मुंबई के विले पार्ले में स्थित पारले-जी बिस्किट की ऐतिहासिक फैक्ट्री अब जल्द ही अतीत का हिस्सा बनने जा रही है। करीब 97 साल पुरानी इस फैक्ट्री को गिराने की प्रक्रिया शुरू होने वाली है, जहां कभी भारत का सबसे लोकप्रिय बिस्किट तैयार हुआ करता था। फैक्ट्री की जगह अब एक विशाल कमर्शियल कॉम्प्लेक्स विकसित किया जाएगा।
विले पार्ले (ईस्ट) में स्थित यह मैन्युफैक्चरिंग प्लांट पारले प्रोडक्ट्स के सबसे पुराने संयंत्रों में से एक था। वर्ष 1929 में चौहान परिवार द्वारा स्थापित इस फैक्ट्री ने न सिर्फ एक ब्रांड को जन्म दिया, बल्कि पीढ़ियों के बचपन की यादों को भी आकार दिया। दशकों तक इस इलाके में बिस्किट की सौंधी खुशबू फैली रहती थी, जो आज भी स्थानीय लोगों की स्मृतियों में बसी है।
पारले-जी की सबसे बड़ी ताकत उसकी सादगी रही। न कोई दिखावा, न महंगी पैकेजिंग , सिर्फ सादा स्वाद और भरोसेमंद गुणवत्ता। यही वजह थी कि यह बिस्किट बच्चों की टिफिन से लेकर मजदूरों के नाश्ते तक, हर जगह अपनी जगह बना सका।
कम आय वाले परिवारों के लिए पारले-जी ऐसा विकल्प था, जो सस्ता भी था और पेट भरने वाला भी। मांएं बच्चों को दूध में डुबोकर यह बिस्किट देती थीं और निश्चिंत रहती थीं कि बच्चे ने कुछ तो खा लिया है।
मुंबई की तेज रफ्तार जिंदगी में पारले-जी एक ठहराव जैसा था। लोकल ट्रेन के प्लेटफॉर्म पर चाय के साथ खाया जाने वाला बिस्किट, स्कूल से लौटते बच्चों के हाथ में थमा छोटा पैकेट, या देर रात ड्यूटी से लौटते पिता का लाया हुआ नाश्ता, पारले-जी हर रूप में मौजूद था।
यह बिस्किट सिर्फ भूख नहीं मिटाता था, बल्कि यह एहसास भी दिलाता था कि साधारण चीजों में भी सुकून हो सकता है।
पारले-जी का इतिहास विले पार्ले से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसी इलाके से इस ब्रांड की यात्रा शुरू हुई और यहीं से इसका नाम भी निकला। वर्ष 1939 में शुरू हुआ यह सफर उस दौर का है, जब भारत में स्वदेशी उद्योग अपने शुरुआती कदम रख रहे थे।
समय के साथ पारले-जी देश के हर कोने तक पहुंचा, लेकिन मुंबई और खासकर विले पार्ले के लिए इसका महत्व हमेशा अलग रहा। यह इलाका सिर्फ एक फैक्ट्री का पता नहीं था, बल्कि एक पहचान बन चुका था।
हालांकि, इस फैक्ट्री में 2016 में ही बिस्किट का उत्पादन बंद कर दिया गया था, लेकिन इमारत अब तक मुंबई के औद्योगिक इतिहास की एक मजबूत पहचान बनी हुई थी। यह वही जगह थी, जहां से पारले-जी ने देशभर में अपनी पहचान बनाई और हर वर्ग के लोगों तक पहुंच बनाई।
यह पुनर्विकास परियोजना मुंबई के बदलते स्वरूप को भी दर्शाती है, जहां कभी उत्पादन और उद्योग शहर की पहचान हुआ करते थे, वहीं अब वही इलाके तेजी से रियल एस्टेट और कमर्शियल हब में तब्दील हो रहे हैं। पारले-जी फैक्ट्री का ध्वस्तीकरण इसी परिवर्तन का एक अहम उदाहरण माना जा रहा है।
करीब 13.45 एकड़ (54,438.80 वर्ग मीटर) में फैली इस प्राइम लोकेशन पर अब लगभग ₹3,961 करोड़ की अनुमानित लागत से एक बड़ा कमर्शियल प्रोजेक्ट तैयार किया जाएगा। कुछ आकलनों के अनुसार, इस जमीन की वैल्यू इससे भी अधिक बताई जा रही है। योजना के तहत मौजूदा परिसर में मौजूद 21 पुरानी इमारतों को गिराकर यहां चार आधुनिक ऑफिस टावर्स और एक बड़ा पार्किंग कॉम्प्लेक्स विकसित किया जाएगा।
फैक्ट्री की दीवारें अब गिर जाएंगी, मशीनें खामोश हो जाएंगी, लेकिन पारले-जी का रिश्ता लोगों से खत्म नहीं होगा। जो जगह कभी सादगी, भरोसे और स्वाद की पहचान थी, वह अब ईंट-पत्थर में नहीं, यादों में जिंदा रहेगी। मुंबई बदलती रहेगी, लेकिन हर बार जब चाय के साथ पारले-जी खुलेगा, यह शहर अपने बचपन को फिर से महसूस करेगा।
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