अमेरिका के सुरक्षित निवेश माने जाने वाले सरकारी बॉन्ड्स में हालिया भारी बिकवाली ने वैश्विक बाजारों में चिंता की लहर दौड़ा दी है। निवेशकों के बीच यह सवाल उठने लगा है कि क्या अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिरता और उसके कर्ज भुगतान की क्षमता को लेकर आम निवेशकों का विश्वास कमजोर पड़ रहा है? अमेरिका की ट्रेजरी यील्ड्स में अप्रत्याशित उछाल और बॉन्ड्स की कीमतों में गिरावट ने न केवल अमेरिका के घरेलू बाजार बल्कि वैश्विक वित्तीय प्रणाली को भी झकझोर दिया है।
दरअसल बीते 5 अप्रैल 2025 को अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स में असामान्य तेज़ी से बिकवाली देखी गई थी। उस दिन 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड अचानक 18 बेसिस पॉइंट्स बढ़कर 4.4% से ऊपर पहुंच गई थी। इसी तरह 2-वर्षीय बॉन्ड पर भी यील्ड 4.7% तक जा पहुंची, जो बीते तीन महीनों में एक बड़ा उछाल है। इस तरह यील्ड का बढ़ना यह दर्शाता है कि बॉन्ड की कीमतें गिर रही हैं। और यह तब होता है जब निवेशक इन बॉन्ड्स से बाहर निकलने लगते हैं।
तो क्या अमेरिकी कर्ज पर लोगों का विश्वास डगमगा रहा है?
ट्रेजरी बाजार को लंबे समय से दुनिया का सबसे सुरक्षित निवेश क्षेत्र माना जाता रहा है। लेकिन इस हालिया ‘फ्रीक सेल-ऑफ’ ने निवेशकों के विश्वास पर सवाल खड़े कर दिये हैं। अमेरिका की बढ़ती कर्ज सीमा, ब्याज दरों में अनिश्चितता और फेडरल रिजर्व की नीति पर संदेह ने बाजार में भय का माहौल बना दिया है। लोगों के इस भय को शब्द देते हुए सिटीग्रुप के वरिष्ठ अर्थशास्त्री एंड्रयू हॉलैंड कहते हैं, “यह सिर्फ तकनीकी असंतुलन नहीं है। यह निवेशकों द्वारा अमेरिकी कर्ज की दीर्घकालिक विश्वसनीयता पर जताया गया अविश्वास भी है।”
ऐसा किन कारणों से हो रहा है?
फेडरल रिजर्व की नीति पर अनिश्चितता: दरअसल मार्च में फेडरल रिजर्व ने संकेत दिया था कि इस वर्ष तीन बार ब्याज दरें घट सकती हैं। लेकिन मजबूत रोजगार आंकड़ों और मुद्रास्फीति के दबाव को देखते हुए अब बाजार को संदेह है कि क्या वाकई यह कटौती होगी। बॉन्ड यील्ड्स पर दबाव बढ़ने का इसे एक बड़ा कारण माना जा रहा है।
सरकारी खर्च और कर्ज में विस्फोटजनक वृद्धि: यूएस ट्रेजरी 2025 के एक बुलेटिन के अनुसार अमेरिका का सकल राष्ट्रीय कर्ज अब $34 ट्रिलियन के पार पहुंच चुका है। 2024 में ही सरकार ने $1.7 ट्रिलियन का बजटीय घाटा दर्ज किया था। इससे भी बाजार में यह धारणा बन रही है कि अमेरिका को अधिक बॉन्ड जारी करने पड़ सकते हैं, जिससे सप्लाई बढ़ेगी और कीमतें गिरेंगी।
विदेशी निवेशकों की भूमिका: जापान और चीन जैसे देशों की ओर से अमेरिकी बॉन्ड की खरीद में गिरावट आयी है। जापान के सरकारी पेंशन फंड GPIF ने 2024 की तीसरी तिमाही में अपने अमेरिकी बॉन्ड होल्डिंग्स में 12% की कटौती की थी। इस कारण से डॉलर पर दबाव बढ़ा है।
इस स्थिति से उत्पन्न होने वाले आर्थिक प्रभाव और जोखिम
बॉन्ड यील्ड में अस्थिरता से डॉलर इंडेक्स में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है। पिछले सप्ताह डॉलर इंडेक्स 103.8 से गिरकर 102.4 तक आ गया था। भारत जैसे उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले देश, जो विदेशी निवेश और डॉलर बॉन्ड्स पर निर्भर हैं, इस अस्थिरता से प्रभावित हो सकते हैं। अगर अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची बनी रहती हैं, तो भारत में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) कम हो सकता है। अमेरिकी बॉन्ड्स की गिरती कीमतें बैंकों की बैलेंस शीट पर भी असर डालती हैं। उदाहरण के लिए कहूँ तो 2023 में सिलिकन वैली बैंक संकट का मुख्य कारण भी बॉन्ड वैल्यूएशन ही था।
इस संबंध में हार्वर्ड कैनेडी स्कूल के प्रोफेसर जेसन फुर्मन कहते हैं, “अमेरिका का ऋण अब एक राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। जब तक नीति निर्माता इसपर एकमत नहीं होंगे, बाजार का अविश्वास बढ़ता रहेगा।” वहीं IMF की रिपोर्ट (जनवरी 2025) के अनुसार, “अमेरिका की वित्तीय नीतियों में पारदर्शिता और अनुशासन की कमी दीर्घकालिक वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा बन सकती है।”
कुल मिलाकर कहूँ तो अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स की हालिया गिरावट केवल एक तकनीकी घटना नहीं, बल्कि गहरे आर्थिक और राजनीतिक असंतुलनों का संकेत है। अब तो निवेशकों का विश्वास तभी बहाल होगा जब अमेरिका अपने कर्ज समेत राजकोषीय घाटा और मौद्रिक नीति में स्पष्टता लाएगा। और भारत समेत अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं को भी इस घटनाक्रम पर नजर बनाये रखनी होगी। यह इसलिए आवश्यक है क्योंकि डॉलर की स्थिरता और अमेरिकी बाजार की दिशा वैश्विक अर्थव्यवस्था की दशा तय करती है।


