पाँच हज़ार साल का साथी। ऋग्वेद में जिसका ज़िक्र है। मंदिर और सड़कें बनाने वाला। और आज? सिर्फ १.२३ लाख बचे हैं। हालारी नस्ल के मात्र ४३९ जीव। सरकार ने ५० लाख की सब्सिडी दी, पर बाज़ार नहीं बनाया। यह सिर्फ एक जानवर की कहानी नहीं है, यह हमारी सामूहिक विस्मृति की कहानी है।
फ़ैक्ट बॉक्स
- १९९२ में भारत में गधों की संख्या: ९६ लाख
- २०१९ में बची संख्या: १.२३ लाख
- २७ सालों में हुई गिरावट: ८७ प्रतिशत
- सिर्फ २०१२ से २०१९ के बीच गिरावट: ६१ प्रतिशत
- हालारी गधे, २०२२ में न्यूनतम बिंदु: ४३९ से ४६९
- २०२५ में अनुमानित हालारी गधे: लगभग ५५०
- गधी का दूध: ७,००० रुपये प्रति लीटर
- गाय का दूध: ६५ रुपये प्रति लीटर
- सरकारी सब्सिडी: ५० लाख रुपये
- इजीआओ के लिए वार्षिक आवश्यकता: २३ से ४८ लाख खालें
जिस जानवर को आप गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं, जिसे आप मूर्ख का पर्याय मानते हैं, उसके बिना न ये मंदिर होते, न ये सड़कें, न ये शहर। पाँच हज़ार सालों तक उसने इस देश का बोझ अपनी पीठ पर उठाया। और जब उसकी ज़रूरत खत्म हुई, तो हमने उसे भुला दिया, उसी तरह जैसे हम हमेशा उन्हें भुलाते हैं जो काम आते हैं, पर शोभा नहीं देते।
तबाही के आँकड़े
राजस्थान में ७१.३१ प्रतिशत, गुजरात में ७०.९४ प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में ७१.७२ प्रतिशत की गिरावट, ये आँकड़े एग्रीकल्चरल रिव्यूज जर्नल में छपे हैं। अगर बाघ की संख्या इतनी तेज़ी से गिरती, तो देश में हंगामा होता, चैनलों पर बहस होती, हैशटैग ट्रेंडिंग होता। लेकिन गधा तो गधा है, उसकी परवाह किसे? २१वीं पशुगणना २०२४ से २०२५ के बीच हो चुकी है। डेटा सरकार के पास है, पर अभी गोपनीय रखा गया है। यानी असली हाल हमसे छुपाया जा रहा है।
५,००० साल का इतिहास, जो हमें याद नहीं
२०२३ में फ्रांस के डॉक्टर लुडोविक ओरलैंडो ने ३७ प्रयोगशालाओं और ३१ देशों में २०७ गधों का डीएनए विश्लेषण किया। नतीजा यह निकला कि गधे की उत्पत्ति पूर्वी अफ्रीका में हुई, अरब के रास्ते वह भारत आया और यहाँ आकर यहाँ का हो गया। ऋग्वेद में इसका ज़िक्र है। ऐतरेय ब्राह्मण में है। तैत्तिरीय संहिता में है। विष्णु पुराण में इसे “खर” कहा गया है। सिल्क रोड पर ऊँट के साथ-साथ इसने भी व्यापार ढोया, भूमध्यसागर से प्रशांत महासागर तक।
“धोबी का गधा, न घर का न घाट का। यह मुहावरा बेकार नहीं है। यह उस गधे की दास्तान है जिसने सुबह से शाम तक कपड़ों के गट्ठर ढोए और बदले में मिला क्या? बस खुले मैदान में चरने की इजाज़त।”
गधे गए कहाँ? असली जवाब डरावना है
एक जवाब आसान है। ट्रैक्टर आए, ट्रक आए, वाशिंग मशीन आई। जो काम गधा करता था, वो मशीन ने ले लिया। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। २०२१ में एनजीओ ब्रुक इंडिया की जाँच रिपोर्ट “द हिडन हाइड” में खुलासा हुआ कि भारत में गधों की खाल का एक गुप्त और गैर-कानूनी व्यापार जारी है। चीन में इजीआओ दवाई बनाने के लिए हर साल २३ से ४८ लाख गधों की खाल चाहिए। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात में यह व्यापार अभी भी चल रहा है, कानून होने के बावजूद, एनफोर्समेंट के अभाव में।
