अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवता की खुली अवहेलना
अफगानिस्तान में तालिबान की ओर से की जा रही सार्वजनिक फांसी और कोड़े मारने की घटनाओं पर संयुक्त राष्ट्र ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। 11 अप्रैल को बदगीस, फराह और निमरोज़ प्रांतों में चार लोगों को मौत की सज़ा देने के बाद संयुक्त राष्ट्र ने तालिबान से इन अमानवीय सजाओं पर तुरंत रोक लगाने की मांग की है।
तालिबान, जो ‘क़िसास’ यानी बदले की कार्रवाई के नाम पर ये सजाएं दे रहा है, अगस्त 2021 में सत्ता में लौटने के बाद से अब तक कम से कम 10 लोगों को सार्वजनिक रूप से मौत के घाट उतार चुका है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा, “ऐसी सजाएं इंसाफ नहीं, डर और हिंसा का माहौल पैदा करती हैं। ये सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय कानून और मानव गरिमा के खिलाफ हैं।”
कोड़े, फांसी और तालिबानी ‘न्याय’
2025 की शुरुआत से अब तक 213 लोगों को शरीरिक सज़ाएं दी जा चुकी हैं, जिनमें 169 पुरुष और 44 महिलाएं शामिल हैं। इनके तथाकथित ‘अपराध’ थे – समलैंगिक संबंध, घर से भाग जाना या ‘अवैध रिश्ते’ रखना।
सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि सार्वजनिक फांसी के बाद कुछ ही दिनों में 19 और लोगों को कोड़े मारे गए। संयुक्त राष्ट्र को आशंका है कि इनमें बच्चे या मानसिक और बौद्धिक रूप से कमजोर लोग भी हो सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी साफ है – “किसी नाबालिग या मानसिक रूप से असमर्थ व्यक्ति को मौत की सज़ा देना अंतरराष्ट्रीय अपराध की श्रेणी में आता है।”
न्याय या अंधा कानून?
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक तालिबान का कथित न्याय तंत्र न्यूनतम न्यायिक मानकों को भी नहीं पूरा करता। न तो उनके पास संविधान है, न कोई पारदर्शी कानूनी प्रक्रिया। महिलाओं, बच्चियों और हाशिये पर मौजूद समुदायों को तो और भी बुरी स्थिति में रखा गया है, जहां उन्हें न सुनवाई मिलती है, न इंसाफ।
“जो सिस्टम खुद स्वतंत्र नहीं है, वो इंसाफ नहीं दे सकता,” संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने कहा।
संयुक्त राष्ट्र की साफ मांग: बर्बर सज़ाएं बंद हों
संयुक्त राष्ट्र ने तालिबान से साफ कहा है कि सार्वजनिक फांसी और कोड़े मारने जैसी सजाएं अब बंद होनी चाहिए। “ये सजाएं सीधे तौर पर टॉर्चर हैं – इंसानियत के खिलाफ अपराध।”
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नज़र अब तालिबान की हर हरकत पर है। सवाल ये है – क्या तालिबान दुनिया के कानूनों को मानेगा या अफगानिस्तान को बर्बरता के युग में ही धकेलता रहेगा?


