जैश-ए-मोहम्मद का कमांडर अब्दुल रऊफ अज़हर अब इस दुनिया में नहीं है। पाकिस्तान से आई रिपोर्ट्स के मुताबिक, उसकी मौत हाल ही में हुई। लेकिन मौत कैसे हुई – यह आज भी रहस्य बना हुआ है।
कुछ लोग इसे बीमारी बताते हैं, तो कुछ इसे एक “गुप्त ऑपरेशन” का नतीजा मानते हैं। इस रहस्य ने सिर्फ भारत या अमेरिका में ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान में भी नई चर्चा को जन्म दिया है।
कौन था अब्दुल रऊफ अज़हर?
- जैश-ए-मोहम्मद का शीर्ष कमांडर
- 1999 के इंडियन एयरलाइंस IC-814 विमान अपहरण में भूमिका
- 2001 के भारतीय संसद हमले में नाम
- अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या में संदिग्ध
रऊफ, मसूद अज़हर का छोटा भाई था। उसने जैश के लिए रणनीतिक संचालन संभाले थे और वर्षों तक बचा रहा।
मौत पर सवाल: क्या यह एक ऑपरेशन था?
पाकिस्तानी मीडिया में अब्दुल रऊफ की मौत की खबर “स्वाभाविक” बताई गई है, लेकिन कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक मानते हैं कि यह एक टार्गेटेड ऑपरेशन हो सकता है।
भारत और अमेरिका जैसे देशों की खुफिया एजेंसियां लंबे समय से रऊफ पर नज़र रखे हुए थीं।
हालांकि, किसी भी देश ने अभी तक इसकी औपचारिक पुष्टि नहीं की है।
डेनियल पर्ल को मिला आंशिक न्याय
2002 में कराची में वॉल स्ट्रीट जर्नल के पत्रकार डेनियल पर्ल की नृशंस हत्या ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था।
हालांकि उमर शेख को दोषी ठहराया गया, लेकिन अमेरिकी एजेंसियों और पर्ल के परिवार का मानना था कि मुख्य साजिशकर्ता अब्दुल रऊफ ही था।
अब उसकी मौत को कुछ लोग “देर से मिला न्याय” मान रहे हैं। यह एक ऐसा पल है जब न्याय ने भले ही अदालत से रास्ता न लिया हो, पर एक तरह की नैतिक संतुष्टि ज़रूर दी है।
क्या आतंक का अंत हो गया?
नहीं।
हालांकि अब्दुल रऊफ की मौत आतंक के खिलाफ एक अहम पड़ाव है, लेकिन यह अंत नहीं है।
जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठन अब भी सक्रिय हैं। इनके नेटवर्क अफगानिस्तान, पाकिस्तान और यहां तक कि भारत में भी फैले हैं।
संयुक्त राष्ट्र और कई देश बार-बार पाकिस्तान से मांग कर चुके हैं कि वह अपनी ज़मीन पर पल रहे आतंकवाद के ठिकानों पर कार्रवाई करे।
भारत की रणनीति: चुपचाप लेकिन सटीक
भारत पिछले कुछ वर्षों से “खामोश लेकिन असरदार” रणनीति अपना रहा है।
सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक और अब गुप्त ऑपरेशन्स — ये सभी इस बात की ओर इशारा करते हैं कि भारत अब “बोलने से ज्यादा करने” में विश्वास रखता है।
पाकिस्तान में चर्चा क्यों ज़रूरी है?
यह घटना सिर्फ भारत या अमेरिका तक सीमित नहीं है। पाकिस्तान में भी कई पत्रकार, बुद्धिजीवी और आम लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि:
- क्या आतंकवाद को संरक्षण देना अब भी सही है?
- क्या ऐसे तत्वों का अंत देश की शांति के लिए ज़रूरी नहीं है?
- क्या आम पाकिस्तानी नागरिक को आतंकवाद की वजह से अंतरराष्ट्रीय दबाव नहीं झेलना पड़ता?