चीन में १९९२ में १.१ करोड़ गधे थे। २०१९ तक सिर्फ २६ लाख बचे, यानी चीन में भी ७६ प्रतिशत की गिरावट आई। जब चीन के अपने गधे खत्म हुए तो उनकी नज़र भारत और अफ्रीका पर पड़ी। युगांडा, तंजानिया, बोत्सवाना, माली और सेनेगल ने बैन लगा दिया। भारत में बैन कागज़ पर है।
हालारी, वो नस्ल जो ७,००० रुपये प्रति लीटर दूध देती है और खुद मिट रही है
गुजरात के जामनगर, द्वारका और राजकोट के हालार क्षेत्र में एक अनोखी नस्ल पाई जाती है। हालारी गधा, पूरा सफेद, आम गधे से ऊँचा, घोड़े से थोड़ा छोटा। २०० साल से भारवाड़ और रबारी समुदाय के साथ ४०-४० किलोमीटर रोज़ चलता रहा।
हालारी नस्ल की संख्या का सफर
- २०१४: हालारी गधों की संख्या, १,४००
- २०१८: एनबीएजीआर ने नस्ल को आधिकारिक मान्यता दी, संकट आने के बाद
- २०२०: संख्या घटकर ६६२ रह गई
- २०२२: न्यूनतम बिंदु, सिर्फ ४३९ से ४६९ हालारी गधे बचे
- २०२५ (अनुमान): २१वीं पशुगणना में अनुमानित संख्या लगभग ५५०, यानी धीमा सुधार शुरू
एनआरसीई बीकानेर में ४३ हालारी गधे संरक्षित हैं, यानी कुल आबादी का करीब १० प्रतिशत। एनबीएजीआर का लक्ष्य है इन्हें जल्द से जल्द १,००० तक पहुँचाना।
अब उस दूध की बात, जो इस पूरी कहानी का ट्विस्ट है।
फ़ैक्ट बॉक्स
- हालारी गधी के दूध में फैट: ०.८६ प्रतिशत, बेहद कम, बच्चों के लिए आदर्श
- गधी के दूध में मौजूद विटामिन: ए, बी१, बी२, बी६, डी और ई
- गधी के दूध की संरचना: माँ के दूध से सबसे ज़्यादा मिलती-जुलती
- वैश्विक गधी दूध बाज़ार में यूरोप का हिस्सा: ३५ प्रतिशत से अधिक
आईसीएआर-एनआरसीई के शोध में पाया गया कि हालारी गधी के दूध में विटामिन ए, बी१, बी२, बी६, डी और ई होता है। इसकी संरचना माँ के दूध से सबसे ज़्यादा मिलती-जुलती है। काऊ-मिल्क-एलर्जी वाले बच्चों के लिए यह वरदान है। कर्नाटक और केरल में इससे कॉस्मेटिक्स बन रहे हैं, फेस वॉश, एंटी-एजिंग क्रीम और साबुन। और इतिहास में दर्ज है कि मिस्र की रानी क्लियोपेट्रा गधी के दूध से नहाती थीं। दुनिया का सबसे महंगा दूध, केसर से भी महंगा, उस जानवर का है जिसे हम गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं।
भारत की चार रजिस्टर्ड देसी नस्लें, सब खतरे में
- स्पीति नस्ल हिमाचल प्रदेश के लाहौल एंड स्पीति में पाई जाती है। ३,५०० मीटर की ऊँचाई पर कम ऑक्सीजन में भी परिवहन करने में सक्षम यह भारत की पहली ऑफिशियली रजिस्टर्ड गधे की नस्ल है।
- हालारी नस्ल गुजरात के जामनगर, द्वारका और राजकोट में पाई जाती है। पूरी तरह सफेद और पैस्टोरलिस्ट्स के साथ लंबी माइग्रेशन करने वाली यह नस्ल २०१८ में रजिस्टर्ड हुई। अभी सिर्फ लगभग ५५० बचे हैं और दूध ७,००० रुपये प्रति लीटर बिकता है।
- काछी नस्ल गुजरात के कच्छ क्षेत्र में पाई जाती है और भारत की एकमात्र ऐसी नस्ल है जो खेती में खरपतवार निकालने, यानी इंटर-कल्तिवेशन, के लिए उपयोग होती है।
