरी व्यवस्था के लिए ज़िम्मेदार कौन है। स्कूल यह दिखाना चाहते हैं कि वे कड़ी पढ़ाई कराते हैं, इसलिए ज़्यादा किताबें और कॉपियां देते हैं। माता-पिता को डर रहता है कि कहीं उनका बच्चा पीछे न रह जाए, इसलिए वे खुद अतिरिक्त गाइड और वर्कशीट खरीद लेते हैं। प्रकाशक भारी और चमकदार किताबों से मुनाफा कमाते हैं। और नियम बनाने वाले विभाग सिर्फ आदेश जारी करके अपना काम पूरा मान लेते हैं। इस पूरी कड़ी में सबसे छोटा हिस्सेदार, यानी बच्चा, सबसे ज़्यादा बोझ उठाता है।
इसका हल मुश्किल नहीं है, बस उसे लागू करने की इच्छाशक्ति चाहिए। किताबों को टर्म के हिसाब से बांटा जा सकता है, ताकि पूरे साल की किताब एक साथ न ढोनी पड़े। स्कूलों में लॉकर या अलमारी की व्यवस्था हो सकती है, जहां बच्चे किताबें रख सकें। हर दिन कौन सी किताब चाहिए, इसका साफ टाइमटेबल बनाकर पहले से बताया जा सकता है। प्रकाशकों को हल्के कागज़ और सादे फॉर्मेट में किताबें छापने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।
इसके साथ ही स्कूलों को समय-समय पर बच्चों के बैग तौलकर यह जानकारी अभिभावकों के साथ साझा करनी चाहिए। जो शिकायत करने वाले माता-पिता या बच्चे हैं, उन्हें “परेशानी खड़ी करने वाला” मानने की बजाय उनकी बात सुनी जानी चाहिए।
असल में एक भारी बैग यह साबित नहीं करता कि स्कूल अच्छा है, और लगातार व्यस्त रहने वाला बच्चा हमेशा कुछ सीख ही रहा हो, यह भी ज़रूरी नहीं। कभी-कभी खाली समय, बातचीत, बाहर खेलना और यहां तक कि ऊबना भी बच्चे की सोच और कल्पनाशक्ति को उतना ही बढ़ाता है जितना कोई किताब।
भारत के पास इस समस्या का समाधान पहले से लिखा हुआ है अदालत का आदेश है, मंत्रालय की सलाह है, और एक पूरी नीति भी है। कमी सिर्फ इतनी है कि इसे ईमानदारी से लागू करने की इच्छा नहीं दिखाई गई। कल फिर लाखों बच्चे वही भारी बैग उठाकर स्कूल जाएंगे। असली परीक्षा यही है कि क्या बड़े लोग आखिरकार इस बोझ का अपना हिस्सा उठाने को तैयार हैं।
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