- लद्दाखी नस्ल ३,००० मीटर से ऊपर पाई जाती है और सबसे कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में जीवित रहने वाली एकमात्र गधे की नस्ल है। यह सबसे हाल में रजिस्टर्ड हुई है।
सरकार की ५० लाख की योजना, स्वागत है, पर काफी नहीं
२१ फरवरी २०२४ को केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय पशुधन मिशन में पहली बार गधे, घोड़े और ऊँट को शामिल किया। ५० प्रतिशत कैपिटल सब्सिडी का अर्थ यह है कि एक करोड़ के प्रोजेक्ट पर ५० लाख रुपये सरकार देगी। शर्त यह है कि कम से कम ५० मादा और ५ नर गधे देसी नस्ल के हों। कोई भी इसका लाभ उठा सकता है, किसान, एफपीओ, एसएचजी या सेक्शन ८ कंपनी।
बिज़नेस केस मज़बूत है। गुजरात के पाटन जिले के धीरेन सोलंकी ने २२ लाख रुपये लगाकर २० गधों से शुरुआत की। आज ४२ गधों से वे महीने में २ से ३ लाख रुपये कमा रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या अनसुलझी है। भारत में गधी के दूध का कोई एफएसएसएआई स्टैंडर्ड नहीं है। यानी यह ऑफिशियली एक रेगुलेटेड कमर्शियल प्रोडक्ट नहीं है। कोई ऑर्गनाइज्ड बायर नहीं, कोई रिटेल चेन नहीं, कोई इंस्टीट्यूशनल प्रोक्योरमेंट नहीं। ५० गधियाँ पालेंगे, दूध निकालेंगे, बेचेंगे कहाँ? इस सवाल का जवाब सरकार की योजना में नहीं है। और जब किसान को खरीदार नहीं मिलेगा तो वो गधा बेच देगा, उसी को जो उसकी खाल के लिए खरीदता है।
“१० साल पहले ऊँटनी के दूध का यही हाल था। आज आद्विक फूड्स का ऊँटनी दूध अमेज़न पर बिकता है। गधी का दूध उसी रास्ते पर है, बस वक्त कम है।”
पाँच ज़रूरी कदम
- एफएसएसएआई स्टैंडर्ड बने। गधी के दूध को कमर्शियल प्रोडक्ट का दर्जा मिले। बिना इसके मार्केट नहीं बनेगा और बिना मार्केट के कंजर्वेशन नहीं होगा।
- कोल्ड-चैन इंफ्रास्ट्रक्चर बने। दूध टिकाऊ नहीं है। ग्रामीण इलाकों में स्टोरेज और ट्रांसपोर्टेशन की व्यवस्था हो।
- हाइड-ट्रेड पर असली एनफोर्समेंट हो। कानून है, लागू नहीं है। महाराष्ट्र, यूपी और गुजरात में गुप्त व्यापार बंद हो।
- कंज्यूमर अवेयरनेस बढ़े। भारत को पता ही नहीं कि गधी का दूध क्या है और क्यों फायदेमंद है। माँग बनाना ज़रूरी है।
- ब्रीडिंग यूनिट्स को कंजर्वेशन से जोड़ा जाए। एनबीएजीआर के प्रोग्राम के साथ इंटीग्रेशन हो। नस्ल बचाना सिर्फ सरकारी केंद्रों का काम नहीं है, असली कंजर्वेशन वहाँ होता है जहाँ जानवर सदियों से रहा है।
आखिरी बात
जब औद्योगिक क्रांति आई तो मैनुअल लेबर बदली। जब एआई आया तो इंटेलिजेंस बदली। लेकिन गधे की जेनेटिक्स नहीं बदली। हमने उसके पुराने काम को देखकर उसे छोड़ दिया। उसकी नई ताकत को पहचाना ही नहीं। जिस दिन भारत के हर जिले में गधी का दूध ऑर्गनाइज्ड तरीके से बिकेगा, उस दिन वो जानवर बचेगा। और उस दिन हम कह सकेंगे कि हमने अपनी ज़िम्मेदारी निभाई, उस जानवर के प्रति जिसने हज़ारों साल तक हमारी ज़िम्मेदारी निभाई।


